मीडिया व बाजार की बाढ़ में सृजन की डूबती नाव

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''मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भूलकर बाजार की ताल पर नाच रहा है। इसका दुष्प्रभाव सृजन कर्म जैसे महत्तम क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। नैसर्गिक सृजन करने वाले उपेक्षित व दरकिनार हैं। उनके काम को जनता समाज के सामने लाने में मीडिया की कोई रुचि नहीं रह गई है। उसे बिकाऊ माल चाहिए जो बाजार में सरपट अंधी दौड़ मचा सके, जनता को भरमा सके। खुद सृजन क्षेत्र के मठाधीश भी बाजार के दबाव में वह सब कुछ कर रहे हैं जो सृजन के सहज प्रवाह की प्रक्रिया को अवरूद्ध करता है। आज समाज के सृजनकारों को मिल बैठकर सोचने-समझने और रणनीति तय रकने की जरूरत है, ताकि मानव समाज को स्वस्थ विकास की दिशा मिल सके। सृजन के मठाधीश व मीडिया की चाल में नवोदित सृजनकारों को कोई ठौर नहीं।''

यह नतीजा निकाला गया 'सृजन पर ग्रहण' विषय पर पिछले दिनों गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली में आयोजित संगोष्ठी में। संगोष्ठी का आजोन 'संगमित छवि' की तरफ से किया गया। इसमें अरविंद कुमार सिंह, प्रेमपाल शर्मा, कलाकार रूपनारायण बाथम, जितेन हजारिका, शेर सिंह कुक्कल, विजयशंकर मिश्र, कुबेर दत्त, प्रताप अनम, उमेश कुमार, चंचल चौहान, डा. नीलिमा गुप्ता, डा. राकेश सिंह, डा. संजय साहनी, डा. वंदना आदि मौजूद थे। संगीतकार विजयशंकर मिश्र ने कहा कि संगीत सृजन क्षेत्र में ग्रहण की काली छाया स्पष्ट दिखाई दे रही है। उनका मानना था कि मौलिकता से तौबा कर बॉलीवुड में पश्चिमी धुन की नकल करने की प्रतियोगिता चल रही है। अभी तक हम पश्चिम के प्रोत्साहन पर ही टिके हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि आखिर हम कब तक पश्चिम की तरफ ताकते रहेंगे। उन्होंने कहा कि स्लमडॉग मिलनेयेर में संगीत और गीत को मिले आस्कर एवार्ड पर हमें इतराने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह पुरस्कार किसी पश्चिम के निदेशक द्वारा बनाई गई फिल्म ने दिलाई गयी है। क्या आस्कर वालों को हमारे स्वर्णयुगीन फिल्मों और उसके संगीत गीत सुनाई दिखायी नहीं देते। श्री मिश्र ने कई फिल्मों का नाम गिनाते हुए कहा कि आखिर इन फिल्मों की संगीत की मौलिकता को कौन नकारेगा। लेकिन इसे आस्कर नहीं मिलेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि 'दो आंखें और बारह हाथ' जैसे फिल्म के संगीत को आखिर आस्कर की क्या जरूरत है?

कलाकार जितेन हजारिका ने अपने संबोधन में कहा कि कला, साहित्य व सृजन पर ग्रहण तो नहीं लेकिन उसकी छाया जरूर है। इस ग्रहण रूपी छाया को दूर करने के लिए बाजार से इतर कलाकारों को ही सोचना होगा और उन्हें आगे आकर इसे दूर करना होगा। लेखक व कलाकार कुबेर दत्त ने अपना संबोधन एक व्यंग्य काव्य के रूप में प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने समाज में सृजन पर ग्रहण के विभिन्न पहलुओं को निरूपित किया। सृजन पर ग्रहण को और गहरा बनाने की भूमिका में कलाकार व मीडिया की भूमिका पर श्री दत्त ने तार्किक प्रहार किया। लेखक प्रताप अनम ने 'सृजन पर ग्रहण' पर अपने विचार कुछ विशेष अंदाज में रखा। कहा कि सृजन का क्षेत्र मौलिकता की मांग करता है लेकिन इसमें वरिष्ठ कलाकारों की भूमिका डिक्टेटर की हो गयी है। काम ठेके पर कराये जा रहे हैं और आउटलाइन बनाने व अपना हस्ताक्षर करने का कार्य ही वरिष्ठ कलाकार कर रहे हैं। उस कला को लाखों में बेचा जा रहा है लेकिन उसके मूल सर्जक को मिलते हैं मात्र पांच से दस हजार रुपये। ऐसे में कलाकारों में कुंठा की भावना पैदा हो रही है और वे भी पायरेसी को बढ़ावा देने लगे हैं। इससे बाजार की भूमिका बहुत अहम हो गयी है। इस बाजार को बढ़ाने में मीडिया की भूमिका वरिष्ठ कलाकारों के साथ है जबकि वही सृजन पर ग्रहण के जिम्मेदार हैं।

मुजफ्फरनगर से आईं कलाकार डा. वंदना ने कहा कि सृजन पर ग्रहण को खत्म करने की जिम्मेदारी हम कलाकारों की है। बाजार के आगे हमें झुकना छोड़ना होगा। कला बाजार के लिए नहीं बल्कि समाज के लिए बनायी जानी चाहिए। कला व साहित्य समाज की धरोहर होनी चाहिए, न कि बाजारू वस्तु। उन्होंने सभी कलाकारों से बाजारवाद को ध्वस्त करने का आह्वान किया। कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में लेक्चरार डा. राकेश सिंह ने सृजन पर ग्रहण जैसे मौलिक समस्या पर परिचर्चा के लिए संयोजक कुमार अमिताभ व संगमित छवि की पहल का स्वागत किया। उनका मानना है कि आज ऐसे विषय को जिसे मीडिया व समाज ने अपनी थाती समझना ही छोड़ दिया है,  संगमित छवि ने परिचर्चा का विषय बनाकर समाज के लिए एक बहुत बड़ा कार्य किया है। श्री सिंह का मानना है कि कला व साहित्य में घोस्ट राइटिंग व पेंटिंग बहुत गंभीर मुद्दा है। इस गंभीर मुद्दे को समाज के सामने लाया जाना समय की जरूरत है। इस पर लगातार बहस होनी चाहिए ताकि समाज अपनी धरोहर की मौलिकता को परखने की ताकत संजोये रख सके।

फिल्म निर्माता व पटकथा लेखक उमेश कुमार ने कहा कि हम सृजन के क्षेत्र में अंग्रेजियत से दबे हुए हैं इसलिए हमारी मौलिकता उभरकर सामने नहीं आ पाती। यदि कोई मौलिक देने की कोशिश भी करता है तो उसे मीडिया में कोई तवज्जो नहीं मिलती। हमने तो अपने भाव-भाशा को भुला दिया है। बाजार के प्रभाव में हैं हम सब। पश्चिमी दुनिया बाजार के मार्फत ही किसी भी क्षेत्र में कब्जा करने की चेष्टा में है और उसमें वह सफल है। कला जैसे क्षेत्र में सृजन का नजरिया पेश करते हुए एक वक्ता ने एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक बार एक अंग्रेज भारत आया तो उसने एक पेंटर से कहा -आप अपना कुछ काम दिखाइए। जब कलाकार ने अपनी पेंटिंग दिखायी तो वह बोला, कुछ ऐसा दिखाइए जो आपका अपना हो। यह तो हमारे यहां 50 साल पहले की युग की पेंटिग है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हमारी कला अभी पश्चिमी देशों से पचास साल पीछे है। अभी हम पश्चिम की नकल में लगे हुए हैं।

कार्यक्रम के संयोजक कुमार अमिताभ ने कहा कि सृजन का सुख, दुनियावी किसी भी सुख से ज्यादा आनंददायक है। सृजन असीम आनंद का स्रोत है। यह हमारे विकास का मूल भी है। संसार को आगे बढ़ाने के लिए सृजन का ही सहारा है। इसके बगैर जीवन ठहर जाएगा। ठहराव, सड़ांध, बदबू और फिर मौत का संदेशा लेकर ही आएगा। इसलिए सृजन के रास्ते में बाधाओं पर विचार, समाज के हर हिस्से के लिए जरूरी है। कला साहित्य के क्षेत्र में सृजनकर्ता लूट लिया जाता है। इससे ज्यादा त्रासद स्थिति शोध के क्षेत्र में है जिसे शायद महत्व ही नहीं दिया जाता। ऐसा लगता है कि सभी पका-पकाया ही खाना चाहते हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों में तो किराये पर शोध-पत्र तैयार होते हैं। सरकारी शोध लेखन कर्म में भी कटिंग-पेस्टिंग पर जोर है। लूट मची है या फिर ज्ञान का कोई महत्व नहीं है जिससे एक तरह की कुंठा व्याप्त है। कोई भी कुछ नहीं कहना चाहता। कुछ मौलिक देने में यकीन नहीं रखता। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने किया जबकि धन्यवाद प्रस्ताव पत्रकार अवधेश कुमार ने पेश किया। कार्यक्रम के आयोजन में पत्रकार शिशकांत सुशांत, प्रवीण पंकज, अजय पांडे और रामबली प्रजापति की अनन्य भूमिका रही।

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