पत्रकारों की पहल : चैत्र नववर्ष पर लखनऊ में आयोजित करेंगे मेला

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उत्तर प्रदेश की राजधानी के पत्रकारों ने अनूठी पहल की है। तीन और चार अप्रैल को नेशनल इंटर कालेज के मैदान में भारतीय नव वर्ष मेले के आयोजन का बीड़ा उठाया है। पिछले मार्च माह में कुछ प्रमुख पत्रकारों की पहल पर भारतीय नव वर्ष मेला आयोजन समिति का गठन किया गया। यही समिति मेले का आयोजन कर रही है।

समिति में प्रसिद्ध स्तंभकार और स्वतंत्र भारत के पूर्व संपादक राजनाथ सिंह सूर्य, राष्ट्रीय स्वरूप के संपादक नरेंद्र भदौरिया, पत्रकार आनंद मिश्र अभय, राजेंद्र प्रकाश, भारतीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक अशोक सिन्हा, संस्थान में सक्रिय अमरनाथ, स्तंभकार जय तिलक और डाक्टर दिलीप अग्निहोत्री के साथ ही करीब-करीब सभी प्रमुख समाचार पत्रों के पत्रकार इस समिति से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़े हैं।

समिति की पहली बैठक हुई तो भारतीय नव वर्ष (प्रतिपदा) मनाएं क्यों? इस विषय पर ही पत्रकार बहस में उलझ गए। मतभिन्नता के साथ विविध विचार आए। भारत समेत पूरे विश्व में बहुप्रचलित अंग्रेजी नव वर्ष (एक जनवरी) पर व्यापक चर्चा हुई। अंत में पाया गया कि अंग्रेजी नव वर्ष हालांकि भारतीय सांस्कृतिक परिवेश से मेल नहीं खाता, फिर भी चूंकि पूरे विश्व का कलेंडर इसी से नियंत्रित होता है, उसे छोड़ना संभव नहीं है और न ही व्यवहारिक, इसलिए उसे अंगीकार करते हुए तय किया गया कि भारतीय नव वर्ष जो चैत्र नवरात्र की प्रतिपदा से शुरू होता है, को जनजीवन और अपने पारिवारिक संस्कारों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।

बैठक में यह सवाल भी तैरा कि पत्रकार ही इसकी पहल क्यों करें? बहरहाल इस सवाल पर ज्यादा माचापच्ची होने की नौबत ही नहीं आयी। सहमति इस बात पर रही कि पत्रकार समाज का सबसे अधिक जागरूक नागरिक माना जाता है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी माना जाता है। अपनी लिखाई-पढ़ाई से इतर उसका कुछ सामाजिक दायित्व भी होता है। उसके भी राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकार होते हैं। उसे इनसे मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। अंत में तय किया गया कि सीधा और प्रभावकारी संदेश देने का सशक्त माध्यम मेला ही हो सकता है। तय हुआ कि तीन और चार अप्रैल को दो दिवसीय मेला लगाया जाए। चार अप्रैल को प्रतिपदा (चैत्र प्रतिपदा-नव वर्ष का पहला दिन) है। तीन को मेले की शुरुआत कर चार को उसका समापन किया जाए। नेशनल इंटर कालेज के मैदान में यह समारोह होगा।

पत्रकार जब मेले के आयोजन के प्रचार और लोगों के उससे जोड़ने निकले तो गजब का अनुभव सामने आया। राजनीतिक दलों से लेकर समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों के बीच भारतीय नव वर्ष (प्रतिपदा, शुक्ल एक) को लेकर जबरदस्त उत्साह दिखा। यहां तक कि मुसलमानों ने इस पहल का स्वागत किया है। पूर्व विधान परिषद सदस्य सिराज मेहदी सबसे पहले सामने आए। सिराज मेंहदी ने तो कवि सम्मेलन और मुशायरा प्रायोजित करने की पहल की। इसी क्रम में सपा नेता जुही सिंह जुड़ीं तो बसपा के मेयर पद के प्रत्याशी अरुण द्विवेदी ने भी जुड़ने की मंशा जाहिर की।

सरस रामकथा वाचक प्रेमभूषण महराज को जब पता चला तो उन्होंने खुद ही इससे जुड़ने की पहल की और उद्घाटन कार्यक्रम में आना स्वीकार किया। गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ ने भी उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने का फैसला किया। लखनऊ के महापौर दिनेश शर्मा ने नगर निगम की ओर से मेला वाले मैदान को ही ठीक करा डाला। शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर (तुलसीपुर-बलरामपुर) के महंत कौशलेंद्र नाथ योगी, मनकामेश्वर मंदिर (लखनऊ) की महंत दैव्यागिरी, नेशनल इंटर कालेज के प्रबंधक अनिल सिंह, बसपा नेता सुधीर हलवासिया, अखिल भारतीय मानस परिवार के वीरेंद्र कुमार गुप्त, ओपी श्रीवास्तव, आशाराम बापू से जुड़ी योग वेदांत समिति, सिंधी समाज के प्रदेश प्रमुख नानक चंद लखमानी, गायत्री परिवार के प्रदेश प्रमुख उमानंद शर्मा आदि जुड़ते चल गए। लखनऊ में मेले से संबंधित जितनी भी होर्डिंग लगी हुई हैं, वे सभी किसी न किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा लगवाई गई हैं।

दरअसल प्रतिपदा के अवसर पर पड़ने वाला भारतीय नव वर्ष देश में संभवतः सबसे ज्यादा उपेक्षित त्योहार है। होली, दीपावली, दशहरा, ईद, बकरीद, अंग्रेजी नव वर्ष तो बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर में बाजार का दबाव भी इनके धूमधाम से मनाए जाने का कारण बना। बाजार के दबाव ने ही भारत में फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेंटाइन डे आदि पाश्चात्य रीति-रिवाजों को त्योहार सी स्वीकृति दिला दिया। कंपनियों ने अपने उत्पाद बेचने के लिए प्रचार का सहारा लिया। आज हालात यह है कि दिसंबर का अंतिम सप्ताह आते-आते लोग विशेष रूप से नवजवान पीढ़ी पर उसकी खुमारी चढ़ने लगती है। 31 दिसंबर की रात 12 बजे के बाद तो रातभर धमाल की स्थिति रहती है। यही हाल होली, दापीवली औ ईद-बकरीद के अवसरों पर होती है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को अगर सरकारें न मनाएं तो वे भी उपेक्षित ही रहेंगे।

बहरहाल इन सबमें सबसे खराब हालत भारतीय नव वर्ष की है। जबकि सरकार से लेकर समाज तक भारतीय कालगणना पर आधारित कलेंडर के अनुसार सारे शुभ कार्य करते हैं। पारिवारिक शुभ कार्यों से लेकर समाज के सारे प्रमुख त्योहार इसी पर आधारित होते हैं। भारत सरकार और प्रदेश सरकारों के बजट तक कमोवेश भारतीय कलेंडर पर आधारित हैं। समाचार पत्र भी इसी का सहारा लेते हैं। प्रेस विज्ञप्ति


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