इंदौर यात्रा : जहाज, दारू, दिग्गज और विमर्श

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इंदौर भ्रमण : यशवंत सिंहभाषायी पत्रकारिता महोत्सव में जाने के लिए न्योता मुझे भी मिला था। सात मार्च की सुबह 4 बजे का एलार्म मोबाइल में सेट कर रखा था। पांच बजे हवाई अड्डे के लिए निकल पड़ा। आटो से हवाई अड्डे पहुंचते-पहुंचते सिर में कंपकंपी घुस चुकी थी। दिल्ली का मौसम दिन में बेहद गर्म हो चुका है पर तड़के ठंड का वजूद ठीकठाक होगा, इसका अंदाजा नहीं था। हवाई अड्डे पर औपचारिकताओं के क्रम में लाइन में खड़ा था। प्रेस क्लब आफ इंडिया के महासचिव पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ दिखे तो हाथ हिला अभिवादन किया।

उन्होंने भी चेहरे पर मुस्कान बिखेरी और जवाब में हाथ उठा दिया। मुझे सूचना थी कि दिल्ली से कई लोग जा रहे हैं पर कौन-कौन जा रहे हैं, इसके बारे में जानकारी न थी। औपचारिकता की पहली सीढ़ी चढ़ने के बाद हवाई अड्डे के थोड़े और अंदर घुसा तो अजय उपाध्याय और अशोक वानखेड़े दिखे। हम सब काफी शाप की तरफ बढ़े। काफी पीने के दौरान ही एक के बाद एक कई लोग आ गए। आशुतोष, दीपक चौरसिया, संतोष भारतीय, संदीप सोनवलकर, अनिल जैन, प्रदीप सौरभ, परवेज अहमद....। संख्या बढ़ती चली गई और उड़ने का समय नजदीक आने की सूचना पर बैठकी खत्म कर सभी लोग जहाज की तरफ रवाना हुए।

यह मेरी दूसरी जहाज यात्रा है- मैंने संतोष भारतीय के कान में फुसफुसा कर बताया। पहली जहाज यात्रा के सुख-दुख का बयान मैंने पिछले साल भड़ास ब्लाग पर किया था। उस पहली यात्रा में जिस कदर असहज था, दूसरी यात्रा में असहजता की मात्रा थोड़ी कम जरूर थी लेकिन मीडिया दिग्गजों की मौजूदगी के बीच अपने को असहज पा रहा था। शुक्र था, जहाज में मेरे बगल में संतोष भारतीय थे, जिनके साथ पिछले कुछ महीनों में कई बार बैठा-बतियाया हूं, इसलिए उनके पड़ोस में होने से सहज महसूस कर रहा था। अजय उपाध्याय से अपनापा दैनिक जागरण और पत्रकारिता महोत्सव में महिला दिवस पर संगोष्ठीआई-नेक्स्ट के दिनों से है, इसलिए उनके साथ जब इंदौर से वापसी हुई तो जहाज में बड़ा मजा आया, खूब बातें की उनसे।

पिछली बार की तरह इस बार सीट बेल्ट बांधने में दिक्कत नहीं आई। दिल्ली से जहाज के उड़ते ही मैंने अपनी गर्दन खिड़की की तरफ मोड़ ली और जमीन से बढ़ती हुई दूरी को देखने लगा। वाह, क्या नजारा है! ये दिल्ली वालों की फैली हुई भीषण बस्ती जहाज की उठान के साथ सिकुड़ती जा रही है। लोग अपने घरों में सोए होंगे, सुबह की पाली वाले घर से निकल रहे होंगे, रात की पारी वाले लौट रहे होंगे....। मेरे ठीक सामने वाली सीट के पिछवाड़े लगे वीडियो स्क्रीन के बारे में मैंने संतोष जी से पूछा तो उन्होंने बताया- थोड़ी देर बाद इसे इंज्वाय कर सकते हो। टीवी के कई कार्यक्रम देखने को मिल जाएंगे। गर्दन फिर खिड़की की तरफ मोड़ी। जहाज अब सीधा हो रहा था। मेरे पड़ोसी संतोष जी के पड़ोसी थे आशुतोष। अखबार में डूबे हुए। पूरी तल्लीनता और गंभीरता से सिर गड़ाए हुए। संतोष जी ने अपने सामने की स्क्रीन को आन किया और साउंड सिस्टम से दोनों कानों को ढांप लिया।

धरती अब बहुत दूर हो चुकी थी। जहाज में नाश्ता परोसा जाने लगा। वेज या नान-वेज के सवाल पर मैंने फटाक से नान-वेज बोला और सामने वाली सीट के पीछे लगे खाने के बोर्ड को सामने गिरा लिया। पहली जहाज यात्रा में न तो सामने स्क्रीन था और न ही नाश्ता मिला था। नाश्ता करते करते मैं सोच रहा था ट्रेन के जनरल डिब्बे के बारे में। स्टूडेंट लाइफ और पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में जनरल डिब्बे के एक से बढ़कर एक अनुभवों के बारे में मनन करने लगा। कहां गंगू तेली की गाड़ी और कहां राजा भोज का रथ। एक मुश्किलों, युद्धमय व तनावों से भरा हुआ सफर और दूसरा मस्ती, मजा व माननीयता से ओत-प्रोत यात्रा। जहाज से नीचे देखने पर मनुष्य और उनके द्वारा बनाई गई चीजें नहीं दिख रही थीं। दृश्यता की सीमा में प्राकृतिक चीजें थी, नदियां, पहाड़, जमीन का फैलाव, बादल, जंगल.....। संसार के विराट होने का एहसास। मनुष्य कितनी छोटी चीज है इस प्रकृति के सामने पर हम हैं कि बौराए रहते हैं, कुंतल भर के इगो पाले घूमते रहते हैं- एको अहं द्वितियो नास्ति के अंदाज में। अपने टुच्चेपन पर क्षोभ हुआ। मनुष्यों के टुच्चेपन पर गुस्सा आया।

जहाज में सवार सवारियों की तरफ नजर घुमाया। जहाज व जमीन के बीच की दूरी और जहाज व आसमान के बीच के गैप पर इंदौर भ्रमण : कभी राजवाड़ा था, आजकल गरीब भी बैठ जाते हैंसोचने लगा। आसमान में तो भगवान लोग रहते हैं। टीवी पर आसमान से रथ रूपी जहाज अवतरित होते हैं जिस पर भगवान लोग विराजे रहते हैं। हम लोग भी तो भगवान हैं, जमीन के मनुष्यों से अलग। अगर भगवान नहीं हैं तो भगवान के करीब हैं क्योंकि भगवान आसमान में रहता है और हम उनके बेहद करीब हुए जा रहे हैं, जहाज के जरिए। मुझसे रहा न गया, संतोष जी के कान में फूंका- भाई साहब, जहाज पर बैठा हुआ आदमी भगवान के काफी करीब होता है, भगवान जब चाहे उसे बुला सकता है अपने पास। संतोष जी मुस्कराए, बोले नहीं। सोच रहे होंगे- नया मुल्ला है, इसलिए ज्यादा महसूस कर रहा है। मुझे भी अपने कथन पर थोड़ी झेंप लगी और आगे से मन की कोई भी बात पड़ोसियों को न बातने के इरादे से दिमाग के घोड़े दौड़ाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद लगा कि यहां जो सुविधाएं मिली हुई हैं, उनका तो इस्तेमाल कर लूं।

पेट पूजा कर चुका था। काफी चिंतन-मनन भी हो चुका था। अब संतोष जी जैसी स्थिति में आने के लिए प्रयास करना शुरू कर इंदौर भ्रमण : दूर से यूं दिखता है राजवाड़ा दिया। संतोष जी कामेडी शो देख चुके थे। अब कोई फिल्म देख रहे हैं। स्क्रीन आन करने से पहले कान पर साउंड कार्ड चढ़ा लिया। संतोष जी से मदद मांगी, स्क्रीन आन करने में थोड़ी दिक्कत आ रही थी। संतोष जी समझ रहे थे, बंदा नया है जहाज के लिए। उन्होंने तुरंत स्क्रीन पर अपनी उंगलियों से टिप-टाप किया और पूछा- क्या देखोगे। मैंने फटाफट आप्शन पढ़ा और बोला- गेम। संतोष जी ने स्क्रीन पर लिखे गेम पर उंगली से टच कर दिया और शुरू हो गया गेम। साउंड कम-ज्यादा करने के लिए सीट के बाएं वाले हत्थे में आप्शन था। सामने और दाएं-बाएं कुल जितने भी बटन थे, अगले आधे घंटे में उन सभी को दबा लिया ताकि ये न रहे कि कोई चीज इस्तेमाल करने से मुझसे छूट गई हो। जहाज अब नीचे की ओर धंसने लगा। यात्रियों से मोबाइल बंद, लैटपाट बंद करने की अपील की जाने लगी। और कुछ देर बाद इंदौर के अहिल्या बाई होलकर हवाई अड्डे इंदौर भ्रमण : अहिल्याबाई होलकर का राजवंशपर जहाज स्थिर हो गया। हवाई अड्डे के गेट पर पहुंचे तो भैरों सिंह शेखावत और उनके आसपास की भीड़ बाहर निकल रही थी। गेट के बाहर दाएं-बाएं लोग हाथों में नाम की तख्तियां लिए खड़े मिले। सामने इंदौर प्रेस क्लब के वरिष्ठ जन और आयोजक स्वागत में मुस्तैद मिले। हम सबके गले में स्पेशल गेस्ट का कार्ड लटकाया गया।

हम सभी होटल पहुंचे- क्राउन पैलेस। एक कमरे में दो लोगों के रुकने की व्यवस्था थी। मैंने संदीप सोनवलकर के साथ रूम शेयर किया। अजय जी और राजेश बादल एक कमरे में। फ्रेश होने, आराम करने के बाद आयोजन स्थल पहुंचे। मंच पर भव्य सजावट थी। लोग आते रहे, मिलते रहे,  दुआ-सलाम करते रहे। मंच से घोषणा हो रही थी- कृपया विराजें ताकि प्रोग्राम शुरू हो सके। गेस्ट लोगों को एक-एक कर मंच पर बुलाया जाने लगा। भैरों सिंह शेखावत, देवी सिंह शेखावत, सुमित्रा महाजन, लक्ष्मीशंकर शर्मा, संतोष भारतीय, अजय उपाध्याय, आशुतोष, दीपक चौरसिया, राजेश बादल, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, परवेज अहमद, के विक्रम राव, श्रवण गर्ग, हरमोस जी कामा, प्रदीप सौरभ, अभय छजलानी, पुष्पा छजलानी, भैय्यू जी महाराज, उमा शशि शर्मा, मुनव्वर राणा.....आदि। मंच पर आगे और पीछे की कुर्सियां पूरी तरह भर गईं। तीसरी लाइन में कई सीटें खाली थीं। भाषाई पत्रकारिता पर बहस शुरू हुई।

दिग्गजों ने अपने अपने विचार रखे। सब एक दूसरे की बात काटने में ज्यादा जुटे थे, अपनी बात कहने में कम। जो अपनी बात इंदौर भ्रमण : राजवाड़ा के अंदर मंदिर में मूर्ति के आगे सिर झुकाता एक श्रद्धालुकहता, उसे उसके बाद वाला आकर काट देता। किसी ने कहा कि ऐसी पत्रकारिता पर शर्म करनी चाहिए। अगले ने बोला- शर्म नहीं, गर्व करो। बहुत अच्छी चीजें हैं। काहे की शर्म। किसी ने कहा हम सब अपराधी हैं, पत्रकारिता को बाजारू और टीआरपी वाला बनाने के लिए। तो अगले ने कहा पाठक भी तो बुरा है, अब वो पहले जैसा कनसर्न कहां रखता है। बिना होमवर्क किए भाषण देने से जो स्थिति बन सकती थी, वो स्थिति बनी। पर आजकल सब चलता है। श्रोता जमे थे। सबको सुन रहे थे। आधी-अधूरी तालियां सभी को मिल रहीं थीं।

नईदुनिया के मालिक और संपादक अभय छजलानी के अभिनंदन का दौर शुरू हुआ। संचालक हृदयेश दीक्षित ने जो समां बांधा वो देर तक चलता रहा। भास्कर समूह के मालिक रमेश चंद्र अग्रवाल आए। उन्होंने थोड़ी देर में कई बातें कहीं। भाजपा-कांग्रेस को एक होकर देश चलाने की सलाह दी। नई दुनिया को सीमित दायरे में होने का एहसास कराया और भास्कर के सफलता की कहानी कहते-कहते खुद को पत्रकारिता और मीडिया का असल संचालक और मास्टर ब्लेंडर साबित किया। रमेश जी से पहले अभय छजलानी ने मालिक और संपादक के रूप में कई दशक के अपने अनुभवों, पाठकों की बदली मनःस्थिति और पत्रकारिता के वर्तमान जीवन में आने वाले इंदौर भ्रमण : पान खाएं प्रदीप सौरभ...द्वंद्व को साफगोई से रखा। नई दुनिया के पत्रकारिता, समाज और जन के प्रति प्रतिबद्ध होने की बात दुहराई और आगे भी इसी रास्ते पर बढ़ते जाने का संकल्प लिया। रमेश जी की बातों से लगने लगा कि अभय जी सफल नहीं हैं, असली सफल तो भास्कर और उसके कर्ता-धर्ता हैं। मंचासीन देवी सिंह शेखावत ने माइक थामा और रमेश जी व अभय जी की बातों को विश्लेषित करने लगे। देवी सिंह ने साफ-साफ कहा कि दोनों की बातों से दोनों की सोच झलकती है। आखिर कांग्रेस और भाजपा एक कैसे हो सकती है? देवी सिंह ने कहा कि रमेश जी की बातों से उनकी सोच का पता चलता है। श्रोताओं को मजा आया। किसी टीवी पर लाइव भिड़ंत जैसा मामला हो गया था। श्रोताओं ने तालियां बजाईं।

बता दें, देवी सिंह शेखावत 'राष्ट्र्पति पति' हैं। उन्होंने आते ही संचालकों-आयोजकों से कह दिया था कि कहीं भी राष्ट्र्पति प्रतिभा पाटिल के पति होने के आधार पर उनका परिचय न दिया जाए। संचालकों ने इस धर्म का निर्वाह किया और देवी सिंह को विचारक, शिक्षा शास्त्री जाने क्या क्या बताते रहे लेकिन देवी सिंह शेखावत हैं क्या, यह बात उनका सहायक बता रहा था जिसकी वर्दी पर राष्ट्रपति भवन का अंग्रेजी में जिक्र मोटे-मोटे अक्षरों में किया गया था। गठबंधन की राजनीति, मजबूरी या धर्म विषय पर बहस शुरू हुई। भैरों सिंह शेखावत ने हर सत्र में अपने चिर-परिचित अंदाज और बेबाकी का एहसास कराया। भैरों सिंह शेखावत के ठीक पीछे बैठे उनके युवा सहायक कागज पर बार-बार लिख और फाड़ रहे थे। वह भैरों सिंह जी के मंच संबोधन के लिए मंचासीन लोगों का परिचय लिख रहे थे। जब वे परिचय लिख चुके होते तो कोई और मान्यवर मंच पर आसीन हो जाते और उन्हें कागज फाड़कर फिर से लिखना पड़ता। पेन ने जवाब दे दिया तो उन्होंने अपने पडो़स में बैठे राजेश बादल से कलम उधार ली। दोपहर के भोजन के लिए छुट्टी हुई और हम सब बाहर निकले।

आयोजन स्थल के ठीक बाहर खाने की व्यवस्था की गई थी। लोग टूटे पड़े थे। खाना लेना पहाड़ जैसा काम लगने लगा। इसी प्रयास में लगीं थीं इरा झा। इरा झा बोलीं- यशवंत, मैं इरा झा। मैंने सादर नमन किया। इरा जी से मेरी फोन पर बात होती रही है। पर उनसे कभी मिला न था। इरा जी भीड़ की स्थिति देख बोलीं- मैं तो नहीं खाउंगी। पर संतोष जी और मैं डटे रहे। आधा-अधूरा खाना प्लेट में ले पाने में सफल रहे। भय्यू जी महाराजमहिलाएं जहां रोटियां बेल रहीं थीं, वहीं बगल में खड़े हो गए और विनती कर रोटी मांगते-खाते रहे। खाना खाने के बाद आराम करने होटल की तरफ चल पड़े। मेरे रूम पार्टनर संदीप सोनवलकर भी होटल चलने के लिए तैयार थे। होटल में संदीप ने अपनी लिखी रचनाएं सुनाईं तो लगा कि इस बंदे पत्रकार के अंदर कोई शायर भी है।

दो घंटे की नींद के बाद फिर आयोजन स्थल पहुंचे। अभय जी का अभिनंदन पहले अतिथियों ने किया फिर इंदौर की जनता ने। इंदौर की जनता द्वारा अभिनंदन करने की आतुरता देखकर अभय जी की लोकप्रियता का अंदाजा हो रहा था। सही मायने में समकालीन पत्रकारिता में अभय जी जैसा मालिक और संपादक गिनने पर इक्का-दुक्का ही मिलेंगे। प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर जैसे लोग इसी शख्स के और इसी नई दुनिया अखबार के जरिए दुनिया के सामने आए।

शाम हो चुकी थी। रात होने वाली थी। भाऊ (अशोक बानखेड़े) ने कान में फूंक दिया था। किसी दूसरे होटल में काकटेल और डिनर भय्यू जी महाराज (बीच में) के साथ प्रदीप सौरभ (बाएं) और अजय उपाध्याय (दाएं)की व्यवस्था है। मन की बात कह दी थी उन्होंने। पत्रकारिता के इतने बड़े आयोजन में अगर काकटेल न हुआ तो फिर क्या हुआ! मन में सोच रहा था कि कभी किसी प्रेस क्लब को पत्रकारिता में काकटेल के योगदान विषय पर राष्ट्रीय परिचर्चा आयोजित करनी चाहिए। अगर काकटेल न होता तो पत्रकारिता का इतना विकास और इतना विनाश, दोनों न हुआ होता। हर चीज के साइड इफेक्ट तो होते ही हैं। खैर, मन की बात मन में रखकर काकटेल युक्त डिनर वाले स्थल पर पहुंचने के लिए मन ही मन बेताब होने लगा। होटल पहुंचे और फिर वहां से डिनर स्थल की ओर रवाना हुए। शहर का कोई बड़ा नामचीन होटल था। नाम भूल रहा हूं। हम लोगों के लिए व्यवस्था ग्राउंड फ्लोर की बजाय उपर की गई थी। ग्राउंड फ्लोर पर संगीत मंडली के नर-नारी हिंदी फिल्म के पुराने गीत गा रहे थे और सैकड़ों लोग पीते-खाते इंज्वाय कर रहे थे। किसी ने कान में कहा- देखो, इन सालों को देखकर कहीं से लग रहा है कि देश में मंदी का असर है। मैं बोल पड़ा- मंदी तो इसीलिए भय्यू जी महाराज के यहां प्रख्यात शायर मुनव्वर राणाहै भाई ताकि इनका खाना-पीना ठीक से चलता रहे, भले दो-चार कर्मचारी भूखों मर जाएं। अपने क्रांतिकारी विचारों को कोसते हुए कि ऐसे हसीन और एलीट जगह भी क्यों खराब-खराब जनपक्षधर खयाल आते रहते हैं, आगे बढ़ा।

तयशुदा जगह पर पहुंचे जो एक बड़ा हाल था व गोल-गोल मेजों के आसपास कुर्सियां रखीं थीं। प्रदीप सौरभ जी के साथ होने से मेरा हौसला  बुलंद था। कोई तो मेरी तरह का पक्का वाला मदिरा प्रेमी मिला। प्रदीप जी से मनुहार की- सर, शुरू किया जाए, जरा बोलिये सालों को, मालटाल लेकर आएं। प्रदीप जी ने बोतलों से युक्त मंच के पीछे खड़े वेटरों की ओर बढ़े। आए तो बोले कि ये सब कह रहे हैं व्हिस्की नहीं है, मैंने बोल दिया है-खरीदकर ले आओ। वेटर शुद्ध पानी बांटते रहे और हम लोग पीते रहे। सब्र खत्म हुआ जा रहा था पर दारू नहीं आ रही थी। प्रदीप जी ने फिर मेरे मन का काम किया। उन्होंने वेटर को हड़काते हुए कह दिया कि पानी ही पिलाते रहोगे या ड्रिंक ले आओगे। वो घड़ी आ गई जब ड्रिंक सामने था। गोल मेज के इर्द-गिर्द बैठे थे अजय उपाध्याय, संतोष भारतीय, संदीप सोनवलकर, प्रदीप सौरभ, अशोक वानखेड़े और मैं।

होटल में प्रदीप सौरभ, संदीप सोनवलकर और राजेश बादलएक पैग पीते-पीते पता चला कि यहां चिखना (स्नैक्स) के नाम पर केवल वेज है। प्रदीप सौरभ जी से मैंने मन की बात कह दी- सर, यहां तो सिर्फ पनीर आलू टाइप चीजें हैं। मुर्गा शुर्गा तो है नहीं ! प्रदीप जी ने वेटरों को धिक्कारा और आयोजकों के बड़प्पन को उकसाया। पर वेटर टस से मस नहीं हुए- साहब, नान-वेज नहीं है। हम लोगों की तरफ से आवाज गई- तो जाओ, नीचे से लाओ। नीचे वाले तो सब खा पी रहे हैं। वेटर डगमगाया नहीं- साहब, वहां से नहीं ला सकते। इस संवाद के दौरान भाऊ कहीं अगल-बगल के टेबल पर थे। वे आए। संकटमोचक भाऊ ने नान-वेज मिनटों में मंगवा दिया। दो पैग के बाद चढ़ने लगी थी। भाऊ की तरफ देखा तो वे मेरी तरफ देख रहे थे। आंखों से इशारा कर पूछा- सब ठीकठाक। मैंने तेजी से गर्दन हिला कर हां में जवाब देते हुए अभिवादन किया, मुर्गे की पकौड़ी वाली एक गोली प्लेट से उठाकर घुलाने लगा।

अजय जी ने पीने से मना कर दिया था। सोचा, एक बार मैं भी रिक्वेस्ट कर लूं। सर, एक पैग तो ले लीजिए। अजय जी टस से मस नहीं हुए। अजय जी जो ठान लेते हैं सो ठान लेते हैं। पर अजय जी फल के जूस पीते हुए महफिल में सक्रिय रूप से मौजूद थे। पैग होटल में रिसेप्शन पर संदीप सोनवलकर और अशोक वानखेड़े उर्फ भाऊपर पैग अंदर जाने लगे। गोल मेज के इर्द गिर्द बैठे लोग डोलने लगे थे। समाजवादी व्यवस्था कायम हो चुकी थी। इस गोल मेज का आदमी उस गोल मेज की महफिल में हिस्सेदार होने लगा था और उस गोल मेज वाला इस गोल मेज की महफिल में। संदीप सोनवलकर के कविता पक्ष का रहस्य मैंने उजागर किया और महफिल में पेश करने की गुहार लगाई। सकुचाने, नकारने और इतराने वाली औपचारिक अदाओं के बाद संदीप शुरू हुए तो लोग वाह-वाह कर उठे। प्रदीप सौरभ जी पड़ोस की गोल मेज की महफिल के मुख्य वक्ता बन चुके थे। मैंने आवाज दी- सरजी, मैं भी सुनना चाहता हूं आपको। जवाब आया- सीटें बुक हैं, कई श्रोता कतार में हैं, तुम्हारी बारी दूर दूर तक नहीं है। मैं मुस्कराया। मदिरा बाबा सबके सिर चढ़ चुके थे। सीनियर लोग अब मदिरा स्वामी बन चुके थे। ढेर सारा पीने के बाद थोड़ी सी खाने की परंपरा का यहां भी निर्वाह करते हुए हम लोगों ने डिनर और उत्सव के शानदार होने संबंधी मुहर महफिल में मौजूद आयोजकों के समक्ष बातों के जरिए लगा दी।

होटल से बाहर निकले तो एक लड़की लड़के के कंधे पर सिर रख रोती हुई दिखी। मैं ठिठक गया। अपने साथियों को दिखाया- वो देखो लड़की रो रही है और कल महिला दिवस है। वरिष्ठ साथियों में से एक बोले- आगे बढ़े चलो यशवंत, बड़े लोगों की बड़ी माया इंदौर भ्रमण : बचपन और व्यापारतुम समझ नहीं पाओगे। मुझे भी लगा, ये कोई गांव-देहात तो है नहीं कि दुख के मारे ही लोग रोते होंगे। ये तो नशे का रुदन है, मस्ती का रुदन है, खुशी का इजहार है, प्यार की महिमा अपरंपार है। जय हो, कहते हुए आगे बढ़ चला। ड्राइवर रूपी मालिक बहुत देर तक खोजबीन के बाद प्रकट हुआ। उसे खोजन में महती भूमिका निभाई संदीप सोनवलकर ने। युवा और शहरी पत्रकार की चतुराई व सतर्कता काम आई। ड्राइवर से स्पीड कम करने को कहा गया तो बोला, मैं मालिक हूं और अपनी गाड़ी क्यों ठोंकना चाहूंगा!  उसकी बात सुनकर अंदर से खुशी हुई- बंदा ठीक आदमी लगता है, थोड़ा पिए लगता है, थोड़ा साहसी लगता है, चल भाई चल, जितनी इच्छा हो उतनी तेज चल, तेरी गाड़ी ठुकेगी नहीं तो फिर हम लोगों को काहें का डर। होटल में नशे की अभिन्न अवस्था में पहुंचे तो ध्यान आया, पूरे दिन मेल नहीं चेक किया। नशे में काम निपटाने में बड़ा मजा आता है। लप्पूटप्पू खोला और काम में जुट गया। एकाध घंटे मेल चेक करने के दौरान संदीप सोनवलकर ने एक बार हुंकार लगाई- लाइट बंद करो, सो जाओ। अच्छे पड़ोसी का धर्म निभाते हुए सब स्विच आफ करने लगा, दिमाग भी।

सुबह देर में जगे। इंदौरी स्पेशल नाश्ता पोहे, जलेबी और कचौड़ी पड़ोस के अजय जी वाले कमरे में मंगाया जा चुका था, सौजन्य से भाऊ। नाश्ते के बाद घूमने का प्रोग्राम बना। एक गाड़ी मिली और साथ में एक स्थानीय साथी, जो राह का मार्गदर्शन कर सके। इंदौर भ्रमण : बचपन और व्यापारराजाओं के खंडहर महल और जगमगाते मंदिर को देखने के बाद भय्यू जी महाराज से मिलने के लिए रवाना हुए। इससे पहले एक दुकान पर दुबारा नाश्ता कर पान दबाया गया। नाश्ता कराने वाले दुकान मालिक ने अपने हाथ से हम लोगों के मुंह में पान का बीड़ा डाला। यह इंदौरी परंपरा है। उत्सव के पहले दिन फोटोग्राफी न कर पाने का दुख मुझे था। मंच पर बैठे होने के चलते जो विशिष्ट बोध पैदा हो गया था उसने मेरे अंदर के पत्रकार की हत्या कर दी थी। भड़ास4मीडिया के लिए कोई तस्वीर न ले पाने का बदला दूसरे दिन निकाला। हर चीज की फोटो खींचने में जुट गया। मंदिर, महल, पान की दुकान, रंग बेचता बच्चा, यात्री का इंतजार करता घोड़ा.....।

हम लोग घूमते-घामते भय्यू जी महाराज के यहां पहुंचे। पहले दिन मंच पर भय्यू जी भी थे। किसी से पूछा था कि ये कौन हैं तो बताया गया कि ये बहुत बड़े संत हैं। देश के दस बड़े संतों में पांचवें पोजीशन पर हैं। भय्यू जी के घर पहुंचे तो 36 साल का नौजवान घर के कपड़ों में प्रकट हुआ। बिलकुल आम आदमियों जैसे भय्यू जी। बातें शुरू हुईं तो भय्यू जी ने जो कुछ कहा उससे लगने लगा कि इस बंदे में दम है, वाकई ये संत है। जितने भी संतों को आज तक देखा है, सभी में कहीं न कहीं दिखावा और आंडबर दिखा पर यह इंसान तो बिलकुल सहज और सरल है। हर चीज के प्रति इसकी दृष्टि कितनी साफ है। इसने अपने जीवन को मनुष्यता और मानवता के लिए समर्पित कर दिया है और इतनी कम उम्र में इसने जितने बड़े पैमाने पर दुखियारों, किसानों, बच्चों, उपेक्षितों, वंचितों का भला किया है उतना तो बड़े-बड़े संत कई जन्म में नहीं कर पाते। मशहूर शायर मुनव्वर राणा भी भय्यू जी के यहां पहुंचे। मुनव्वर राणा का मैं निजी तौर पर फैन हूं। यह बात उनसे कभी कह नहीं सका क्योंकि मैं उनसे कभी मिला ही नहीं था। मुनव्वर जी से यह बात मैंने भय्यू जी के सामने कह दी। मुनव्वर ने कई शेर सुनाए। भय्यू ने कई बातें बताईं। दोनों की बातें मनुष्यता और आम जन को केंद्र में रखकर थीं। फर्क बस इतना कि एक पद्य में कह रहा था दूसरा गद्य में। मैंने मन की यह बात दोनों के सामने कह दी। दोनों मुस्कराए।

भय्यू जी को और ज्यादा जानने की इच्छा होने लगी। कई सवाल किया। डेट आफ बर्थ पूछा। शिक्षा और परिवार के बारे में पूछा। भय्यू के परिवार में दूसरा कोई भी व्यक्ति संत नहीं है। मतलब, वो संत पुत्र नहीं हैं। तो फिर इतनी कम उम्र में इतनी प्रतिष्ठा, इंदौर भ्रमण : प्रेस क्लब के बाहर अजय उपाध्याय (बीच में) के साथ फोटो खिंचाते यशवंत सिंहइतना बड़ा कद कैसे पा सके। भय्यू जी से मैंने उनसे संबंधित जितने भी लिट्रेचर है, सब मांगा। चलते-चलते एक आखिरी सवाल दागा- गुरुवर, मैं शराब और मांस का बेहद शौकीन हूं। बहुत मन से पकाता और पीता हूं। पर सुबह उठता हूं तो जाने क्यों अपराध बोध होता है कि ये सब चूतियापा कब तक चलता रहेगा। दरअसल, हमारे खानदान में मांस और मदिरा का खूब चलन है और बचपन से यह सब देखता, करता आया हूं। पर मैं इससे वाकई मुक्ति चाहता हूं क्योंकि इनके सेवन से कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। देर तक सोता रहता हूं। कैसे मुक्ति पाऊं मांस-मदिरा से? भय्यू जी ने जवाब दिया- इंद्रियों और विवेक के बीच हमेशा द्वंद्व चलता रहता है। विवेक जीतता है तो इंद्रिया काबू में रहती हैं। इंद्रियां जीतती हैं तो विवेक पराजित होता है। आपको अपना विवेक, जो चंचल है, लचीला है, उसे मजबूत बनाना होगा। विवेक मजबूत करके ही इंद्रियों पर नियंत्रण किया जा सकता है। इंद्रियों का तो काम है लालसाओं को अपनाना, लालसाओं के करीब जाने के लिए प्रेरित करना। विवेक आपको सही-गलत में भेद कराता है। आप बस इरादे को मजबूत करिए। विवेक की कही बात को हमेशा ध्यान में रखिए। इंद्रियों के लोभ-लालच को समझिए और उसे तिरस्कृत करिए। भय्यू जी का जवाब काफी कुछ सही है। मनुष्य हम हैं तो विवेक और इंद्रिय के द्वंद्व के चलते हैं। जिस दिन विवेक इंद्रियों को अपने वश में कर ले उस दिन समझो मनुष्य नहीं संत हो गए हम भी। फिलहाल मुझे संत बनने का कोई शौक नहीं, सो, इस सुझाव को दिमाग के डेस्कटाप पर सेव कर लिया है। हालांकि भय्यू का भी यही कहना है कि संत बनने के लिए कोई वेश धरना जरूरी नहीं।

उन्होंने खुद के बारे में बताया कि मैं एक आदमी की तरह रहते हुए सब कुछ करना चाहता हूं। भय्यू से जो सवाल पूछे गए उसमें उन्होंने बताया कि वे राजनीति में कभी नहीं जाएंगे। राजनीति में ऐसे युवाओं को जरूर भेजना चाहेंगे जिनकी चेतना में जन और सेवा हो। भय्यू ने कसम खा लिया है कि वे जीवन में कभी कोई पद नहीं लेंगे, कोई सम्मान ग्रहण नहीं करेंगे, मठ और मठाधीशी से से दूर रहेंगे और शिष्य संप्रदाय का इंदौर भ्रमण : होली के रंग की बिक्रीनिर्माण नहीं करेंगे। ये चार कसमें वाकई अचंभित करने वाली हैं क्योंकि कोई भी संत नाम-दाम कमाने के बाद सबसे पहले मठ और शिष्य बनाने में जुट जाते हैं।

भय्यू के यहां देर तक बातचीत के बाद वहां से इंदौर प्रेस क्लब पहुंचे जहां फोटो जर्नलिज्म पर वर्कशाप का आयोजन था। इससे पहले के सत्र में महिला दिवस पर संगोष्ठी थी। थोड़ी देर बाद हम लोग होटल पहुंचे और नित्य क्रिया से मुक्त होते-होते एयरपोर्ट पहुंचने का वक्त होने लगा। इंदौर से एयरपोर्ट चलने से पहले मैंने तय कर लिया था जहाज की यह तीसरी यात्रा नशे की अवस्था में करूंगा। इसीलिए मैंने चुपके से होटल में ही दो पैग मार दिए। मैंने संदीप सोनवलकर और प्रदीप सौरभ से साथ देने को कहा पर कोई तैयार नहीं हुआ। संदीप बोले- मैं कभी कभार पीता हूं। प्रदीप जी बोले- सनसेट के बाद ही लेता हूं। मैंने फिर अकेले ही दो पैग फिश फ्राई और दाल-चावल के साथ निपटाया।

रात सवा आठ बजे के लगभग अजय जी और मैं जहाज पर चढ़ रहे थे। रात में जहाज जब नीचे से उपर उठना शुरू हुआ तो फिर मैं जहाज यात्रा के रोमांच से रोमांचित होने लगा। अजय जी से ढेर सारी बातें जहाज में कीं। बेहद सुलझे, सरल और सहज अजय जी मेरे अच्छे बुरे प्रश्नों के जवाब देते गए। मैं पूछ रहा था- जहाज किस तेल से चलता है- पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, सरसों का तेल या कोई और तेल। अजय जी ने बताया- इनमें से किसी से भी नहीं। जहाज चलता है गैसो लीन से। यह पेट्रोल का उच्चतर फार्म होता है। इसे भी पेट्रोलियम पदार्थ कह सकते हैं। पेट्रोल का कमतर फार्म डीजल होता है। जहाज को लेकर जितनी भी उत्सुकताएं, जिज्ञासाएं, भड़ास थी, वो सब उगल दिया।

दिल्ली में जहाज को उतरने की अनुमति नहीं दी जा रही थी। जहाज दिल्ली के उपर चक्कर काटता रहा। मैंने अजय जी से पूछा- सर, यह किधर घूम रहा है। अजय जी हंसते हुए बोले- द्वारका से शाहदरा और शाहदरा से द्वारका आ जा रहा है। जिस जहाज से लौटे थे, यह छोटा था। सीटें कम थीं। एयर होस्टेस भी केवल एक थी। उतरते वक्त एयर होस्टेस ने कहा- गुड नाइट सर। रामनामी कुरता पहने और भय्यू महाराज के हाथों तिलक लगाए मैंने आशीर्वाद दिया- प्रसन्न रहो बच्ची, इसी तरह उड़ती रहो, आगे बढ़ती रहो। वो मुस्कराई और थैंक्यू बोली। अजय जी ने टोका- यशवंत, यह सब बोलना जेंडर बायस का मामला बन सकता है। ये एयरहोस्टेस बेहद सतर्क और तुनकमिजाज होती हैं। रिपोर्ट दर्ज करा देंगी तो एक रात यहां हवालात में सोना पड़ेगा। मैं थोड़ा डरा पर कुतर्क करते हुए बोला- सर, हवालात का अनुभव भी नया अनुभव होगा। जीवन तो नित नए खराब अच्छे अनुभवों का ही नाम है। ठहर गए तो समझो मर गए। अजय जी मेरे बालकोचित कुतर्क पर मुस्करा कर रह गए।

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लेखक यशवंत सिंह हिंदी मीडिया की खबरों के नंबर वन पोर्टल भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर हैं। उनसे संपर्क करने के लिए This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या 09999330099 का सहारा ले सकते हैं।

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