पत्रकारिता को कलंकित करते वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत

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उनका नाम श्रीकांत है। बेचारे वरिष्ठ पत्रकार हैं। भले ही इनकी शैक्षणिक योग्यता चपरासी की है, लेकिन हैं ये बड़े वरिष्ठ पत्रकार। पहले जब सूबे में लालू यादव का राज था, तब इनके हाथ की बनाई गई खैनी खाकर श्री यादव मस्त हो जाया करते थे। इनका हाथ पड़ने पर वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत महोदय का दिल बाग-बाग हो उठता था। बाद में जब श्री यादव की राज का पतन हुआ तो श्रीकांत जी ने भी पाला बदल लिया।

अब इनका सुर बदल गया है। कल आरक्षण के मसीहा बी एन मंडल की पुण्यतिथि थी। गांधी संग्रहालय में एक कार्यक्रमा कि आयोजन किया गया। वक्ताओं की एक लंबी फ़ौज सभागार में बैठे श्रोताओं का शिकार करने हेतु आतुर थी। सबसे पहले शिकार करने का मौका मिला वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत का। एक बार जो माइक पकड़ा तब भाषण देने के बदले बिल्कुल आदर्श शिक्षक के जैसे पढाना शुरु किया।

पहले बी एन मंडल को याद किया फ़िर बिहार के कई मंडलों को याद किया। इनके तेवर स्पष्ट थे। लगा जैसे नीतीश और लालू इनके घर के नौकर हैं और ओबीसी के सारे लोग इनके नजर में बुरबक थे। बात-बात में लालू को एकार मारकर उनकी हंसी उड़ा इन्होंने यादवों के सामने ही उनकी खिल्ली उड़ाई। कल पहली बार जानकारी मिली सूबे के यादवों में अब पहले वाली बात नहीं रही। वह अब बदल चुके हैं और इसका गवाह बना कल श्रीकांत का संबोधन।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री डी पी यादव भी परेशान थे। हालांकि उन्हें तो टेलीविजन चैनल वालों को बाइट देने से ही फ़ुर्सत नहीं थी। मंचासीन रहे डा. गोरे लाल यादव और जाति के यादव पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र प्रसाद भी श्रीकांत की बात सुनकर अधीर हो चुके थे। लेकिन इनकी भी मजबूरी है। मजबूरी यह कि इन्हें सत्ता की मलाई खाने की लत लग चुकी है। फिर बोलने की बारी आई प्रेम कुमार मणि की। फायर ब्रांड नेता ने अपने साहित्यिक अंदाज में श्रीकांत की बोलती बंद कर दी। इन्होंने श्रीकांत की चमचागिरी को उजागर करते हुए उनसे पूछा कि जब सूबे में सवर्ण आयोग का गठन हुआ तब इसका विरोध क्यों नहीं हुआ?

बेचारे श्रीकांत पर तो जैसे घड़ों पानी पड़ गया था। बेचारे जमीन में धंसे जा रहे थे। एक के बाद एक प्रेम कुमार मणि ने यह साबित किया कि किस प्रकार नीतीश सरकार सवर्णों की राजनीति कर रहे हैं। इन्होंने गंगा आरती और सिमरिया अर्द्ध कुंभ का जिक्र करते हुए कहा कि यह सब बिहार का भगवाकरण करने की साजिश है। पोल खुल चुकी थी श्रीकांत की बुद्धिमत्ता की। वैसे जब ये मंच पर बैठे थे, तब इनके मोबाइल पर एक मैसेज भी मिला। मैसेज पढकर इनका चेहरा उतर गया था। बेचारे आक्रोश में थे। लगा जैसे किसी ने इन्हें इनकी औकात याद दिला दी।

लेखक नवल पटना के पत्रकार हैं और अपना बिहार पोर्टल के संचालक-संपादक हैं.


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