क्या बिना एक्टिविज्म के जनपक्षीय पत्रकारिता संभव है?

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: पहला हेम चंद्र पांडे स्मृति व्याख्यान : वक्ता-  सुमंतो बनर्जी : संभावित विषय: बिना एक्टिविज्म के क्या जनपक्षीय पत्रकारिता संभव है? : संभावित समय- 2 से 5 बजे : दिनांक- 2 जुलाई, 2011 : संभावित स्थान-  गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग,  आईटीओ के पास, दिल्ली-2 : उपस्थिति ही प्रतिरोध है! :

कानून के राज की दुहाई देने वाली व्यवस्था ही जब किसी निर्दोष नागरिक का क़त्ल कर दे तो इससे बेहूदा मज़ाक और क्या हो सकता है? पत्रकार हेम चंद्र पांडे की मौत भारतीय लोकतंत्र से इसी से मिलते-जुलते सवाल पूछती है.

पिछले साल दो जुलाई को आंध्र प्रदेश पुलिस ने हेम को सीपीआई (माओवादी) प्रवक्ता आज़ाद के साथ फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था. उनके विचारों और आदर्शों को जीवित रखने के लिए वार्षिक व्याख्यानमाला आयोजित करने का फ़ैसला लिया गया है. इस बार उनके शहादत दिवस पर पहला हेम स्मृति व्याख्यान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुमंतो बनर्जी देंगे. उसी दिन विचारधारा वाला पत्रकार-हेम चंद्र पांडे नाम से प्रकाशित एक किताब भी लोकार्पित की जाएगी.

हेम उस दौर में पत्रकारिता कर रहे थे जब समाचार माध्यमों का कारपोरेटीकरण चरम पर था. उनमें आम जनता की बात करने वाले किसी आदर्शवादी नौजवान के लिए कोई जगह नहीं थी. हेम ने पत्रकारिता के इस मॉडल को नकार कर एक एक्टिविस्ट-पत्रकार की भूमिका चुनी. वे कलम को पूंजी का गुलाम बनाने के बजाय उससे ख़ूबसूरत समाज का सपना लिखना चाहते थे. वे ज़हालत, भुखमरी और अन्याय के ख़िलाफ़ धड़कते जीवन का गीत लिखने की ख़्वाहिश रखते थे. हुक्मरानों ने उन्हें इसी अपराध के लिए मौत की सज़ा दी!

दो जुलाई के कार्यक्रम में मौज़ूद हर व्यक्ति इस सज़ा की मुख़ालफ़त का प्रतीक होगा!   भारतीय लोकतंत्र का तथाकथित चौथा खंभा आज पूरी तरह निजी उद्योग में तब्दील हो चुका है. छवि निर्माण में माहिर इस उद्योग के अपने नायक हैं. वीर, बरखा और प्रभु जैसी महानतम हस्तियां तो इस मुखौटाधारी पत्रकारिता की झलक मात्र हैं! इन नकली चेहरों के बरक्स हेम जनता की पत्रकारिता करने वाले ज़मीनी कार्यकर्ता थे, नायक थे, जो सत्ता के साथ गठजोड़ कर चलने के बजाय धूल, मिट्टी और ख़ून से सने ग़रीब जनता के यथार्थ को दर्ज करना अपना फ़र्ज समझते थे.

कॉरपोरेट पत्रकारिता के सेलिब्रिटी चेहरों से अभिजातपन टपकता है, आंखों में ग़रीबों के लिए नफ़रत दिखती है. सच के प्रति हिकारत होती है और जन प्रतिरोध के ख़िलाफ़ आक्रामकता. सनसनी में न्यूज़ वैल्यू तलाशते इस तरह के धंधेबाज़ पत्रकार मुनाफ़े के अलावा और कुछ नहीं चाहते, वो चाहे युद्धोन्माद से आए, क्रिकेट से आए या सिनेमा से. एजेंडा सेटिंग में माहिर मुनाफ़ाखोरों के ये एजेंट वर्चस्ववादी विचारों को स्थापित करने में हमेशा जुटे रहते हैं. मालिक की मर्जी पर जनहित की अनदेखी करते हैं, यथास्थिति के प्रवक्ता बनकर भूखे, नंगे देश में समृद्धि और सूचना क्रांति का झंडा फ़हराते हैं.

हेम इस तरह की जनविरोधी पत्रकारिता के ख़िलाफ़ बग़ावत का नाम है.

हेम उत्तर आधुनिक पाप्युलर कल्चर के बरक्स काउंटर कल्चर के पत्रकार हैं,

हेम बुर्जुआजी पब्लिक स्फ़ीयर के बरक्स काउंटर पब्लिक स्फ़ीयर के प्रवक्ता हैं.

हेम कॉरपोरेट मीडिया के बरक्स काउंटर मीडिया के नायक हैं.

आइए, कॉरपोरेट पत्रकारिता के फ़र्जी किरदारों के बरक्स जनता के पत्रकार को याद करें!

उम्मीद है कि दो जुलाई को वाम-लोकतांत्रिक पहलकदमियों पर भरोसा करने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोग हेम के शहादत दिवस पर मौज़ूद रहेंगे. याद रहे कि यह कार्यक्रम पत्रकारिता की रेडिकल धारा को पहचानने जैसा है. हेम मेमोरियल कमेटी इसका आयोजन कर रही है, जिसमें हेम के साथ छात्र जीवन में साथ रहे दोस्त और कुछ हमख़्याल पत्रकार शामिल हैं. यह किसी एक संगठन का कार्यक्रम नहीं है, सारे इंसाफ़पसंद लोगों से हम इसमें शामिल होने की अपील करते हैं.

यह एकता आने वाले दिनों में वास्तविक और सच्चा लोकतंत्र स्थापित करने में मददगार होगी!

हेम चंद्र पांडे मेमोरिल कमेटी की ओर से भूपेन सिंह द्वारा जारी.


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