अयोध्याकांड : पत्रकारिता दिवस यात्रा वाया मच्छर से लिंग तक

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यशवंत सिंहपत्रकारिता दिवस आया और चला गया. 29 और 30 मई को जगह-जगह प्रोग्राम और प्रवचन हुए. मैंने भी दिए. अयोध्या में. अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आमंत्रित था. अपने खर्चे पर गया और आया. लौटते वक्त 717 रुपये अतिरिक्त ट्रेन में काली कोट वाले को दे आया. वापसी का टिकट कनफर्म नहीं हो पाने के कारण रुपये देकर भी ट्रेन में ठीक से सो न सका.

कभी बरेली में कोई आकर उठा जाता तो कभी रामपुर में. असल में सेकेंड एसी का टिकट कनफर्म न होने से जो सीट खाली दिखती वहीं सो जाता. और जो कोई आकर उठाता तो चुपके से उठकर फिर कोई खाली सीट तलाशने लगता. जो शख्स पत्रकारिता रत्न सम्मान लेकर लौटानी ट्रेन से लौट रहा था वह ट्रेन में बेचारा बन बन इधर उधर भटक रहा था, सोने की जगह तलाश रहा था... फैजाबाद से लखनऊ इस उम्मीद में बैठकर आया कि काली कोट वाले ने व्यवस्था करने का आश्वासन दे रखा था. पर सीट देने की जगह उसने, लखनऊ में एक खाली सीट तलाश कर जिस पर मैं सोया था, उस सीट के बारे में यह बताकर कि यह बरेली तक खाली है, मुझसे 717 रुपये ले लिए, टिकट बनाने के नाम पर. पर उसने टिकट दिए नहीं. मैंने भी मांगा नहीं. इस ट्रेन में तीन टिकट कलेक्टर थे, राजकुमार, पुनीत और एक अन्य. तीनों ने जमकर पैसे दूहे, उनसे जिनके टिकट कनफर्म नहीं थे.

तीसरा टीसी जिसका मुझे नाम नहीं मालूम, उसने मुझसे लखनऊ से बरेली या फैजाबाद से बरेली तक का 717 रुपये लिए. ऐसे ही ये लोग अन्य सभी से ले रहे थे पर टिकट किसी को नहीं दे रहे थे. मैं सोचता रहा कि करप्शन के खिलाफ बोलकर आया हूं और खुद जब करप्शन अपनी आंखों के सामने होता देख रहा हूं तो कुछ बोल नहीं पा रहा हूं. पर मन ही मन तय कर रखा था कि इन काली कोट वालों के नाम तो प्रकाशित करके रहूंगा और इनकी करतूत के बारे में रेल मंत्रालय में भी शिकायत करूंगा. और इसकी शुरुआत यहां इनके नाम को लिखकर कर दिया है.

हां, तो मैं बता रहा था कि जब बरेली में सोते हुए मुझे उठाया गया तो वहां से हटकर एक अन्य खाली सीट देखकर उस पर सो गया. रामपुर में उठाया गया तो एक अन्य जगह बैठने की जगह मिली. मुरादाबाद में उठाया गया तो फिर हापुड़ तक कहीं जगह न मिलने से ट्रेन के दरवाजे को खोलकर बाहर के प्राकृतिक दृश्य को देखते हुए मन को तसल्ली देने लगा. और गाजियाबाद में उतर गया. दो रात ठीक से न सो पाने के कारण थकान बहुत थी, सो दिल्ली आते ही सो गया. पर अपन की जिंदगी में सोना और चांदी कहां है. थोड़ी देर आराम के बाद उठा और नहा धो निकल पड़ा कोर्ट. मेरे पर कई मुकदमें चल रहे हैं. मानहानि से लेकर छेड़छाड़ तक के. इन्हीं में से एक में कोर्ट जाना था. कई घंटे बाद शाम को कोर्ट से लौटा तो भड़ास आफिस पहुंचा. देर रात तक भड़ास4मीडिया के मेलों-खबरों से जूझता रहा. इस चक्कर में अयोध्या में क्या क्या हुआ, कैसा मैंने देखा जिया, यह सब रिपोर्ट नहीं कर पाया.

सच कहूं तो अब वक्त नहीं मिलता कि मैं अपना हाल ए दिल लिखूं. लोगों के इतने गम हैं, इतने खत आते हैं, इतने मेल संदेश व सूचनाएं आती हैं कि उन्हीं को निपटाते निपटाते रात हो जाती है और बाकी बचे वक्त में शराबखोरी और मांस भक्षण करता रहता हूं. यही दो मेरी बुराइयां हैं, इसका आप बुरा मानें या भला, मुझे परवाह नहीं. और, इस बात को मैं अयोध्या प्रेस क्लब में बतौर मुख्य अतिथि भी कह आया कि मैं अपनी सभी बुराइयों और अच्छाइयों के साथ आपके सामने हूं. मैं शराब पीता हूं तो मुझे स्वीकारने में कोई हिचक नहीं कि मैं पीता हूं. मैं मांस पसंद करता हूं तो मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि मुझे तरह तरह के मांस का भक्षण करना पसंद है. मेरे खयाल से ट्रांसपैरेंट रहना ज्यादा सुखद है, बजाय के ढेर सारे अंधेरे के खाने-कोने बनाकर उसे बचाते-संतुलन साधते हार्ट अटैक से अचानक मर जाना या बीमार दिल दिमाग से जीते रहना. नए दौर में, तकनीक के इस दौर में हर कोई ट्रांसपैरेंट होने के दबाव में है. लोग छिपाते बचाते फिर रहे हैं पर टेक्नालजी उनकी चोरी उजागर कर दे रही है. किसी के फोन टेप पब्लिक हो जा रहे हैं तो किसी के खाते-घपले-घोटाले.

बात के सिरे को फिर पकड़ें. कह रहा था कि अयोध्या फैजाबाद की यात्रा कष्टकारी रही. अयोध्या और फैजाबाद कभी गया नहीं था, इसलिए जाने का जब प्रस्ताव आया तो ना ना हां हां करते हुए आखिर में हां कर बैठा. आमतौर पर किसी कार्यक्रम में बाहर से कोई गेस्ट बुलाता जाता है तो आने जाने का किराया आयोजक लोग दे देते हैं. रहने की भी ठीकठाक व्यवस्था कर देते हैं. पर अयोध्या कांड मेरे लिए दुखदाई रहा. जानकी महल ट्रस्ट के एक कमरे में रुकवाया गया. रात भर मच्छरों ने चबाया या खटमल ने काटा, ठीकठीक याद नहीं. पर इतना याद है कि दो-तीन घंटे ही सो पाया और आठ बजे सुबह उठा दिया गया.

अयोध्या प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं महेंद्र त्रिपाठी. उनकी फैजाबाद प्रेस क्लब के नेता शीतला सिंह से जबरदस्त रार-टकरार रहती है. महेंद्र का कहना है कि शीतला ने दस लाख रुपये अकेले मार लिए थे जो अयोध्या प्रेस क्लब के लिए आए थे. ये झगड़ा ये बात काफी पुरानी है. इस झगड़े को फैजाबाद और अयोध्या का हर मीडियाकर्मी जानता है. सो, लोग यह मानते हैं फैजाबाद प्रेस क्लब मालदार है और अयोध्या प्रेस क्लब संघर्षशील. जो संघर्षशील होता है, वो संसाधनविहीन भी होता है, यह अपने यहां की परंपरा रही है. और महेंद्र त्रिपाठी की व्यवस्थाओं को देखकर लगा कि संसाधनों का टोटा है. उन्होंने बातचीत में स्वीकारा भी कि जैसे तैसे चल रहा है काम. मैंने फिर उनसे किराया मांगने की हिम्मत नहीं की. चुपचाप आने-जाने के टिकट की फोटोकापी का लिफाफा उन्हें थमा दिया था. एक बार सोचा कि टिकट का लिफाफा न दूं और बात को यहीं खत्म कर दूं पर बाद में लगा कि अपन भी कौन धन्नासेठ हैं, जैसे तैसे गाड़ी चल रही है तो क्यों अकेले कष्ट उठाएं, कुछ ये लोग भी तो वहन करें.

बाहर से लोगों को लगता है कि भड़ास और यशवंत मालदार पार्टी है, काम चल निकला है... पैसा खूब आता है... पर ये तो भड़ास और यशवंत ही जानते हैं कि कैसे कैसे दिन कट रहे हैं भड़ास के. सर्वर का खर्चा भूत की तरह विशाल होता जा रहा है. अमर सिंह के टेप अपलोड किए जाने की नतीजा ये निकला कि सर्वर अपग्रेड कराना पड़ा और अब करीब 30 से 40 हजार रुपये महीने देने पड़ रहे हैं. सर्वर मैनेजमेंट का खर्चा अलग से. आफिस-स्टाफ-अपना-सबका खर्च अलग. मिलाकर महीने के दो-ढाई लाख रुपये. जाहिर है, हर माह इतने पैसे नहीं आ पाते क्योंकि पैसे वसूलने-धंधा करने के लिए कोई मार्केटिंग टीम नहीं रखी और मार्केटिंग टीम रखकर उगाही करने का मन नहीं क्योंकि ऐसा करके ईमानदार और निष्पक्ष देर तक नहीं रहा जा सकता है. अभी तक दस परसेंट भ्रष्ट हूं. यह तब है जब हम लोग मीडिया हाउस नहीं है. कोई प्रेस व्रेस नहीं लिखवाते. मीडिया होने का कोई लाभ नहीं लेते. सरकारी एड नहीं मिलता. बेहद मुश्किल के दिन हैं तब सिर्फ 10 फीसदी भ्रष्ट हैं. पर जो वाकई मीडिया हाउस हैं, सारे लाभ लेते हैं मीडिया होने के, केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक के खूब विज्ञापन मिलते हैं, वे साले दिल से केवल दस फीसदी ईमानदार हो जाएं तो देश का काया-कल्प हो जाए, मीडिया का कायाकल्प हो जाए. इसलिए, मेरा मानना है कि दस फीसदी करप्शन, सरवाइवल के लिए, बाजार में टिके रहने के लिए, पवित्र लक्ष्य के लिए संस्थान चलाते रहने के लिए, जरूरी है और मजबूरी है, अन्यथा किसी गुफा में जाकर रामनाम जपना पड़ेगा क्योंकि वहां पैसे की कोई खास जरूरत नहीं पड़ेगी, हवा पानी फ्री है और कंदमूल फल मिल जाएंगे दाएं बाएं. बस.

हम लोगों की जो दस फीसदी बेइमानी है, उसका भी ब्रेकअप निकालते हैं. इस दस फीसदी करप्शन का नब्बे फीसदी पार्ट कंटेंट सपोर्ट और विज्ञापन है, जोकि लिखित टाइअप के तहत आता है, और इसे करप्शन में नहीं माना जाना चाहिए, फिर भी मैं मान लेता हूं, दुनिया को संतुष्ट करने के लिए कि- हां मैं बेईमान हूं. पर मैं निजी तौर पर खुद को सौ फीसदी ईमानदार मानता हूं. लेकिन दुनिया को जब बताने की बारी आती है तो खुद को दस फीसदी भ्रष्ट घोषित करता हूं क्योंकि जो सिस्टम देश-दुनिया-समाज में है, उसमें आप थोड़ा-सा भ्रष्ट, अनैतिक, समझौतावादी बने बिना, बताए बिना नहीं रह सकते क्योंकि कई लोग सिर्फ इसलिए आपके पीछे लग जाएंगे कि आपने कैसे कहा कि आप सौ फीसदी ईमानदार हैं. वैसे सही बात भी है. मुझे आजतक कोई सौ फीसदी ईमानदार आदमी नहीं मिला. और कोई माई का लाल कहे कि वह सौ फीसदी नैतिक, ईमानदार और स्वाभिमानी है तो मैं जरूर उसको चरणों में लोट जाना चाहूंगा क्योंकि मुझे ऐसे गुरु की तलाश है. पर एक शर्त है कि ऐसा बताने वाला कहने वाला मनुष्य हो, पत्थर की मूर्ति या पत्थर का भगवान न हो. ये लंबी बहस है. कोई कूदना चाहे तो स्वागत है, उकसा रहा हूं.  खैर, कोई उकसावे में आ जाए तो बात बढाऊं. इसी कारण इस गणित पर कभी अलग से बात. फिलहाल मूल बात पर लौटते हैं.

कह रहा था कि अयोध्या फैजाबाद यात्रा पर अपनी जेब से तीन हजार रुपये लुटा आया और दो रातों की नींद बर्बाद कर आया. तो ऐसी यात्रा के बाद उस यात्रा को रिपोर्ट करने को लेकर कोई उल्लास या उत्साह तो नहीं दिखना चाहिए, सहज मानव मन तो यही कहता है पर अपन को मैं सहज से एक कदम आगे सुपर मानता हूं (अपनी पीठ बीच-बीच में थपथपाते रहना चाहिए ताकि आत्मविश्वास कायम रहे) सो अपनी दर्दनाक यात्रा के बारे में भी लिख रहा हूं. मेरी बात पढ़ने से पहले पढ़ लीजिए अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आई प्रेस विज्ञप्ति...

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''प्रेस क्लब अयोध्या-फैजाबाद ने मनाया पत्रकारिता दिवस : घोटालों की कवरेज और उनके खुलासों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका संतोषजनक है. लेकिन कुछ गंभीर बातों पर हमें ध्यान देना ही होगा. ये बातें भड़ास4मीडिया डाट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने कहीं. वह पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या पर प्रेस क्लब अयोध्या द्वारा तुलसी प्रेक्षागृह में 'भ्रष्टाचार व घोटालों की कवरेज में मीडिया का दायित्व' विषय पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। प्रेस क्लब अयोध्या-फैजाबाद हर वर्ष पत्रकारिता दिवस पर गोष्ठी का आयोजन करता है. जिसमें पत्रकारिता से जुड़े हुए दिग्गज पत्रकारों को बतौर मुख्य अतिथि के बतौर आमंत्रित किया जाता है. इस बार प्रेस क्लब के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि भड़ास4मीडिया डाट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने शिरकत की. अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार हरिशंकर सिंह सफरीवाला ने नैतिकता को प्रभावी बनाने वाली संस्थाओं के अभाव पर चिंता जताई। शनिधाम के आचार्य तांत्रिक हरिदयाल मिश्र ने पत्रकारिता के बढ़ते जोखिम का जिक्र किया। जामवंत किला के महंत अवधराम दास ने भ्रष्टाचार का उजागर करने में मीडिया की भूमिका को सर्वाधिक प्रभावी बताया। पूर्व पालिकाध्यक्ष सरदार महेंद्र सिंह ने मीडिया को भ्रष्टाचार मिटाने का सबसे सशक्त माध्यम बताया। मुख्य अतिथि भड़ास4मीडिया डाट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने घोटालों के कवरेज और उनके खुलासे के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका पर संतोष जताया. साथ ही उन्होंने अमर सिंह और नीरा राडिया के बातचीत के खुलासों में देश के दिग्गज पत्रकारों का नाम आने पर तथा उनके कृत्यों में पत्रकारों का रोल होने पर खासा चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जिनसे मिसाल पेश करने की उम्मीद की जाती है वो घोटालों में अपनी भूमिका की मिसाल पेश करेंगे तो पत्रकारिता का भविष्य शोचनीय हो सकता है. प्रेस क्लब अयोध्या के अध्यक्ष महेंद्र त्रिपाठी ने इस अवसर पर यशवंत सिंह, गिरजा प्रसाद मिश्र, हीरालाल दुबे और रमाशरण अवस्थी को उल्लेखनीय कार्य के लिए पत्रकारिता रत्न सम्मान से सम्मानित भी किया। इस अवसर पर पुनीत मिश्र, चन्दन श्रीवास्तव, अतुल चौरसिया, अरविन्द गुप्ता, पंकज टंडन, अबुल बशर, महेश आहूजा, गोविन्द चावला, के.बी शुक्ल, मुकुल श्रीवास्तव, डीके त्रिपाठी आदि पत्रकार उपस्थित रहे.''

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मेरे श्रीमुख से जो बचन प्रेस रिलीज में बुलवाए गए हैं, मुझे याद नहीं कि मैंने यह सब बोला था. संभवतः नहीं. पर आजकल प्रेस रिलीज ऐसे ही बना करती हैं और अखबार भी ऐसे ही सब छाप दिया करते हैं. मैंने क्या कहा, उसे आडियो प्लेयर पर क्लिक करके सुन सकते हैं. बाद में पता चला अमर उजाला वालों ने तो खबर ही नहीं छापी, संभवतः लखनऊ के संपादक पंचोली ने कह दिया था कि यशवंत खूब मेरे खिलाफ छापता है, इस बार इसे सबक सिखाता हूं, इसकी खबर रोक देता हूं. जब मैंने यह किसी के मुंह से सुना तो हंसी आयी. अमर उजाला में अगर इतनी छोटी सोच के लोग संपादक बनने लगे हैं तो सच मानिए, अमर उजाला का दुश्मन कोई और हो नहीं सकता, ये लोग काफी हैं मटियामेट करने के लिए. और, जागरण वालों ने खबर छापी तो उसमें से मेरा नाम व मेरा संबोधन उड़ा दिया. जागरण वाले ऐसा करें तो समझ में आता है. वहां पत्रकारिता कम, दोस्ती, दुश्मनी, धंधा-पानी... ये सब ज्यादा होता है. दंभ और अहंकार देर तक टिका नहीं करते. दैनिक जागरण, लखनऊ में जिस कुर्सी पर आजकल शेखर त्रिपाठी हैं, वहां उनसे ज्याद पावर में विनोद भइया बैठा करते थे. लेकिन आखिरी दिनों में प्रायश्चित किया करते थे. उन्हें अपने किए कई कामों पर अफसोस हुआ करता था. स्वर्ग नरक सब यहीं है. बदले की भावना से काम करने वालों की उम्र भले लंबी होती हो लेकिन उनका अंत भयानक होता है. भड़ास तो भड़ास है. इसका काम ही मीडिया के प्रति क्रिटिकल होना है. सो, हम जो कर रहे हैं वह सहज है, सकारात्मक है. पर ये अखबारों के संपादक लोग जो कर रहे हैं, खुन्नस निकाल रहे हैं, वह निगेटिव है. खतरनाक है. पर कोई बात नहीं. मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना.

खैर, ये तो रही मेरी भड़ास. अपन की पंचलाइन भी तो यही है- जो कुछ दिल-दिमाग में अटका हो, निकाल दो, मन हलका हो जाएगा....

आते हैं मूल मुद्दे पर. बात प्रेस रिलीज की कर रहा था. जो छपा है उसमें लिखा है कि मैं वहां, मुख्य अतिथि रहा. जी, और, पत्रकारिता रत्न सम्मान मिला मुझे. पढ़ा होगा प्रेस रिलीज में उपर. पत्रकारिता रत्न सम्मान. गज़ब. पर खुश होने की जरूत नहीं. बंटते रहते हैं सम्मान. मिलते रहते हैं पत्रकारों को. पर बड़ा अजीब लगता है मुझे जब इस टाइप के सम्मान मुझे मिलते हैं. मैंने मंच से जाकर कहा कि भई, मुझे सम्मान-वम्मान लेना अच्छा नहीं लगता क्योंकि सम्मानित तो बड़े बुजुर्ग जीवन की आखिरी बेला में किए जाते हैं जब उन्हें तीर्थ वगैरह पर जाना होता है, पता नहीं लौट पाएं या नहीं, सो सम्मान करके इनका मोरल हाई कर दो जिससे मर भी जाएं तो उन्हें जीवन से कोई मलाल न हो क्योंकि पहले की जिंदगी में ऐसा-ऐसा, चाहे जैसा काम कर दिया कि सम्मानित भी हो गए.

तो मुझे अभी भरी जवानी में विधवा बनने का कोई शौक नहीं है, इसलिए मैं सम्मानित नहीं होना चाहता. दूसरे सम्मान लायक काम किया ही नहीं. सम्मान लायक काम शायद चालीस पार की उम्र में करूंगा. और हो सकता है वो जो मैं करूं वो किसी को सम्मान लायक न लगे. फिर भी, चाहूंगा कि अगले दो-तीन साल तक जवान ही रहने दो भाइयों और जो कर रहा हूं उसे खेल खेल में शौकिया कर रहा हूं, और पैशन को प्रोफेशन बनाकर कर रहा हूं. हालांकि इस पैशन से मन उचट रहा है और कोई नया पैशन बहुत दिनों से अंखुवाया हुआ है, उसी को जी रहा हूं इन दिनों, उसी को ग्रो कर रहा हूं इन दिनों और इसी के बरक्स चूतियापों की चिपकान को खुद ब खुद कम होते हुए देख रहा हूं. यह क्रम सहज रूप से जारी रहे, यही कोशिश करता हूं और इसी सहजता को कायम करने के लिए यह सब लिख रहा हूं.

आपको भरोसा नहीं होगा, पर मुझे खूब है कि जब जब मैं खुद के भाव को व्यक्त कर लेता हूं, अपने अच्छे बुरे को कइयों से बांट लेता हूं तब तब मुझे लगता है कि मुझसे बड़ा दुनिया में कोई संत नहीं होगा क्योंकि मेरे अंदर तो बिलकुल हड़हड़ा कर प्रवाहित होता समुद्र ही शेष है. सारे बांध तटबंध टूट चुके हैं. कोई कुंठा कोई विरोध कोई हिंसा कोई प्रतिशोध कोई निगेटिविटी है ही नहीं. सबसे मुक्त हूं. और तब अचानक गाने लगता हूं... मोको कहां ढूंढो रे बंदे मैं तो तेरे पास.... शुजात हुसैन ने बहुत खूब गाया है इसे. भिलाई के दिनेश जी को धन्यवाद, लिंक भेजा था तो उसी के सहारे खोजकर डाउनलोड भी कर लिया हूं. इसको भी सुन सकते हैं नीचे के आडियो प्लेयर के जरिए. फैजाबाद अयोध्या की यात्रा के दौरान फिलिप्स का प्यारा सा छोटा सा रिकार्डर ले गया था जिसमें अपनी पसंद के कई भजनों गानों को ले गया था और रास्ते भर सुनता रहा.

तो मन को भाता नहीं कि कोई मेरा सम्मान करे. पहले भी कई बार लोगों द्वारा खुद को सम्मानित किए जाने का दुस्साहस झेल चुका हूं. इस बार भी झेल गया. थमा दिया तो पकड़ लिया. और प्रतीक चिन्ह लेकर लौट आया. भाषण दिया. जो मन में आया बोलता रहा. गरियाता रहा. सिखाता रहा. पूरा भाषण नीचे के आडियो प्लेयर में है, क्लिक करके सुन सकते हैं. आयोजन की कुछ तस्वीरें डाल रहा हूं. चीफ गेस्टी करना किसके अच्छा नहीं लगता. मुझे भी लगा. पर यह भी अब सब रुटीन लगने लगा है. सब प्रायोजित. सब दुनियादारी का हिस्सा. शायद अब कहीं जाने से पहले दस बार सोचूं. वैसे भी जाता हूं नई जगह देखने के वास्ते, घूमने के वास्ते, कार्यक्रम तो बहाना होता है. दिल्ली से उबियाया-उजियाया मन कहीं भागने को कहता है और किसी प्रकार का मौका मिलते ही भाग लेता हूं.

अयोध्या-फैजाबाद में कई अनुभव शानदार रहे. महेंद्र त्रिपाठी जी ने कई जगहों पर घुमाया. अपनी बाइक पर बिठाकर. उनकी सादगी मुझे अच्छी लगी. कोई दिखावा नहीं. जैसे हैं, वैसे हैं. दिगंबर जैन मंदिर ले गए तो बहुत देर वहां स्थापित ऋषभदेव की दीर्घाकार आकृति देखता रहा. बिलकुल दिगंबर मुद्रा में. कई जैन अन्य गुरुओं की मूर्तियां लगी थीं. उनकी कुछ तस्वीरें लीं. कारसेवकपुरम गया जहां राम मंदिर के लिए सब कुछ तैयार करके रखा हुआ है. वहां एक साधु वेशधारी असहाय वृद्ध हम लोगों को देखते हुए पैसे मांगने लगा, रिरियाते हुए. मन बेचैन हो गया. काहें का राम मंदिर. इस आदमी के भीतर के मंदिर को बनाओ-चमकाओ.

पर यहां तो खंडहर है. अंदर उदासी है, वीरानापन है. कैसे राम आ सकेंगे नए बनने वाले भव्य मंदिर में. वे जहां हैं जैसे हैं वैसे ही बहुत अच्छे हैं क्योंकि अयोध्या के ज्यादातर लोग बेहद सहज, सरल और गरीब दिखे. बाहर से अयोध्या को लेकर कई तरह की तस्वीर बनती है पर वहां जाइए तो अयोध्या अपने गांव सरीखा लगता है, अगर पुलिस पीएसी वालों को माइनस कर दें तो. अयोध्या की गलियां कई बार वृंदावन की याद दिलाती हैं. बंदर यहां भी पर्याप्त मात्रा में है. महेंद्र ने बताया कि करीब दस हजार मंदिर हैं अयोध्या में और रोजाना एवरेज करीब तीस हजार जन बाहर से आते हैं रामलला के दर्शन हेतु.

अयोध्या में धर्म कारोबार की तरह है. बड़े से बड़ा संत यहां ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचने में लगा रहता है. कहने को ट्रस्ट हैं यहां पर उनमें रहने के ठिकाने होटलों को मात दें. पैसे भी ठीकठाक वसूले जाते हैं. हर जगह गुप्त दान पेटिकाएं लगाई गई हैं. गुप्त दान पेटिकाओं को देखकर मुझे भड़ास की याद आई. क्यों न हम लोग भी अब भड़ास के लिए गुप्त दान की अपील करें. बात आई गई. दिमाग है. चलता रहता है. कभी अच्छा, कभी सच्चा, कभी गंदा, कभी बुरा. कुछ न कुछ बज-बजाता बजता-बजाता रहता है. ढनन ढन ढन.. टनन टन टन. ठिम्मक टिम्मक.. टमक टमक चमक चमक... चम चम.. झम झम.. झमक चमक..

फैजाबाद के प्रेस के साथियों से मुलाकात हुई. दैनिक जागरण और अमर उजाला के आफिसों में गया. वहां के साथियों से मिला. कई अन्य लोगों से मुलाकात हुई. भड़ास बड़ा ब्रांड बन चुका है, इसका एहसास हुआ. और इस बड़े ब्रांड ने मुझ जैसे परम देहाती को भी कथित बड़ा बना दिया है, यह महसूस हुआ. पर जब जब मुझे कथित बड़प्पन का एहसास कराया जाता है, सम्मान दिया जाता है.. तब तब लगता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. मेरे जैसे करोड़ों युवा हैं जो दिन रात खटते तपते रहते हैं पर उनका कोई नामलेवा क्यों नहीं. हजारों लाखों लोग हैं जो बहुत सारे काम कर रहे हैं उनको रिकीगनीशन क्यों नहीं. और, मेरे में तो बुराई ज्यादा है, अच्छाई कम. अराजक, शराबी, लोफर, मवाली, कबाबी, दलाल, ब्लैकमेलर, कुंठित, फ्रस्टेट, व्यभिचारी, कामी, क्रोधी, लोभी, मोही... जितनी उपमाएं हो सकती हैं सब आप मुझ पर मढ़ सकते हैं और मैं आपको उन उपमाओं के जायज होने के कई तर्क-प्रमाण गिना-बता सकता हूं.

आखिर में, फैजाबाद और अयोध्या के पत्रकार साथियों को प्रणाम कहना चाहूंगा. थोड़ा कष्ट मुझको तो हुआ लेकिन ऐसी दिक्कतों का आदी रहा हूं. और मुझे सच में लग रहा है कि पत्रकारिता दिवस पर वाकई मैं एक पत्रकार की तरह मुश्किल हालात में फैजाबाद अयोध्या की यात्रा कर और वैसा ही बोलकर और वैसी ही दिक्कतों को झेलते हुए वापस आया हूं. हर कष्ट, बुराई, गल्ती में एक अच्छी बात छिपी होती है. गल्तियां आपको सीखने और समझने में मदद करती हैं और आगे से वैसे हालात को टैकल करने की दृष्टि देती हैं. कष्ट आपको समान स्थितियों में जीने वाले अन्य लोगों की हालत को महसूस करने का मौका देते हैं. बुराइयां आपको यह बताने के लिए पर्याप्त होती हैं कि इस बुरे के विलोम अच्छा की क्या स्थिति है और कैसे उत्तरोत्तर अच्छे की तरह शिफ्ट किया जा सकता है.

आखिर में कुछ झलकियां-

  1. -अयोध्या प्रेस क्लब के कार्यक्रम शुरू होने का समय सुबह 11 बजे था लेकिन तब तक एक भी आदमी आयोजन स्थल पर नहीं पहुंचा था. खासकर प्रेस क्लब के पदाधिकारी और पत्रकार गण काफी बाद में आए. शाम को जब एक होटल में दारू कार्यक्रम शुरू हुआ तो सबके चेहरे चमक रहे थे और सभी फटाफट मदिरास्थल पहुंचे. पहले और दूसरे, दोनों आयोजनों का मैं मुख्य अतिथि था. और, ज्यादा मजा दूसरे आयोजन, शराबखोरी वाले में आया क्योंकि इसमें खामखा का आदर्श नहीं था, हम सब विकट नंगे होकर धंधे और मीडिया की बातें कर रहे थे, बिलकुल सच सच...

  2. -ऋषभदेव मंदिर में नग्न जैन गुरुओं की मूर्तियां देखकर एकपल को ठिठका. मंदिर में जब तक रहा, ज्यादा वक्त तक दिमाग में इनके लिंग पर चिंतन चलता रहा. और लगा, हम सब अगर आम जीवन में भी ऐसे ही हों तो शायद नंगई खत्म हो जाए. मतलब, नंगा नहीं हैं तो नंगई है, और जब नंगे हो गए तो नंगई खत्म. क्योकि नंगई है ही तब तक जब तक सब ढंका है. जो ढंका है, वह कौतुक पैदा करता है, फिर उसका एक बाजार बनता है, फिर कारोबार होता है और फिर नैतिक-अनैतिक संबंधित नियम कानून बनाए जाते हैं और पैदा होते हैं दरोगा- कानून वाले व समाज वाले.  दिल से प्रणाम किया जैन गुरुओं को, और सोचता रहा कि ये काम मैं क्यों नहीं कर सकता. अजीब बीमारी है मुझमें. हर शख्स को जी लेना चाहता हूं... उसकी तरह सोचने लग जाता हूं... वैसा होने के बारे में तय करने लगता हूं क्योंकि वैसा सोचते सोचते मैं जाने क्यूंकर उसमें आनंद तलाशने लगता हूं सो उसी ओर उन्मुख होने लगता हूं.

  3. -अयोध्या जाने से पहले लखनऊ में ट्रेन से उतरा था और रात वहीं गुजारी थी. पहले से तय था कि मैं लखनऊ उसी शर्त स्टे करूंगा जब कमरे पर पहुंचूं तो बकरा पक रहा हो, और पकने की कल कल की आवाज और पके रहे मसाले की खुशबू कान-नाक तक पहुंचे. ऐसा ही हुआ. आदिवासी गीत गाते हुए ... हुडुंबा गुडुंबा.. गुड़ुड़ बुड़ुड डब टटा डब टटा... और गाते गाते गोल गोल घूमते हुए ... बीच बीच में रुक रुक कर मदिरा पान करते हुए और फिर एकाध पीस व ग्रेवी का टेस्ट लेते हुए फिर गोल गोल घूम घूम कर गाने लगते... ... हुडुंबा गुडुंबा.. गुड़ुड़ बुड़ुड डब टटा डब टटा... यह अवस्था शराबियों के लिए आदर्श है... किसी ध्यानमग्न संत के ब्रह्म से नाता जोड़े लेने वाली अवस्था की तरह...

  4. -लखनऊ से अयोध्या बस से गया. बस पर चढ़ने से पहले आधी बोतल बीयर गटकी थी और आधी उछाल दी थी. बहुत दिन बाद गर्मी के दिनों में बस से यात्रा की... बस पर बैठा तो पसीना सर सर बहने लगा. बस वाला सवारी भरने के चक्कर में आधा घंटा धूप में दाएं बाएं करता रहा. फैजाबाद उतरा तो वहां से तिपहिया विक्रम में सवार होकर अयोध्या पहुंचा. बस और विक्रम की यात्रा के दौरान गाने सुनता रहा. रास्ते में एक कव्वाल मिले जो अपने घर के छोटे छोटे बच्चों को भजन कव्वाली आदि सिखाकर गायक बनाने का काम करते हैं. वे अगले दिन सुबह पत्रकारिता दिवस के कार्यक्रम में भी पहुंचे. यात्राओं के दौरान अनजान लोगों से दोस्ती का आनंद ही कुछ और होता है. और, आयोजनों में जहाज से पहुंचने के कई क्रमों के बाद इस बार विक्रम से पहुंचने के ताजे अनुभव ने बहुत कुछ दिया. जन, मन और तन तो अपन का विक्रम वालों, बस वालों के साथ ही रहता है क्योंकि असल जीवन, चमक-चर्चा-हनक-खनक-उल्लास-उत्सव यहीं है. जहाजों पर तो मुर्दनी सी शांति छाई रहती है, जैसे सभी यमराज के यहां रवाना हो रहे हों...

कुछ बुरा लगा हो तो गरिया लीजिएगा, भा गया हो तो आपकी जय जय भाया...

उपर उल्लखित आडियो इधर हैं, सुनें....

  • ....पत्रकारिता दिवस पर अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में मेरा भाषण... नए जमाने का नायकत्व और हिप्पोक्रेसी का बाजार...

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  • शुजात हुसैन साहब... चुनरी में पड़ गयो दाग....

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  • मोको कहां ढूंढो रे बंदे.... कबीर और शुजात हुसैन का सितार व संगीत...

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आम. प्रणाम. व्यायायाम.

यशवंत

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....यात्रा और आयोजन की कुछ तस्वीरें, नजारे, अखबारों में प्रकाशित खबरों की कटिंग.......

सब पापी पेट के लिए ही हो रहा है और सब इसी के लिए मरे-जिए जा रहे हैं, फिर इस नेक काम में देरी क्यों... अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित सेमिनार के खत्म होने के बाद हम सभी भोजन पर टूट पड़े. चोखा, बाटी ने आनंद ला दिया.

लीजिए, चीफ गेस्ट साहब जला रहे हैं बत्ती, कर रहे हैं उदघाटन. रस्म-रिवाज है जो. साथ में महेंद्र त्रिपाठी (मेरे दाएं) और सबसे दाएं आखिर में चंदन श्रीवास्तव.

लीजिए साहब, आप भी ले लीजिए पत्रकारिता रत्न एवार्ड...

आपका (रमाशरण अवस्थी) भी योगदान अमूल्य है.. आप भी पकड़ें पत्रकारिता रत्न सम्मान...

जनमोर्चा के पुराने साथी, जिन्हें शीतला सिंह ने निकाल दिया था, को पत्रकारिता रत्न एवार्ड. बीच में महेंद्र त्रिपाठी.

लीजिए यशवंत जी, बहुत काम कर लिया, ये पकड़िए पत्रकारिता रत्न सम्मान और निकल जाइए जंगल की ओर भजन गाने.

एक एक कर लोग पहुंचे तो कार्यक्रम शुरू होने के घंटे भर बाद सिर्फ एक साइड की ही कुर्सियां भर सकीं.

बाबा की जय हो. पहनाओ इन्हें माला... माला का रंग और इनके कपड़े का रंग, सब एक है. जय जय हो. माला फेरत जग मुआ....

अगले दिन अयोध्या फैजाबाद के कई छोटे बड़े अखबारों ने सम्मान के साथ समारोह का विवरण छापा. आखिर मीडिया के साथियों का प्रोग्राम जो था.

सिंह साहब ने ये क्या बयान दे डाला. लगता है बड़े आदमी बन गए हैं सिंह साब. पर ये खबर के बीच में मच्छरों का प्रकोप कहां से हो गया बाबा..

ये हेडिंग तो मेरे पिताजी ने भी पत्रकारिता दिवस के अपने समय के एक समारोह के बाद लगाई थी. वाह, हम न सुधरेंगे.

मीडिया माता जिंदाबाद. इतना त्याग व समर्पण है कि मत पूछो. सब हरा भरा है भाई. आंखें किधर गई हैं...

मुख्य अतिथि को बर्गर खिलाने अयोध्या के एक रेस्टोरेंट में ले गए अयोध्या प्रेस क्लब के अध्यक्ष महेंद्र त्रिपाठी. उसी दौरान मैंने ये तस्वीर ली. राम और बर्गर.. क्या कांट्रास्ट है. एक गाना सूझ रहा है... रामनाम संग बर्गर खाया... गर्मी में दुख दूर भगाया... बंदर धावत भुट्टा खावत... सैलानी सब थर थर कांपत...

विहिप वालों की दुकान. कारसेवक पुरम में रामलला के निर्माण के लिए तराशे गए पत्थरों की लाट. दिन बीत रहे इंतजार में और पत्थर की चमक खोती जा रही है इस संसार में.

पत्थरों का स्थापत्य ऐसा रखा गया है ताकि वह रामलला कालीन लगे. इन पत्थरों की साफ-सफाई और रख-रखाव ठीक न होने से इनकी हालत खराब होने लगी है. कहीं ऐसा न हो कि जब कभी इस्तेमाल की नौबत आए तो ये टांय टांय फिस्स हो जाएं.

पत्थरों की आस्था. वो तो बंदर महाराज हैं जो इन पत्थरों पर उछलकूद कर इनमें प्राण प्रतिष्ठा करते रहते हैं वरना मनुष्यों ने इन पत्थरों को पाषाण बना डाला है...

राम नाम के पक्ष में कारसेवकपुरम में काफी कुछ इकट्ठा किया गया है... मुस्लिमों द्वारा ढाए गए कथित अत्याचार के दृश्यों से लेकर भगवान के होने संबंधी बयानों का जखीरा यहां मौजूद है. अगर एक बार कोई औसत दिमाग का आदमी आ गया तो कई सवाल व कई कहानियां लिए बिना लौट न पाएगा.

दूर दूर के लोग, दूसरे प्रदेशों के काफी लोग कारसेवकपुरम आते हैं, रामलाल के मंदिर के माडल को देख जाते हैं.. और इस दौरान...

...वहां रखी गुप्त दान पेटिका में रकम डाल जाते हैं.... जय हो... गुप्त पेटिका भरती रही.... गुप्त पेटिका के बगल में बैठा बुजुर्ग साधु (इस तस्वीर में नहीं है) भूखा होने का हवाला देकर भीख मांगता रहे...

जैन भगवान ऋषभदेव के मंदिर के बाहर का दृश्य

जैन भगवान ऋषभदेव की दीर्घाकार मूर्ति

भगवान ऋषभदेव की मूर्ति के बाएं अन्य गुरुओं-भगवानों की भी मूर्तियां हैं

भगवान ऋषभदेव की मूर्ति के बाएं अन्य गुरुओं-भगवानों की भी मूर्तियां हैं

दिल्ली वापसी के दौरान ट्रेन जहां कहीं बीच में रुक जाए तो जनरल डिब्बा वाले साथी हाथ-पांव सीधा करने के लिए फटाफट ट्रेन से कूद जाएं और पत्थर-गिट्टी से लेकर रेल पटरी तक पर पसर कर बैठ जाएं. मैं सेकेंड एसी के गेट पर खड़ा बहुत देर तक और बहुत दूर तक रेल पटरियों के आसपास के जीवन व दर्शन को देखता निहारता रहा...


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