महिलाओं के संघर्ष की दास्‍तान है 'बोल के लब आजाद हैं तेरे'

E-mail Print PDF

: किताब की पात्रों ने किया विमोचन : ज़िंदगी का यह अलग ही रंग था। जिंदगी अपने कई-कई रूप में बाहें पसारे आलिंगन में भरने के लिए मानो तैयार खड़ी थी। उन रंगों में रंजो-ग़म भी था और संघर्ष के बाद पसरी एक बड़ी और विशाल दुनिया का अक्स भी। मर्दों की दुनिया में अपनी पूरी पहचान बनाने की ज़िद भी और अपने हक़ के लिए पूरी शिद्दत के साथ आवाज़ बुलंद करने की छटपटाट भी।

देहरादून में उत्तराखंड के दूरदराज़ के इलाकों से आईं इन महिलाओं में उत्साह भी था और उल्लास भी। उनके चेहरों पर लिखी इबारतों को पढ़ते हुए उनके जीवन के दुख-सुख को आसानी से पढ़ा जा सकता था। जया श्रीवास्तव के साथ सभागार में पहुंचा तो गीता गौरेला सामने ही खड़ी थीं, अपनी जानी-पहचानी मुस्कान के साथ। हेमलता खंडूड़ी और चंद्रा जी उनके साथ थीं। गीता जी उत्तराखंड में महिला सामख्या की प्रमुख हैं और प्रदेश की महिलाओं की लड़ाई में हमेशा आगे रहती हैं। यों कहने को तो वे अधिकारी हैं लेकिन साथी-संगियों में वे दीदी के नाम से ही जानी जाती हैं। साहित्य से उनका लगाव किसी से ढका-छुपा नहीं है। हालांकि उनके इस लगाव का पता मुझे काफ़ी बाद में चला।

बाद में कई पत्रिकाओं में उनकी कविताएं पढ़ने का मौक़ा भी मिला। लेकिन लिखने से ज्यादा वे पढ़ने पर यक़ीन रखती हैं और जितना वे पढ़ती हैं मुझे नहीं लगता कि हिंदी साहित्य के नामचीं लेखक-कवि उतना साहित्य नियमित पढ़ते होंगे। यही कारण है कि वे दूसरे अधिकारियों से अलग हैं क्योंकि उनके भीतर संवेदनाओं की एक नदी कलकल बहती दिखाई देती है। उनके भीतर बहती यह नदी कभी नहीं सूखती है। सरकारें आईं और गईं लेकिन यह नदी लगातार बहती रही और यही गीता गैरोला की बड़ी ताक़त भी है। थकना उन्होंने सीखा नहीं है और चलने के लिए वे बराबर तैयार रहती हैं। महिला सामख्या के इस सालाना कार्यक्रम में उनकी तत्परता को देख कर ढेरों लोगों को उनसे प्रेरणा मिलती होगी। उन महिलाओं को तो ज़रूर जिनके संघर्ष में वे साथ खड़ी होती होंगी।

सभागार में पूरे उत्तराखंड से आईं महिलाएं बैठी गीत-संगीत पर थिरक रही थीं। उन गीतों में कुछ करने की ललक थी और ज़िंदगी को अपने नज़रिए से देखने की अदम्य इच्छा भी। सभागार पहुंचने में थोड़ी देर हो गई थी। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने में थोड़ा विलंब था। तैयारी मुकम्मल थी। एक पुस्तक का विमोचन भी होना था। उद्घाटन से ठीक पहले ढोल-डमाऊ की आवाज़ से सभागार गूंजने लगा। उत्तराखंड के इस परंपरागत वाद्य यंत्र को सुनना किसी अनुभव से गुज़रने जैसा ही है। यों भो लोक वाद्य यंत्र जीवन को नए अहसासों से भर देते हैं। ज़िंदगी के कई-कई रंग इनमें पूरी शिद्दत के साथ घुलेमिले होते हैं और इन रंगों में आदमी भीतर तक सराबोर दिखाई देता है।

महिला सामख्या के कार्यक्रम में इस रंग में एक रंग और घुला। अमूमन ढोल-डमाऊ पुरुष ही बजाते हैं लेकिन परंपरा को नकारते हुए कुछ महिलाओं ने ढोल-डमाऊ बजाने में निपुण्णता हासिल की और फिर इस वाद्य यंत्र को अपने जीवन का आधार बनाया। समारोह में उनकी थाप में यह अहसास भी घुलामिला था। उनके अपने होने का अहसास। ढोल-डमाऊ से जीवन का यह राग शिद्दत के साथ फूट रहे थे और हम ढोल-डमाऊ बजाती दोनों महिलाओं की चपलता और आंखों की चमक को देख कर अभिभूत थे। ढोल-डमाऊ की इन आवाज़ों में सैकड़ों महिलाओं की आवाजें भी शामिल थीं और यही वजह है कि सभागार में जीवन के शोख़-चटक रंग हर तरफ़ बिखर गए थे।

विमोचन

पर अभी तो कई और रंग बिखरने बाक़ी थे। सभागार में मौजूद हर महिला की अपनी एक अलग कहानी थी। घर-परिवार के बीच रिश्तों की सलीब ढोती उन महिलाओं ने जीवन के नजाने कितने काले-धूसर रंग देखे हैं, ठीक-ठीक उन्हें भी नहीं पता। लेकिन नाहिद, नंदी की तरह दूसरी महिलाऐं जब अपनी कहानी बयान करती हुई चुप हो जातीं या फिर रोने लगतीं तो उनकी ख़ामोशी और आंसू उनकी बेरंग जिंदगी की अनकही दास्तान लोगों के सामने रख देते। ऐसी ही अनकही दास्तान को महिला सामख्या ने एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। पुस्तक का नाम रखा है 'बोल के लब आज़ाद हैं तेरे'।

इस पुस्तक का विमोचन भी समारोह में किया जाना था और अमूमन पुस्तकों का विमोचन लेखक-कवियों, समाजसेवियों या इसी तरह की दूसरी हस्तियों के हाथों किए जाने की परंपरा रही है। उम्मीद ऐसी ही थी कि 'बोल के लब आज़ाद हैं तेरे' का विमोचन भी इसी तरह का होगा। सभागार में कई नामचीन लेखक-समाजसेवी मौजूद थे। मैत्रीय पुष्पा, बटरोही, राधा बहन, नूर ज़हीर, रजनी तिलक सहित और कई दूसरी शख्सियत मौजूद थीं। लेकिन गीताजी ने परंपरा को तोड़ते हुए पुस्तक का विमोचन उन हाथों से कराया, जिनकी दास्तान इस पुस्तक में क़लमबंद की गई हैं। यह एक ऐतिहासिक क्षण था। लेखक, पात्र और श्रोता के बीच किसी तरह की विभाजन रेखा नहीं थी।

लेखक पात्र बन गए थे और पात्र श्रोता। लेखकों-पत्रकारों और समाजसेवियों के बीच जब उन महिलाओं ने 'बोल के लब आज़ाद हैं तेरे' को  विमोचित किया तो सभागार में देर तक तालियां बतजी रहीं। अपने तरह के इस अनोखे आयोजन का गवाह बनना मुझे नया सुख दे रहा है और यह सुख मेरे भीतर रोज़ क़तरा-क़तरा उतर कर मुझे भी ताक़त देता है। पुस्तक का विमोचन करने वाली जया, गुड्डी, माधुरी, अर्चना, नाहिद,  नंदी, रीना और सरिता की आंखों में विश्वास की दपदपाती लौ एक नई दुनिया का आभास दे रही थी।

'बोल के लब आज़ाद हैं तेरे' कोई बड़ी साहित्यिक कृति नहीं है और न ही इसका संपादन करने वाले इस तरह का कोई दावा करते हैं लेकिन यह किताब सामाजिक स्तर पर एक बड़ी लकीर ज़रूर खींचती है, क्योंकि पुस्तक उन महिलाओं को सवाल करने के लिए प्रेरित करती है जो घर, परिवार और समाज की बंदिशों में जकड़ी रोज़ तिल-तिल कर मरती हैं। महिला सामख्या ने उस समाज को साहित्य का हिस्सा बनाया है, जो समाज अमूमन हमारे साहित्य का हिस्सा नहीं बन पाता है। यह एक पहल है। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।


AddThis