नौ सौ चूहे खाकर हज को चले गुलाब कोठारी

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पत्रकारिता के क्षेत्र में क्षितिज पर बैठकर पत्रिका समाचार पत्र के मालिक गुलाब कोठारी खुद को ईमानदार एवं बाकी सभी सरस्वती पुत्रों को भ्रष्ट की उपाधि प्रदान कर रहे हैं, लेक‍िन कोठारी, उनके सम्पादक व उनके पत्रकार भी कहां दूध के धुले हुए हैं। कोठारी स्वयं अपने गृहनगर की मातृभूमि का कर्ज कभी अदा नहीं कर पाए। देश के कई प्रदेशों में अपना एकाधिकार जमाने की प्रवृति खुद धारण करके वे देश के दूसरे पत्रकारों को भ्रष्ट तंत्र में लिप्त होना बताते है, जो उनके मानसिक दिवालियेपन का द्योतक माना जा सकता है।

पत्रकारिता देश में आईने का कार्य करती है, मीडिया कभी किसी सरकार की दत्तक पुत्र बन जाये ऐसा कभी सम्भव नहीं, देश में मीडिया को चौथा स्तम्भ माना गया है। एक पत्रकार मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री की भी कलम के माध्यम से भलाई कभी नहीं करता, जो पत्रकार स्वयं को ईमानदार कहता है उस पत्रकार को या तो बेइमानी करने का अवसर ही नहीं मिला होगा या फिर अपने जीवन में इतने गलत कार्यों को अंजाम दे दिया होगा, कि उसे अपने बचाव में स्वयंभू ईमानदार घोषित करने की जरूरत आ पड़ी होगी।

मालवी भाषा का प्रसिद्ध मुहावरा है कि कुत्ता कभी अपने जाति-भाई का मांस सेवन नहीं करता। सारी कहावतें-मुहावरों को पीछे छोड़ते हुए देश के जाने-माने, जो कभी स्वयं को पत्रकार शब्द से सम्बोधित कराते थे। अपनी पूरी बिरादरी को ही बदनाम कर डाला।

हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था
हमारी किश्ती भी वहीं डूबी जहां पानी कम था।

जिनके स्वयं के मकानों में दरवाजे एवं खिड़कियां शीशे की हो, वो दूसरो के दरवाजों एवं खिड़कियों पर पत्थर नहीं मारा करते। देश में 99 प्रतिशत अखबार फर्जी नहीं होकर वास्तविकता के धरातल पर देखे जा सकते हैं, परन्तु किसी नामी-गिरामी सम्पादक की कलम यह लिख दे कि आज 80 फीसदी समाचार पत्र फर्जी तरीके से चल रहे हैं तो ऐसे कलमकार को किसी फर्जी समाचार पत्र का उल्लेख भी करना चाहिए था।

आज प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है, व्यापार-व्यवसाय हो या मीडिया जगत सभी जगह प्रतिस्पर्धा है, कड़ी चुनौतियों का सामना करके प्रिंट मीडिया में अपनी वर्षों पुरानी साख घटिया मानसिकता के चलते सम्पादक खुद ही खो बैठे। प्रिंट मीडिया से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रतिस्पर्धा चल रही परन्तु ऐसी ओछी मानासिकता का परिचय कभी किसी मीडियाकर्मी ने नहीं दिया। प्राय: ऐसा कहा जाता है कि बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है। परायी प्रगति देखकर किसी पितृ पुरूष को हैरान होने के बजाए उन्हें और शाबासी देनी चाहिये कि जो कार्य वो अपने जीवन में नहीं कर सके वो उनकी युवा पीढ़ी करने में सक्षम है। जहां देश में सभी बेइमान भरे पड़े हैं तो स्वयं भी कहां से ईमानदारी का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लेंगे।

देश के पत्रकारिता जगत में महाशिवरात्रि के दिन किसी बड़े कलमकार के हाथ से अपनी पूरी बिरादरी की इज्जत को तार-तार किया गया तो वो दिन कभी शुभ हो ही नहीं सकता। यह घृणित कार्य द्रोपदी चीरहरण से कम नहीं कहा जा सकता। कलम चलाते वक्त कलमकार के सिर पर बैठी मां सरस्वती ने निश्चित अपना स्थान छोड़ दिया होगा और लक्ष्मीजी अपनी सवारी के साथ कलमकार के सिर पर चढ़कर कलम चलवायी होंगी। ये शैतानी भरा कार्य माँ सरस्वती के पुत्र के हाथों कभी हो ही नहीं सकता।


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Comments (7)Add Comment
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written by B4M, March 07, 2011
भगवान बनने की राह पर हैं गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी खुद को भगवान से कम नहीं समझते। या फिर, उनके इनहाउस चमचों की फौज उन्हें भगवान बनाने पर तुली हुई है। हालांकि इसका सीधा-सीधा नुकसान स्वयं गुलाब कोठारी और उनसे भी ज्यादा राजस्थान पत्रिका को हो रहा है। यह अलग बात है कि स्वयं कोठारी इस बात से अनभिज्ञ हैं। हो सकता है, वे इससे अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं।

अपने ही अखबार में अपने लंबे-चौड़े प्रवचन और बोरिंग आलेख छपवाना गुलाबजी का शुरू से शौक रहा है। यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से जारी है। अपने पिता कर्पूरचंद्र कुलिश (जिन्होंने राजस्थान पत्रिका समूह की नींव रखी। इसे फैलाया और आज यह पहचान दी) की मृत्यु के बाद कोठारी ने उन्हें भी भगवान का दर्जा देने के लिए पूरे एक वर्ष तक खुद और अन्य लोगों द्वारा कुलिशजी को महिमामंडित करने वाले भरपूर लेख छापे थे। इसके बाद खुद छपना शुरू हो गए। कोठारी देश के जिस किसी हिस्से में किसी भी कार्यक्रम में हों, उसकी फोटो सहित खबर पत्रिका के हर संस्करण में प्रमुखता से छपती ही है। इसके अलावा आए दिन छपने वाले उनके अग्रलेख (कहा जाता है कि ये वे खुद नहीं लिखते) ऐसे होते हैं, मानो उन्होंने जो लिखा है, उसे लोग वेद वाक्य की तरह स्वीकार करेंगे। गुलाबजी के इसी अतिरेकपूर्ण कवरेज और आलेखों की वजह से अब लोगों को अपच होने लगा है। दूसरी ओर, पत्रिका के भीतर बैठे चाटुकार उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाए रखने के लिए उन्हें अधिकाधिक ऐसे कर्म करने को उकसाते रहते हैं।

यही कारण है कि गुलाबजी ने पिछले दिसंबर में भोपाल में हुए किसान आंदोलन में पहुंचकर उसे शांत करने का श्रेय खुद लिया। शर्मनाक अंदाज में पूरा एक पेज गुलाबजी की माला पहनते हुए फोटो का तो छपा ही, फ्रंट पेज पर भी 'आप तो हमारे भगवान हैं' शीर्षक से खबर और फोटो भी छपी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान वे आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे और पत्रिका में खबर छपी 'जीनियस हैं गुलाब कोठारी : कर्नल बैंसला'। इस तरह की कुछ बचपने और कुछ मूर्खतापूर्ण हरकतों से अब लोग उकताने भी लगे हैं। पत्रिका समूह के लोग भी अंदर ही अंदर ये कहते मिल जाते हैं, कि गुलाबजी अपने हाथों इतने बड़े अपने ही अखबार का सत्यानाश करने पर तुले हुए हैं लेकिन चमचों की फौज उन्हें सही -गलत का फर्क कभी नहीं बताती।

हाल ही पत्रकारों को निशाना बनाते हुए पत्रिका में छपा गुलाबजी का लेख भी संभवत: उन्होंने छपने से पहले खुद पढ़ा ही न हो, क्योंकि लिखने वाला तो कोई और होता है। आमतौर पर जब अखबारों के बारे में चर्चा चलती है तो लोगों के मुंह से एक ही बात निकलती है, ये गुलाब कोठारी तो भगवान बनने चल पड़ा है। इस लेख का उद्देश्य यही है कि गुलाब कोठारी को भगवान सद्बुद्धि दें और पत्रिका जैसे सम्मानित अखबार को बर्बाद होने से बचाएं।
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written by ishu, March 06, 2011
Banshi bhai,
Dukh ki baat hai ki bina kisi logic ke, bina kisi tathya ke aap bas Gulab ji ko bura hi kahte rahe. Kamse kam yeh to kahte ki Gulab ji ne falan ki bhains kholi, falan ke khet se sakarkand khod laye wagairah..... Saboot ki to baat hi door par kuch karan bhi to bataya hota. Bas lage kahne ki kya yeh doodh ke dhule hain, shivratri ke din yeh likh diya to din hi shubh nahin... Kya bachpana hai....
Likhte kuchh pol under ki to maja aata padhne main.

Ab kothari ji ne sabko hi choor likh diya to woh bhi jyadti hai. Agar kisi community main ek bhi imaandar hai to poori kaum ko baimaan kahna theek nahin.

Ek Shrimaan Dr Dilip Singh ji hain,
Baat Gulab ji ki horahi hai aur woh YAshwant par pil pade frustration nikaalne. Ishara Tomar par phi kar diya par itni himmat na dikhayi ki unka naam hi likh dete. Kai logon ko Alok se dar lagta hai smilies/smiley.gif .
Ek baat samajh nahin aayi: Agar Yashwant ko naukri se nikal diya gaya ya Alok ki tabiyat ko kuchh hua aur woh kisi se seedhe sahayta hi maang raha hai (maan bhi liya jaye) to yeh kya tark hua inke khilaf. Koi masale daar khabar lao yaa ki Yashwant 1985 main jab padhai karte the to master ji ki dhoti khol diya karte the, class ke ladkon ki paint ke andar barf daal diya karte the wagairah wagairsah..... Woh bhi kuchh interesting hoga padhne main, parantu yeh ek line ka seedha sa lanchhan ki isko akhbaar se nikaal diya kya hai. Usko tauheen karne ki koshish taaki woh sharma jaye aur kuchh na bole. Par yeh (YAshwant aur ALok) thodi moti chamdi ke hain, inki koi nude photo bhi chhaap doge to bhi yeh wohi likhte rahenge aur kahte rahenge jo yeh karna chahte hain. Inko nahin sudhara jasakta Bandhu.
Media ke khilaaf vayapak jan abhiyaan ki baat aapne kahi. Woh to bhas kar hi raha hai. Barkha ji ka chittha bade media house walon ne to daba hi rakha tha. Yahin uska tape sabse jyada baja.
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written by डॉ. दिलीप कुमार सिंह, March 05, 2011
भड़ास का मालिक या स्वयंभू संपादक यशवंत सिंह खुद तो अखबार से निष्कासित छंटा हुआ लॉट है और अब भड़ास दलाली और ब्लैकमेलिंग का उसका धंधा बन गया है। वह अखबारों के खिलाफ खबरें लगाता है और अखबार के मालिकों या संपादकों से उस एवज में पैसे एंठता है। पत्रकारों के बारे में गुलाब कोठारी ने जो कुछ भी लिखा है, वह कम है। यशवंत सिंह तो मीडिया गिरोह का एक छुटभैया सदस्य मात्र है, उसके बड़े-बड़े मौजूद हैं, कई बड़े अखबारों के शीर्ष संपादक हैं। सिद्धांत बघारने में अव्वल लेकिन उघारें तो सब सफेद वस्त्र के अंदर जघन्य। अखबार नहीं आंदोलन चलाने वाले संपादक हों या कैंसर रोग के नाम पर सहानुभूतियां बेच कर पैसे उगाहने वाले बड़े डंकेबाज पत्रकार, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। तो गुलाब कोठारी के लेख पर उन्हें मिर्ची तो लगेगी ही। मैं भी पत्रकार हूं। लेकिन एक सामान्य दर्जे का और एक सामान्य अखबार में काम करने वाला। मैं मानता हूं कि मैं डरपोक हूं, इसलिए कि मैं सच्चाई के रास्ते पर चलता हूं तो मुझे डर कर रहना ही पड़ेगा। लेकिन मीडिया निर्लज्ज है और समाज का बदनुमा जख्म जो समाज को सच्चाई का रास्ता दिखाने के बजाय भटका रहा है। वास्तविकता यह है कि इस देश में मीडिया के खिलाफ एक व्यापक जन अभियान की जरूरत है, वैसे ही जैसे भ्रष्टाचारी नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ। कोठारी जी को बधाई सहित,
डॉ. दिलीप कुमार सिंह
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written by jaybharat, March 04, 2011
आप का लेख देख कर तो संदेह नहीं होता की आज भी पत्रकार भारत में हें मगर आज चिंता इस बात की हें देश के अन्दर पत्रकारिता यक धंदा बन चूका हें इससे ज्यादा कुछ नहीं ९९ % अखबार सिर्फ फाइल कापी बनते हें कुछ तो येसे की यक ही बार में पुरे साल का अखबार बनवा लेते हें और davp की फाइल भी लगा देते हें और तो और आज कितने davp भी हो जाते हें और कुछ लोग अखबार के दम पर हप्ता भी वसूल लेते आप ने जो विषय उठाया हें वो जनता का धन हें जिस पर मीडिया अपना अधिकार करना जान गई हें जितना लूट सकते हो उतना जनता का धन लूट लो क्योकि आप पत्रकार हो
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written by great, March 04, 2011
ek din ki bat yad hai mujhe jab patrika ke hp tiwari ko dirctor bnya tha to akhbar me chppa tha phli bar kisi kermchri ko director bnaya hai aub inse ye puche koi jub director bna sakte ho hor aub tenkhwa bdane per joor a rha hai ur apni sari biradri ko hi gali de rhe hai bai gulab ji app inhi petrkaro ke bal per itne award jet payo ho jinne app paper bda chda ker chapte ho apni uplabdhyio ke liye wo sach me apki apki uplabdhiya nhi hoti .................. apne galti to ki hai badpan isi me hai kuch sfai bhi de is per jase apne kuch dino phle rahul gandi ke kale dhan per likha tha rahul koi sfai nhi de rhe hai agar wo (rahul gandi) Shi hote to sfayi dete to app per bhi ye bat lagu honi chahyie ............. ku shi kha na mane ........
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written by baal brahmchaari, March 04, 2011
bilkul saghi kaha ji..ye vo hi gul;ab kothari hai jo paid news ko le kar hangaama karte hai,lekin inke hi akhbaar me jab chunaav hote hai to 1.5 laakh se samaachaaron ki shuruaat hoti hai.yani ki jo party jitna degi usko coverage utni hi jyaada milegi.1.5 laakh to suruat hai. dusra inke akhbaar ke aneko karmchaariyon ko jaanta hu jo 7-7 saal hone ke baad bhi aaj bhi pakke nahi kiye gaye hai.aur karmchaariyon ki beijjatti kaise kare ye koi inse sikhe.inke sansthaan me manager ko baabu ek pal me banaa diyaa jaataa hai.yaa to aap apni ijjat bech kar sansthaan me raho ya nokri chhod dar dar ki thokar khaao. jai hind
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written by Arvind , March 04, 2011
banshi g aap kafi had tak thik hain, magar gulab kothari puri tarah galat bhe to nahi hain. isse manne me log kyon dooble hue ja rahe hain ki hain to ye bhi issi media ka sach, darasal media me logo ki mansikta ban gayi hai ki aap mahine ke 29 din soshan karayein 30ve din aapne bol diya to aap sahab vidrohi hain..jahan tak baat gulab kothari ki hain to naam nahi batane ki shart to media ka takia kalam hai to aapko unse puchchna nahi chahiye. socity ko aaiena dikhane wala media khud kaisa ye aapko batane ki jaroorat nahi hai, aur iss desh ki patrkari koi theke par nahi chal rahi hai ki kisi ek ka keh dena he sab kuchch hai. magar halaat wahi ho gaye hain jinki taraf isshara kiya gaya hai, radia kand sab bata deta hain, shukra manaiye janta abhe bhe media ke bare bahut jyada samjhne ko taiyar nahi hai, warna police aur netaon ke baad agla number patrkaro ka he hoga jab janta aukaat batane par utaroo ho jayegi.

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