जयपुर से आ रही है ‘कुरजां संदेश’

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कुरजां: साहित्‍य-संस्‍कृति की नई पत्रिका : साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में हंस, बया, और पाखी के बाद एक नए पंछी की उड़ान शुरु होने वाली है। जयपुर से एक नई पत्रिका ‘कुरजां संदेश’ का प्रकाशन होने जा रहा है। इसका प्रवेशांक ही शताब्‍दी स्‍मरण विशेषांक है। हिंदी में पहली बार एक साथ उन सभी रचनाकारों और कलाकारों को इस पत्रिका में याद कर किया जा रहा है, जिनकी जन्‍म शताब्‍दी मनाई जा रही है।

हिंदी में नागार्जुन, उपेंद्रनाथ अश्‍क, शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदार नाथ अग्रवाल, गोपाल सिंह नेपाली, राधाकृष्‍ण, भुवनेश्‍वर और भगवत शरण उपाध्‍याय पर दो दर्जन से अधिक लेख-संस्‍मरण हैं।

उर्दू में फ़ैज़, मजाज़, और नून. मीम. राशिद पर इंद्र कुमार गुजराल, निदा फाजली से लेकर कृष्‍ण कल्पित और आज के लोकप्रिय गीतकार इरशाद कामिल के लेख हैं। फ़ैज़ की चित्रकार पुत्री सलीमा हाशमी के साथ एक विशेष साक्षात्‍कार भी इस अंक में शामिल है, जिसे युवा पत्रकार शिराज हसन ने लाहौर से विशेष रूप से भेजा है। अंग्रेजी में अहमद अली, तेलुगू में कवि श्रीश्री और राजस्‍थानी में कन्‍हैया लाल सहल को पूरी श्रद्धा से याद किया गया है।

गुजराती में उमा शंकर जोशी, भोगी लाल गांधी और कृष्‍ण लाल श्रीधरणी को भी पूरे राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में स्‍मरण किया गया है। रवींद्र नाथ टैगोर के उपन्‍यास ‘गोरा’ के प्रकाशन की शताब्‍दी पर इसका पुनर्मूल्‍यांकन किया गया है। भारतीय संगीत के पितामह विष्‍णु नारायण भातखण्‍डे को उनके जन्‍म के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर लगभग भुला दिया गया, लेकिन उनके अवदान को ‘कुरजां’ ने याद किया है। पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर को भी उनके जन्‍मशती वर्ष में यहां श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। शताब्‍दी पार कर चुके महान गायक उस्‍ताद अब्‍दुल राशिद खान के साथ एक खास मुलाकात और उन पर विशेष लेख भी यहां है।

दादामुनि अशोक कुमार पर प्रसिद्ध फिल्‍म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे का महत्‍वपूर्ण आलेख है। महान फिल्‍मकार अकीरो कुरोसावा के साथ पोलिश कवि चेस्‍लाव मिलोश को भी उनके जन्‍म शताब्‍दी वर्ष में श्रद्धासुमन अर्पित किए गए हैं।

वरिष्‍ठ कथाकर, नाटककार, लेखक और पत्रकार (फिलहाल राजस्‍थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष) ईशमधु तलवार ‘कुरजां संदेश’ से संपादकीय सलाहकार के रूप में जुड़े हैं और कवि-स्‍तंभकार-लेखक (राज. प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव) प्रेमचंद गांधी इसके मानद संपादक हैं। मार्च, 2011 के अंत तक यह नई और महत्‍वपूर्ण पत्रिका देश भर में उपलब्‍ध होगी। पत्रिका के प्रवेशांक की कीमत सौ रूपये है और अपनी प्रति प्राप्‍त करने के लिए This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर संपर्क किया जा सकता है।

उल्‍लेखनीय है कि मध्‍य एशिया से प्रतिवर्ष पश्चिमी राजस्‍थान आने वाली डेमोजिल क्रेन को कुरजां कहा जाता है, जिसे लेकर राजस्‍थान में अनेक लोकगीत और कथाएं जनमानस में प्रचलित हैं। कुरजां को प्रेम का संदेश लाने वाले पक्षी के रूप में जाना जाता है।


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