किसी का फोटो किसी के नाम पर छाप रहा है हिन्दी का सबसे पुराना अखबार

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: नाम के लिए कुछ भी करेगा : पत्रकारिता में ऐसे घुसपैठियों की कमी नहीं है जो नाम के लिए किसी भी स्तर तक उतरने के लिए तैयार हो जाते हैं. फोटोग्राफी के बारे में कहा गया है कि एक फोटो एक हजार शब्दों के बराबर होता है. इस वाक्य से न सिर्फ पत्रकारिता में फोटो के महत्व के बारे में पता चलता है बल्कि फोटोग्राफर के हुनर के बारे में भी जानकारी होती है. पलों और लम्हों को, जिसमें इतिहास बनता है और बिगड़ता है, कैद करना इतना आसान नहीं होता.

लेकिन इस काम को अंजाम देने के लिए फोटोग्राफर न जाने किन-किन हालातों से संघर्ष करते हैं. लेकिन अब इस विधा में ऐसे लोग भी अपने हाथ-पैर मारने लगे हैं जिनका कैमरे किसी खास वक्त को कैद करने के लिए क्लिक तक नहीं करता और घर बैठे महोदय के कैमरे में वो पल कैद हो जाता है. गले में कैमरा लटकाए हर मौके पर अपने को खास मनवाने वाले ऐसे फोटोग्राफर हर शहर में देखे जा सकते हैं. ताजा प्रकरण वाराणसी में आयोजित वरूण-यामिनी के विवाह का है. विवाह की सारी रस्में हनुमान घाट स्थित कांची कामकोटि मठ में पूरी की गईं.

सात मार्च रविवार को सम्पन्न हुए इस विवाह में प्रेस को मठ के अन्दर बने विवाह स्थल तक जाने ही नहीं दिया गया. हालाकि बाद में विवाह के रस्मों से जुड़े खास पल के फोटो जारी किए गए. ये फोटो हर अखबार में छपे. हद तो तब हो गई जब अनुज अग्रवाल नाम के एक फोटोग्राफर ने इस फोटो को अपने नाम से हिन्दी दैनिक आज के मुख्य पृष्ठ पर अपने नाम से छपवा दिया.

हिन्दी के सबसे पुराने अखबार 'आज' ने बिना पड़ताल किए ही सबके लिए जारी की गई आधिकारिक तस्वीर को अपने फोटोग्राफर के नाम से छाप दिया. इस घटना से पता चलता है कि कैसे सतही और कामचलाउ लोग पत्रकारिता के पेशे को बदनाम कर रहे हैं. उस अखबार को क्या कहें, जिसने आजादी के दौर में लोगों को जगाने का काम किया और आज उस अखबार में काम कर रहे लोग ही इतने बेखुद हैं कि वो किसी के फोटो को किसी के नाम से अपने मुख्य पृष्ठ पर छाप देते हैं और बड़े आसानी से एक गलत काम को सही साबित कर देते हैं.

बनारस से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.


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Comments (2)Add Comment
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written by reporter, March 10, 2011
अरे भाई ये कोई नै बात नहिओ है. जबलपुर भास्कर में तो रोजाना विज्ञप्ति में आने वाली फोटो में फोटोग्र्फार का नाम चपता है.
मालिक भी आंख बंद करके देखता है. इसकी एक वजह भी है वह पर पत्रकारों के गुट है जिनके अपने अपने प्रिए फोतोग्रपर का नाम और दुकान चलने में पूरा सहयोग करते है. नया कोई भी नहीं आ पता क्योंकि उस सबके पैर पड़ने पड़ते है. यकीं ना हो तो जबलपुर में किसी से भी पूछ सकते है.
जबलपुर जर्नलिस्ट
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written by deepakdevmishra, March 09, 2011
bhai ye to bilkul galat hai aisa nahi karna chaiye anuj g ko....

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