मीडिया का दूसरा नाम विपक्ष और हस्तक्षेप

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: रामनगर (उत्तराखंड) में 14 वरिष्ठ पत्रकार हुए सम्मानित : रामनगर। श्रमजीवी पत्रकार यूनियन रामनगर ईकाई ने पत्रकारिता दिवस के मौके पर वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित करने के साथ ही गोष्ठी आयोजित की। नवनिर्मित आडिटेरियम भवन में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ हाईकोर्ट के न्यायाधीश पीसी पंत व कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वीपीएस अरोरा ने दीप प्रज्जवलित कर किया।

कार्यक्रम के पहले सत्र में 14 वरिष्ठ पत्रकारों को पत्रकारिता में उल्लेखनीय कार्य के लिए शाल, प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। इनमें से 5 को मरणोपरांत सम्मान उनके परिजनों को दिया गया। दूसरे सत्र में बदलते दौर में हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां विशय पर गोष्ठी में बोलते हुए दिल्ली से आए मीडिया समीक्षक विनीत कुमार ने कहा कि पत्रकारिता, बाजार व सत्ता के गठजोड़ ने मीडिया के संघर्ष को खत्म कर दिया है। सत्ता के गलत कामों के खिलाफ उठने वाली आवाज कम होती जा रही है। वर्तमान दौर की पत्रकारिता ने अपने भीतर का विपक्ष मार दिया है। पत्रकारिता का उददेश्य मुनाफा कमाना ही रह गया है। मीडिया का दूसरा नाम विपक्ष व सशक्त हस्तक्षेप है।

ब्लॉगर अविनाश दास ने कहा कि वर्तमान दौर निराशा नहीं उम्मीदों से भरा है। आज जनता के पास पत्रकारिता का हथियार है। न्यू मीडिया ने पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मास कम्मयूनिकेशन दिल्ली के प्रवक्ता भूपेंद्र सिंह ने कहा कि अखबार को बाजार में वस्तु बनाकर बेचा जा रहा है। इसके चलते अखबार से जनपक्षीय सरोकार गायब होते जा रहे हैं। देश में मीडिया का संकेन्द्रीकरण हो गया है, जो कि समाज के लिये खतरा है। वर्तमान पत्रकारिता पर कटाक्ष करते हुये उन्होंने कहा कि वह जनता के मनोविज्ञान व विचार को प्रभावित करने के लिये माहौल क्रियेट करने का काम कर रहा है। अखबारों को वैचारिक के स्थान पर बाजार का एक सामान्य प्रोडक्ट करार देते हुये श्री सिंह ने कहा कि पूरा मीडिया आज बाजार में बिकने के लिये तैयार है।

कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति डा. वीपीएस अरोरा ने कहा कि विश्वसनीयता को फिर से कायम करना मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। मीडिया के प्रति लोगों की संवेदनशीलता कम हो रही है। नकारात्मक खबरों के बजाय सकारात्मक खबरों को अखबार में ज्यादा जगह देने की जरूरत है। मुख्य अतिथि हाईकोर्ट के न्यायाधीश पीसी पंत ने कहा कि तथ्यों की सत्यता जांचने के बाद ही पत्रकार को रिपोर्टिंग करनी चाहिए। तथ्यात्मक पत्रकारिता को बढ़ावा देने की जरूरत है। अदालतों में लंबित प्रकरण पर चर्चा हो सकती है, मगर इन पर टिप्पणी नही की जानी चाहिए। न्यायपालिका पर दवाब नही बनाया जा सकता है।

विधायक दीवान सिंह बिष्ट व पालिकाध्यक्ष मोहम्मद अकरम ने सफल आयोजन के लिए यूनियन को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का संचालन यूनियन के नगर अध्यक्ष गणेश रावत ने किया। कार्यक्रम में देहरादून से आए वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला, कुंडल चौहान, ऊधमसिंहनगर से जहांगीर राजू, हल्द्वानी से ओपी पांडे, नैनीताल से कमल जगाती, राजीव खन्ना, रविंद्र देवलियाल, कालाढूंगी से सतीश जोशी, बद्रीसिंह बिष्ट, धूमाकोट से मनीश सुंद्रियाल, काशीपुर से प्रेम अरोरा, बाजपुर से जगतार बाजवा, रामनगर से गोविंद पाटनी, खुशाल रावत, त्रिलोक रावत, जितेंद्र पपनै, विनोद पपनै, चंदन बंगारी, आसिफ इकबाल, रोहित गोस्वामी, अनिल अग्रवाल, हरीश भटट सहित अनेक पत्रकारों, राजनैतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।

पहली प्रेस विज्ञप्ति

न्यायिक प्रक्रिया में मीडिया का हस्तक्षेप गलत परंपरा : जस्टिस पंत

रामनगर। पत्रकारिता में क्षेत्र में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान एक पक्ष को सच साबित करने की कोशिश न्यायिक प्रक्रिया की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा करती है, इसलिये पत्रकारों को इससे बचने का प्रयास करना चाहिये। यह विचार आज पत्रकारिता दिवस के मौके पर श्रमजीवी पत्रकार यूनियन द्वारा ‘बदलते दौर में हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां’ विषय पर आयोजित गोष्ठी मे बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुये राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीसी पंत ने व्यक्त किये।

प्रेक्षागृह में आयोजित इस कार्यक्रम में मौजूद खबरनवीसों का आह्वान करते हुये श्री पंत ने कहा कि रिपोर्ट फाइल करने से पूर्व पत्रकारों को तथ्यों की सत्यता को परखना चाहिये। उनका मानना था कि झूठ की अपेक्षा अर्द्धसत्य कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। तमाम चुनौतियों के बाद भी पत्रकारिता को पठनीय बनाने का श्रेय जमीनी स्तर की पत्रकारिता को देते हुये श्री पंत ने कहा कि भारत में प्रेस की भूमिका एक प्रहरी की है, जो कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिये आवश्यक है। इससे पूर्व कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि कुमायूं विश्वविद्यालय के कुलपति वीपीएस अरोरा ने नकारात्मक खबरों की आलोचना करते हुये कहा कि यदि समाज में इसे क्षति पहुंचाने वाले लोग हैं तो समाज में उल्लेखनीय काम करने वाले भी हैं। लेकिन मीडिया नकारात्मक खबरों को प्राथमिकता देता है जिससे मीडिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ा है।

कार्यक्रम में दिल्ली से आये अविनाश दास ने नागरिक पत्रकारिता की वकालत करते हुये कहा कि इससे पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रही गिरावट को दूर करने में मदद मिलेगी। भूपेन सिंह ने कहा कि मीडिया हाउस के आधारभूत ढांचे को परिभाषित करते हुये देश में मीडिया का संकेन्द्रीकरण हो गया है, जो कि समाज के लिये खतरा है। वर्तमान पत्रकारिता पर कटाक्ष करते हुये उन्होंने कहा कि वह जनता के मनोविज्ञान व विचार को प्रभावित करने के लिये माहौल क्रियेट करने का काम कर रहा है। अखबारों को वैचारिक के स्थान पर बाजार का एक सामान्य प्रोडक्ट करार देते हुये श्री सिंह ने कहा कि पूरा मीडिया आज बाजार में बिकने के लिये तैयार है। वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान ने अपने संदेश में पत्रकारिता को भावनाओं से जोड़कर करने व घटनाओं के दूरगामी प्रभावों से जोड़ने की सीख दी।

मुनीष कुमार ने उदारीकरण व वैश्वीकरण के दौर में मीडिया पर खबरों को छिपाने का आरोप लगाते हुये कहा कि बड़े मीडिया घरानों के कारण जो पत्रकार आज अपने ही उत्पीड़न के सामने असहाय है वह जनता के उत्पीड़न के खबर को कैसे सामने ला सकते है। इस मौके पर प्रदेश व देश के विभिन्न हिस्सों से आये वरिष्ठ पत्रकारों ने पत्रकारिता के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। इस दौरान कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जंहागीर राजू, संजय नागपाल, पंकज वार्ष्णेय, विनोद मेहरा, राजीव खन्ना, दिनेश मानसेरा, कमल जगाती, सतीश जोशी, बद्री बिष्ट, दानिश खान, आशीष ढौंडियाल, जगमोहन रौतेला, ओपी पाण्डे सहित अनेक पत्रकार मौजूद रहे।

दूसरी प्रेस विज्ञप्ति


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