अमर उजाला में नैतिक साहस है तो अपने अभियान की समीक्षा करे

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आज भी आगरा का नंबर वन अखबार है। इस अखबार पर लोग भरोसा करते हैं आज भी। लेकिन यह अखबार लोगों का भरोसा तोड़ रहा है। शहर के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है। इसका एक उदाहरण देना ही पर्याप्त होगा। अमर उजाला ने पिछले मानसून में शहर में पौधारोपण अभियान चलाया।

पौधे लगाने के कार्यक्रम प्रायोजित कराए जाने लगे। छपासू लोग सक्रिय हो गए। हाथ में पेड़ लिया और फोटो खिंचवाकर भेजने लगे। फोटो छपने लगे। अखबार को लगा कि उसके आह्वान का असर हो अमर उजालारहा है। शहर के लाखों लोग पेड़ लगा रहे हैं। अमर उजाला ने कुछ बिल्डरों के साथ मिलकर भी अभियान चलाया। ट्री गार्ड में मदद की। लेकिन इस अभियान की पोल अब आकर खुली है।

केन्द्रीय हिन्दी संस्थान रोड पर अमर उजाला ने पुष्पांजलि कंस्ट्रक्शन के साथ रोड डिवाइडर पर पौधे रोपे। ट्री गार्ड पर दोनों का नाम लिखा हुआ है। इनमें एक भी पेड़ नहीं है। अधिकांश ट्रीगार्ड बस खड़े हुए हैं। पौधे कहां गए, कोई नहीं जानता है। ऐसा भी नहीं है कि ये स्थान शहर से बाहर है। अमर उजाला के रिपोर्टर यहां से निकलते रहते हैं। इसके बाद भी कोई नहीं देखता है।

अखबार वाले हमेशा दूसरों को उपदेश देते हैं। सवाल ये है कि इनकी गलतियों को कोई क्यों नहीं छापता। अमर उजाला ने पेड़ लगाने के नाम पर सिर्फ हल्ला-गुल्ला किया था। यह प्रकट किया कि उसे ही शहर की चिंता है। लेकिन हकीकत यह है कि पेड़ लगाने का अभियान केवल अखबारी था। अपने चहेतों के फोटो छापने का था।

एक समाजसेवी का तो रोज ही फोटो छापा गया। पेड़ लगाने के बाद उनका रखरखाव करने की जिम्मेदारी किसकी थी, अमर उजाला ने किस व्यक्ति को जिम्मेदारी दी थी, उसने क्यों नहीं निभाई। अगर किसी सरकारी विभाग को यह काम करना था तो उसका ध्यान क्यों नहीं आकर्षित किय़ा गया। आगरा के लोगों को कतई उम्मीद नहीं है कि अमर उजाला भी इस तरह शहर के साथ खिलवाड़ करेगा। वह भी सरकार की तरह कागजी काम करेगा। वन विभाग तो इस तरह के कार्यों के लिए बदनाम है ही। अमर उजाला भी उसी के पदचिह्नों पर चल रहा है। ऐसे में अमर उजाला और वन विभाग में क्या अंतर है।

अखबार बेचने के लिए बहुत से फंडे अपनाये जाते हैं लेकिन जिस शहर में नंबर वन हों, उसी शहर में गड़बड़ी कर रहे हैं। अखबार का मामला है इसलिए कोई बोलता नहीं है। यही काम अगर किसी सरकारी विभाग, एनजीओ या अमर उजाला को भाव न देने वाले व्यक्ति ने किया होता तो अमर उजाला पहले पेज पर स्टोरी छापता। अगर अमर उजाला में जरा सा भी नैतिक साहस है तो वह अपने पेड़ लगाओ अभियान की खुद समीक्षा करे और फोटो समेत खबरें छापे। कभी-कभी अखबार वालों को भी अपने गिरेबां में झांक लेना चाहिए।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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