फोटो पत्रकार दीपक ने अपने अंदाज में मनाया विश्‍व धरोहर दिवस

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युवा फोटो पत्रकार दीपक शर्मा ने विश्व धरोहर दिवस को इस साल भी अपने अंदाज में मनाया। अजमेर के ऐतिहासिक अकबर के किले में उन्होंने अपने चुनिंदा 45 फोटो की प्रदर्शनी 'विरासत'  का आयोजन किया। 18 से 20 अप्रैल 2011 तक आयोजित इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी को कई लोगों ने देखा और दीपक की प्रशंसा किए बगैर नहीं रहे। दीपक ने इस प्रदर्शनी में अजमेर की संस्कृति, धरोहर और पारम्परिक मेलों को दर्शाते अपने फोटो प्रदर्शन के लिए चुने। इन फोटो को देखकर कोई भी अपनी संस्कृति और धार्मिक नगरी अजमेर पर गर्व महसूस कर सकता है।

तीर्थराज पुष्कर का अंतराष्ट्रीय मेला, गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स, होली के बादशाह मेले की सवारी, लाल्या-काल्या का मेला, गणगौर की सवारी के साथ ग्रामीण परिवेश का जीवंत दर्शन इन फोटो से होता है। 1979 में जन्मे दीपक की चौथी एकल फोटो प्रदर्शनी थी। ऐतिहासिक धरोहर और संस्कृति के प्रति उनका शुरू से रूझान है और उनकी फोटो के विषय भी अक्सर इसी के इर्द-गिर्द होते हैं। 'ख्वाजा गरीब नवाज' नामक उनकी एक फोटो पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसका विमोचन प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह ने किया था। कोटा के दशहरा मेले और नागौर के पशु मेले में भी उनकी फोटो प्रदर्शित हो चुकी हैं। दीपक के फोटो 'आउटलुक ट्रैवलर'  और 'बीबीसी वर्ल्ड डॉट कॉम'  पर भी आ चुके हैं। पुष्कर मेले में आयोजित फोटो प्रतियोगिता में दीपक पिछले आठ सालों से लगातार श्रेष्ठ फोटोग्राफर का खिताब हासिल कर रहे हैं।

फोटो पत्रकार के रूप में दीपक के जीवन की शुरूआत 1998 में दैनिक भास्कर के ' महानगर प्लस' पृष्ठ से हुई थी। उन दिनों दैनिक भास्कर रंगीन नहीं हुआ था। ख्वाजा गरीब नवाज का 786 वां उर्स था। उर्स के दौरान 'महानगर प्लस' पर छपे दीपक ने श्वेत-श्याम फोटो काफी चर्चित रहे। पहली दफा किन्नरों की जिन्दगी को इन फोटो में अलग ढंग से प्रस्तुत किया गया। उसके बाद दीपक के फोटो टाइम्स आफ इंडिया, इंडिया टुडे आदि से लेकर कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे।

ऐतिहासिक अकबर के किले में इस फोटो प्रदर्शनी का आयोजन कर दीपक ने ना केवल अपनी कला का प्रदर्शन किया बल्कि उपेक्षित पडे़ अकबर के किले की ओर पर्यटकों और अजमेरवासियों का ध्यान आकर्षित करने का रचनात्मक काम भी किया है। बादशाह अकबर ने इस किले का निर्माण गुजरात और पाकिस्तान पर अपने शासन के नियंत्रण के लिए किया था। महाराणा प्रताप के साथ हुए ऐतिहासिक हल्दी घाटी युद्ध की रणनीति इसी किले में बनी थी। अकबर और जहांगीर ने अपना काफी वक्त यहां निकाला।

औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच हुए ऐतिहासिक देवराई के युद्ध का संचालन औरंगजेब ने यहीं से किया था। यही वह ऐतिहासिक किला है जिसकी बुर्ज के नीचे एक याचक की स्थिति में खडे़ अंग्रेज राजदूत सर थॉमस रो को मुगल बादशाह जहांगीर ने हिन्दुस्तान में ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार करने की अनुमति दी थी। वह 10 जनवरी का दिन था। कई देशभक्त आज भी 10 जनवरी को यहां आकर जूते फटकारते हैं, उनके मुताबिक हिन्दुस्तान की गुलामी की शुरुआत इसी मनहूस जगह से हुई थी। बाद में अंग्रेजों ने इसे अपने कब्जे में ले लिया और यहां अपना शस्त्रागार बनाया। तब से इसे मैगजीन के नाम से भी जाना जाता है।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.


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