अन्ना और मीडिया से आतंकित सत्यव्रत चतुर्वेदी व रमाकांत गोस्वामी का भाषण सुनकर उन्हें सुनाए बिना न रह सका

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: आपको पता है कि ...लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई.. लिखने वाले शायर का नाम? : जब आप सम्मान लेने बुलाए गएं हों तो मौका-ए-वारदात पर पूरे सम्मान के साथ मौजूद रहना चाहिए. किसी को टोकना-टाकना नहीं चाहिए. और, सम्मान पकड़कर प्लास्टिक वाली मुस्कान फेंकते हुए मनेमन मुनक्का मनेमन छुहारा होते हुए अपनी सीट पर लौट आना चाहिए.

और सम्मानित किए जाने वाले घटनास्थल से विदा लेते हुए सबके प्रति आभार से भर जाना चाहिए, सिर झुका-झुका कर व्यक्त कर आना चाहिए. यही रिवाज है. यही चलन है. पर लगता है अब अपनी किस्म में सभा-सभागारों में जाना नहीं लिखा है क्योंकि जहां जाता हूं वहां अपनी असहमति व्यक्त किए बिना नहीं रह पाता हूं, और, जाहिर है, इससे आयोजकों को थोड़ी दिक्कत परेशानी होती होगी. अपने बड़े भाई समान मित्र पंडित सुरेश नीरव ने बड़े प्रेम से आदरणीय दामोदर दास चतुर्वेदी स्मृति सम्मान समारोह में सम्मान लेने के लिए बुलाया था. आज अन्ना डे होने के बावजूद प्रोग्राम हुआ और मैं उसमें शरीक हुआ. मंच पर कांग्रेस के दो नेता मौजूद थे. सत्यव्रत चतुर्वेदी और रमाकांत गोस्वामी.

सत्यव्रत चतुर्वेदी कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता माने जाते हैं और रमाकांत गोस्वामी हिंदुस्तान अखबार में 33 साल नौकरी करने के बाद इन दिनों कांग्रेस की दिल्ली राज्य सरकार में उद्योग मंत्री हैं. इन दोनों नेताओं ने मंच से अपने भाषण में बिना नाम लिए अन्ना और उनके आंदोलन को कोसा. और दोनों ने ही मीडिया को जमकर कोसा. तरह तरह के उदाहरण देकर कोसा. कई बार मैं उन दोनों को सुनते हुए उबला लेकिन चुप रहा. पर जब सम्मान लेने के लिए मंच पर बुलाया गया तो दो मिनट बोलना है, कहकर मंच की तरफ बढ़ चला.

संचालक महोदय को मजबूरन माइक थमाना पड़ा और मैं कह बैठा- चूंकि मैं भड़ास4मीडिया से हूं और भड़ास निकालना मेरा काम है, इसलिए यहां जो मन में भड़ास है, उसे निकाल ही देना चाहता हूं. मैं कांग्रेस के इन दोनों नेताओं, जिनके हाथों सम्मान दिलाया जा रहा है, के संबोधन से अपनी असहमति जाहिर करता हूं. मीडिया में मार्केटिंग बहुत ज्यादा हो गई है संबंधी रमाकांत गोस्वामी के आरोप के बारे में उनसे पूछना चाहूंगा कि इस देश में मार्केटिंग, बाजारीकरण की शुरुआत क्या कांग्रेस पार्टी ने नहीं कराई, और जब कराई तो फिर अब मीडिया को क्यों कोस रहे हैं, खुद को कोसें. दूसरी बात, मैं अन्ना का जोरदार समर्थक हूं, और चाहता हूं कि इस देश में जनांदोलन होते रहें ताकि बेलगाम सत्ताधारियों के मन में डर रहे और इसी डर के कारण वे गलत काम न करें, जनता के प्रति उनकी जवाबदेही बनी रहे.

कुछ इसी तरह की बातें कहकर मैं मंच से नीचे उतर आया. सभागार में बैठे लोगों ने मेरे कहे को समर्थन अपनी तालियों से दिया. बाद में ईटीवी के साथियों ने बाइट ली, और मुझे सराहा कि मैंने उनके दिल का बात कह दी. कई लोगों ने मुझसे मिलकर मुझे सराहा. पर मैं यह सोचता रहा कि अगर सभी के मन में सत्यव्रत चतुर्वेदी और रमाकांत गोस्वामी के कहे के प्रति गुस्सा था तो बाकियों ने अपना विरोध क्यों नहीं प्रकट किया. हां, संतोष मानव नामक सज्जन ने अपनी तल्खी का इजहार रमाकांत गोस्वामी के बोलते वक्त यह कहकर किया कि- ''फिर आप ही गांधी बनने की कोशिश क्यों नहीं करते''.

मानव ने रमाकांत गोस्वामी से यह तब कहा जब गोस्वामी अन्ना का नाम लिए बिना कह रहे थे कि जो लोग आजकल गांधी के नाम पर सब कुछ कर रहे हैं वे दूर दूर तक गांधी जैसा कुछ नहीं कर रहे हैं. पूरे आयोजन में कांग्रेसी नेताओं का संबोधन यह बताने के लिए काफी रहा कि कांग्रेसियों के दिलोदिमाग पर इन दिनों अन्ना और मीडिया का खौफ बुरी तरह तारी है. रमाकांत गोस्वामी कह बैठे कि उनके यहां इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक ब्यूरोचीफ आए और कह बैठे कि उन्हें कोई ऐसी खबर बताइए जिसे बेचा जा सके. यह सुनाते हुए रमाकांत गोस्वामी का कहना था कि मीडिया में आजकल खबर नहीं, मार्केटिंग का दौर है.

जाहिर है, कभी पत्रकार रहे रमाकांत गोस्वामी कांग्रेसी होने के अपने धर्म का निर्वाह कर रहे थे क्योंकि अगर वे मीडिया का विरोध करने के बहाने अन्ना का विरोध नहीं करते तो कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा का कैसे प्रदर्शन करते. सत्यव्रत चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में अपनी एक कविता सुनाकर यह साबित करने की कोशिश की कि राजनीति में न सबकुछ अच्छा होता है और न सबकुछ बुरा. दोनों के बीच संतुलन ही राजनीति है. और जो कविता सुनाई उसमें उन्होंने रामायाण के कई प्रसंगों के जरिए राम को सत्तालोलुप बताते हुए उनके कई कृत्यों को जनविरोधी और समाजविरोधी साबित किया.

रमाकांत गोस्वामी भी उन्हीं के नक्शेकदम पर रामायण का जिक्र करते हुए दशरथ को कह बैठे कि उन्हें मोक्ष नहीं मिला क्योंकि उन्होंने मरते हुए हे राम की जगह बेटा राम कहा था जबकि गांधी ने मरते हुए हे राम कहा था, इसलिए उन्हें जरूर मोक्ष मिला होगा. इन कांग्रेसी नेताओं को सुनते हुए लग रहा था कि वाकई कांग्रेसी कितने ढीठ, थेथर, कुतर्की, जनविरोधी और अतिशय आत्ममुग्ध होते हैं. अन्ना के आंदोलन के इस दौर में मुझे इन अन्ना विरोधी कांग्रेसियों के हाथों सम्मान लेते हुए मलाल हुआ लेकिन मंच पर अपनी बात रखकर मैंने अपने मन को हलका कर लिया और बाद में ''...लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई'' लाइनें लिखने वाले मुजफ्फरनगर के बुजुर्ग शायर को सम्मान में मिली शाल को अपनी तरफ से ओढाकर उन्हें सम्मान के काबिल करार दिया और इस तरह से सम्मान के बोझ से मुक्त हुआ.

रमाकांत गोस्वामी, शशि शेखर, सत्यव्रत चतुर्वेदी और पंडित सुरेश नीरव.

''लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई'' लिखने वाले शायर के साथ बाएं डा. सुभाष राय और दाएं कुमार सौवीर.

विडंबना देखिए कि मुजफ्फरनगर के बुजुर्ग शायर का नाम मुझे भी इस वक्त याद नहीं आ रहा. हां, अच्छा काम ये किया मैंने कि उन्होंने मंच से जितनी देर अपनी बात रखी, शेर पढ़े, उस सबको मोबाइल में रिकार्ड कर लिया. प्रोग्राम खत्म होने के बाद भी काफी देर तक उनके साथ रहा और उनके शेर सुने व रिकार्ड किए. लखनऊ से आए जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय और पत्रकार कुमार सौवीर ने भी उस बुजुर्ग शायर से बात की. जल्द ही उन शायर महोदय के बारे में विस्तार से रिपोर्ट, वीडियो प्रकाशित-अपलोड करूंगा. इन शायर महोदय के बारे में पता चला कि उनके लिखे ''....लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई'' को पाकिस्तान में दो शायर अपना लिखा बताते हैं और भारत में भी कई दावेदार पैदा हो गए थे.

इन लाइनों को भारत के तीन प्रधानमंत्री अपने वक्तव्यों-भाषणों में बोल चुके हैं, पर किसी ने शायर का नाम नहीं लिया या उन्हें शायर का नाम नहीं पता. कहानीकार कमलेश्वर ने इन लाइनों को सुनाते हुए कहा था कि इसके रचनाकार मर चुके हैं, पर जब उनके सामने पंडित सुरेश नीरव ने रचनाकार को पेश किया तो वे हक्के बक्के रह गए. ये बातें आज प्रोग्राम खत्म होने के बाद बुजुर्ग शायर महोदय से जुड़ी बातचीत के क्रम में पंडित सुरेश नीरव ने बताई.  फिलहाल इतना ही.

यशवंत

भड़ास4मीडिया

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