यादों में आलोक : आयोजन की कुछ बातें, मेरी नजर से

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पत्रकार मयंक सक्सेना भारतीय जाति प्रथा के अनुसार कायस्थ हैं, पर आलोक तोमर उनके पिता की तरह थे (या जैसा मयंक ने स्वयं कहा उनके दूसरे पिता थे). दुष्यंत राजस्थान के पत्रकार और लेखक हैं, आलोक तोमर से कोई दूर-दूर का पारिवारिक रिश्ता नहीं था पर उनकी आँखें ऐसे डबडबाई हुई थी जैसे उन्होंने कोई सगा खो दिया हो.

 

 

जयंत तोमर किसी तरह आलोक जी के रिश्ते में हो भी सकते हैं और शायद ना भी हों पर मध्य प्रदेश से पत्रकारिता के ये प्रोफ़ेसर फेसबुक से मात्र इसीलिए नफरत करने लगे हैं क्योंकि आलोक तोमर की मृत्यु से मात्र तीन-चार दिन पहले उन्होंने नया-नया फेसबुक सिख कर उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया था.

राम बहादुर राय पत्रकारिता के इतिहास के श्लाघापुरुष हैं और अपने आप में एक मानदंड नही, पर उन्हें आलोक तोमर की पहली और दूसरी पुस्तक के पन्नों की संख्या, लेख के डिटेल्स और भूमिका में लिखी हुई एक-एक बात शब्दशः याद हैं. पुण्य प्रसून वाजपेयी हिंदी टेलीविजन का एक बहुत बड़ा नाम हैं पर वे भी आलोक तोमर को अपना आदर्श और संबल ही मानते हैं. संतोष भारतीय हिंदी पत्रकारिता के सहारे भारतीय संसद तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं और अपनी लेखनी और तेवर के लिए बहुत सम्मानित माने जाते हैं पर वे भी कई बार यह कहने से नहीं हिचके कि आलोक में अदभुत मेधा और क्षमता थी. राहुल देव को पूरा भारतीय पत्रकारिता जगत ना सिर्फ जानता और पहचानता है बल्कि बहुत सम्मान भी देता है, लेकिन उनका कहना है कि ऐसे कितने लोगों को आलोक की तरह सौभाग्य मिलता है कि नए-नए पत्रकार यह कहते हों मुझे आलोक तोमर बनना है. जगदीश चंद्र ई टीवी के बड़े ओहदे पर हैं और निश्चित रूप से पत्रकारिता सत्ता के शीर्ष पर हैं पर आलोक तोमर के लिए हैदराबाद से आ कर कार्यक्रम में शिरकत करना और अपने अंतरतम के भावों को व्यक्त करना अपना अहोभाग्य समझते हैं.

संजय कुमार सिंह आलोक तोमर से पत्रकारिता में थोड़े कनिष्ठ पर लगभग समकालीन माने जायेंगे पर वे बस इतना ही जानते है कि आलोक जैसा कोई नहीं था. वर्तिका नंदा स्वयं एक प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, एक बड़े अधिकारी की पत्नी हैं पर पूरे समय कार्यक्रम में ना सिर्फ रहती हैं बल्कि जब अपनी बात कहने लगती हैं तो लोगों के दिलों के पोर छु जाते हैं.

परमानंद पांडेय पत्रकारों के नेता हैं, सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता भी हैं और पत्रकार यूनियन के महासचिव है. वे ऐलानिया कहते हैं और बहुत जोरों से कहते हैं कि पत्रकारों में नब्बे फीसदी (यह प्रतिशत वे कहाँ और किस आधार पर निकाल कर लाये हैं मैं नहीं जानता पर इतना अवश्य है कि वे इस प्रतिशत के बारे में बहुत अधिक आश्वस्त हैं) लोग “कायर और डरपोक” होते हैं जो निरंतर मात्र इसी फिराक में रहते हैं कि कैसे मालिकान को खुश करके अपना उल्लू सीधा किया जाए. पर वे भी यह कहने से नहीं चुकते कि आलोक तोमर इन नब्बे फीसदी से बिलकुल अलग थे. वे आलोक के ट्रेड यूनियन विषयक सहयोगों के मन से आभारी हैं. मुक्तिनाथ उपाध्याय बिहार के हैं, नामचीन नेता कल्पनाथ राय के दामाद हैं और पत्रकार हैं पर जब आलोक तोमर की बात करते हैं तो उनकी आँखें डबडबा जाती हैं.

अर्जुन शर्मा पंजाब से हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं, पर आलोक तोमर को अपना बड़ा भाई मानते हैं और उनके साथ बिताये पलों को अपने जीवन की धरोहर मानते हैं. इश मधुर तलवार राजस्थान में पत्रकारिता के आदिगुरु हैं पर आलोक तोमर के समक्ष वह भी नतमस्तक हैं. मदन तिवारी गया के रहने वाले हैं, एडवोकेट हैं, जर्नलिस्ट हैं, लेकिन आलोक तोमर का कार्यक्रम है लिहाजा गया से उठ कर दिल्ली अपनी श्रद्धांजलि देने चले आते हैं.  विनायक विजेता पटना के वरिष्ठ पत्रकार हैं और उनको भी यही उदगार दिल्ली खींच लाते हैं.

इससे अलग हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका पद्मा सचदेव हैं जिसका कहना है कि आलोक उनको माँ कहता था और माँ मानता भी था. इससे आगे वे कहती हैं कि आलोक ऐसा था जिसने एक गाँव से आ कर दिल्ली में ना जाने कितने ही घरों के दरवाज़े अपने लिए खोल लिए थे जहां वह कहीं भाई, कहीं बेटा, कहीं साथी और कहीं रखवाला बना हुआ था. वे गर्व से कहती हैं कि आलोक को बेटे के रूप में पा कर उन्हें अभिमान है.

यशवंत सिंह गाजीपुर के हैं, युवा पीढ़ी के हैं और मुझे लगता है भड़ास निकालने के बाद ही शायद आलोक तोमर के संपर्क में आये होंगे पर आज वे आलोक तोमर को अपना बड़ा भाई, अपना अभिभावक, अपना सब कुछ मानते हैं. आलोक तोमर के सम्मान को वे निरंतर अपने सीने से लगाए रहते हैं.

यह अमिताभ उस आलोक तोमर से कभी नहीं मिला जब तक वह जीवित थे. हाँ, तीन या चार बार आलोक तोमर की आवाज़ जरूर सुन पाया था पर आज वह आलोक तोमर पर अपना उतना ही हक समझता है जितना उनके दशकों पुराने मित्र और यह मानता है कि आलोक तोमर के साये के संपर्क में भी आना उसके लिए अभिमान का विषय है.

ये वे चंद बानगियाँ हैं जो कल दिल्ली में आलोक तोमर की स्मृति में आयोजित समारोह में देखने को नज़र आये. इसके अलावा ना जाने कितने भाव, कितनी भावाभिव्यक्ति, कितनी अंदरूनी अनुभूतियाँ और कितनी ही अंतरतम की भावनाएं इस समारोह में सामने आती ही चली गयीं कि समझ में नहीं आ रहा था कि आलोक तोमर नामक यह शख्स आदमी था या भूत. आदमी के दो हाथ, दो पाँव, एक दिमाग और एक स्वरुप होता है पर आलोक तोमर का विशालकाय व्यक्तित्व इन सभी सीमाओं से बहुत ही आगे था. जैसा मयंक ने सही कहा, आलोक तोमर दफ्तर के चपरासी और बाबू से ले कर चैनल के मालिक तक सबों के लिए बराबर रूप से सहज थे और जटिल भी. फिर जैसा राहुल देव कहते हैं आलोक तोमर आलोक तोमर ही थे, उन्हें किसी अन्य रूप में या किसी अन्य सांचे में फिट करके घोषित नहीं किया जा सकता. आलोक तोमर जन्मना पत्रकार थे. कल्टीवेटेड जर्नलिस्ट नहीं थे.

भाई मेरे, मैं तो वहाँ तीन- साढ़े तीन घंटे रहने के बाद यही जान सका कि आलोक तोमर वास्तव में कोई ऐसे आदमी थे जो पूरी तरह आदमी थे, अपनी कमजोरियों, अपनी अच्छाईयों, अपनी मजबूती, अपने दंभ, अपने दर्प, अपने स्नेह, अपने विश्वास, अपने दुःख, अपने सुख, अपनी हसरतें, अपने सपने, अपनी बुद्धि, अपने विवेक, अपनी मेधा, अपनी क्षमता, अपने जिद, अपने झक, अपने शब्द विन्यास, अपनी गहरी अनुभूति, अपने फक्कडपन, अपनी बेलौसी, अपने अंदाज़, अपने झुंझलाहट, अपनी तल्खी और अपनी आतंरिक मृदुता के साथ पूरी तरह मनुष्य.

मैं यह भी समझ गया कि आलोक तोमर बनाने से नहीं बन सकता, आलोक तोमर को तो कोई और ही बना देता है और फिर संसार में भेज देता है कि जाओ आलोक तोमरई करो. आलोक तोमर ने जीवन भर आलोक तोमरई की, बहुत जम के आलोक तोमरई की और इस हद तक आलोक तोमरई की कि यह शायद कोई और कर ही नहीं सकता है. कल के पूरे समारोह से मैं बस यही निष्कर्ष निकाल पाया.

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं, इन दिनों मेरठ में कार्यरत हैं.


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