पूंजी का गुलाम पत्रकार अंततः मार्केटिंग मैन में तब्दील हो जाता है

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: राजस्थान के चित्‍तौड़गढ़ में आयोजित प्रदेशस्तरीय मीडिया कार्यशाला में वर्तमान पत्रकारिता पर हुआ विचार मंथन : राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के तत्वावधान में तीसरी बार चित्तौड़गढ़ जैसे मझोले शहर में राज्यस्तरीय मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें दिल्‍ली समेत राजस्‍थान के वरिष्‍ठ पत्रकारों ने भाग लिया। कार्यशाला की शुरुआत पदमिनी होटल में चार सितम्बर को दोपहर 12 बजे के करीब हुई।

कार्यक्रम में प्रमुख वक्‍ता के तौर पर भड़ास4मीडिया डाट काम के संस्थापक और संपादक यशवन्त सिंह ने कहा कि सत्य की परिभाषाएँ अनेक मिल जाएंगी मगर सत्य आजकल तलाशने पर मुश्किल से मिल पाता है। सच को लिखने की हिम्मत जुटाने वाले पत्रकार समय आने पर अपने मीडिया हाउस के चोचलों में फंसते हुए अपने सिद्धान्तों से समझौता कर लेते हैं। वही कलम ईमानदारी से लम्बे समय तक चल सकती है जिसका आधार आम जनता और उसके पक्ष का सच हो। मीडिया, सत्ता, प्रशासन उपर से जैसा दिखता है, अंदर से उसकी तस्वीर बिलकुल अलग होती है। नैतिक मूल्यों की बातें करने वाले लोगों का असली सच कुछ और होता है। ये लोग नैतिक बातें निचले तबके के लागों को बरगलाने के लिए करते हैं। यह आम जनता को फंसाने का सोचा समझा दर्शन होता है। इस दौर में मेन स्‍ट्रीम मीडिया के भरोसे न रहते हुए समाज के हर व्यक्ति को अपने बूते न्यू मीडिया आन्दोलन से जुड़ना होगा। ब्लॉग, वेबसाइट, मोबाइल, कम्यूनिटी रेडियो, स्वयं के छोटे-छोटे अखबार के जरिए न्यू मीडिया के आंदोलन को आगे बढ़ाकर लोकतंत्र में पारदर्शिता को बढ़ावा दे सकते हैं। कई छोटी वेबसाइटें और ब्लाग बहुत कमाल का काम कर रहे हैं। इन लोगों ने बड़े-बड़े शोषक-शासकों के असली चेहरे का खुलासा किया है।

यशवंत ने कहा कि मैं आपके बीच का ही आदमी हूँ. मुझे कोई लच्छेदार भाषण देना नहीं आता, न ही मैं कोई प्रवचन देने वाला संत हूं जो अच्छी अच्छी बातें बोलेगा. मैं संघर्षों से उपजा शख्स हूं जिसके पास कई वर्षों का जमीनी अनुभव है। उसे ही आधार बनाकर यहां अपनी बात रख रहा हूं। हम लोगों ने मीडिया के बढ़ते फैलाव की हकीकत जानने और मीडिया जगत के भीतर क्या कुछ हो रहा है, उसको तलाशने के लिए भड़ास4मीडिया नामक वेबपोर्टल शुरू किया जिसके जरिए मीडिया के अंदर के सच को उजागर किया गया और कर रहे हैं। रोजाना लाखों दिलों में धड़कने वाली यह वेबसाइट एक नवाचारी कदम है, जो न्यू मीडिया आंदोलन को बढ़ाने वाली है।

यशवंत सिंह ने कहा कि अब जो दौर है, उसमें हर आदमी पत्रकार हैं. इसीलिए कुछ सालों से सिटिजन जर्नलिज्म का कांसेप्ट उभरा है। जिन लोगों पर पत्रकारिता करने की जिम्मेदारी है, वे ही धंधा करने लगे तब जरूरी हो जाता है कि हर नागरिक पत्रकार बन जाए ताकि सच्चाई किसी भी रूप में उजागर हो सके। पूंजी का गुलाम पत्रकार अंततः मार्केटिंग मैन में तब्दील हो जाता है।

अब पत्रकारिता को किसी के रहमोकरम पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। हमें अपना खुद का ब्लॉग बनाकर सटीक तरीके से अपनी बात रखने का हुनर सीखना होगा। पत्रकारिता को पैशन के साथ करें। आजीविका के लिए कोई और धंधा करें। पीआर एजेंसियों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि जब टैलेंटेड आदमी भ्रष्टाचारी हो जाता है तो देश-समाज का बंटाधार तय है। सिस्टम ऐसा है कि जो भी इस सिस्टम का पार्ट बनता है, भ्रष्ट होने की राह पर चल पड़ता है। दुःख इस बात का भी है कि अब तो मीडिया में ही भ्रष्टाचार आ गया है। कलमधारी अब सत्य लिखने में सहमते हैं क्योंकि उन्हें बिजनेस भी लाना होता है। पेज थ्री परम्परा और पेड न्यूज की शुरुआत अंग्रेजी के बड़े अखबारों ने की, जिनका बाद में हिंदी के अखबारों ने अनुकरण किया। मीडिया में भी अब सब कुछ पूंजी का खेल हो गया है। और जब मीडिया में पूंजी का खेल शुरू हो जाता है तो मीडिया का एजेंडा और चरित्र बदल जाता है।

उन्‍होंने कहा कि मीडिया का काम सरकार की कमियों और जनता की मजबूरियों को उजागर करना है। मगर अब स्थितियां विलग हैं। अब मीडिया हाउस भी किसी उद्योग कंपनी की तरह मार्च के अंत में फायदे की सूचना चाहते हैं। कुछ तो ऐसे न्यूज चैनल हैं जो सप्ताह भर में पचास स्टिंग आपरेशन कराते हैं और पैंतालीस में डील कर लेते हैं, जो बाकी पांच मैनेज नहीं हो पाते, उनको दिखाकर असली पत्रकारिता करने का दम भरते हैं। भूत-प्रेत और लफ्फाजी को दिखा-सुनाकर कब तक रेटिंग बटोरते रहेंगे चैनल वाले। अन्ना के आंदोलन से यह साबित हो गया है कि मीडिया को जनता के साथ खड़ा होना होगा। अन्यथा मीडिया का मूल चरित्र नष्ट हो जाएगा।

वर्तमान में इंडिया न्यूज से जुडे अतुल अग्रवाल ने पत्रकारों की असल स्थिति बयान करते हुए कहा कि पत्रकार कोई आदर्शवादी जीव नहीं है, वह कोई मिशन नहीं बल्कि प्रोफेशन का आदमी है। सामाजिक सरोकारों की जिम्मेदारी केवल पत्रकार के माथे थोप कर उसे उसकी खुद की पारिवारिक जिम्मेदारियों से अलग नहीं देखा जाना चाहिए। पत्रकारों के लिए भी न्यूनतम मजदूरी जैसा कोई कॉन्सेप्ट जरूरी होने की बात अग्रवाल ने पुरजोर तरीके से रखी।

उन्होंने कहा कि अन्ना हजारे की आन्दोलन में मीडिया ने कोई बड़ा काम नहीं बल्कि अपना धंधा चमकाया है। सूचना का प्रजातंत्रीकरण हो गया है। न्यू मीडिया युग में आप देखेंगे कि कुछ मीडिया हाउस घरानों को तो खरीदा जा सकेगा मगर हर ब्लाग लिखने वाले को आप कैसे खरीद सकते हैं। न्यू मीडिया के लाखों कलमकारों को खरीद सकना मुमकिन नहीं होगा।

अग्रवाल ने कहा कि पत्रकार और ठेकेदार में अंतर कायम रहना जरूरी है। नौकरी और सरोकार में फर्क समझ आना जरूरी है। अतुल अग्रवाल अपने लहजे में कहते हैं कि हम पत्रकार अन्ना हजारे और गांधी नहीं है। हम भी एक सामान्य इंसान है। हमें महिमामंडित कर बड़ा नहीं बनाया जाए। पत्रकारिता मेरी नजर में एक नौकरीभर है, जैसे और नौकरियाँ होती आई है। आखिर में ये ही कहूंगा कि पत्रकारिता केवल जीवन का जुगाड़ है, दो जून की रोटी कमाने का जरिया भर है।

मध्य प्रदेश सरकार के राजकीय अतिथि बालयोगी उमेशनाथ जी महाराज ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मीडिया की सार्थक भूमिका विषय व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि देश का ये दुर्भाग्य ही है कि हमने चिंतन-मनन छोड़ दिया है। मीडिया का साथी अपनी कलम से लिखकर रात को घर चला जाता है लेकिन उसके उसके लिखे का असर अगली सुबह लाखों लोगों पर पड़ता है। लाखों की संख्या में पाठक उसके लिखे पर चिंतन-मनन-पठन करते हैं। इसलिए कलम का लिखा बहुत सधा हुआ और सोचा-समझा होना चाहिए। अब पत्रकारों को खुद ही निर्णय करना है कि उन्हें किस तरफ खड़ा होना है- कौरव, कंस और रावण की सेना में या कि फिर पांडवों की तरफ। मगर चिंता ये भी है कि आज देश में संत की वाणी और पत्रकार की कलम, सबकुछ बिकाऊ है। जो सबसे जरूरी हथियार हो सकते थे, वे बिकाऊ हो गए हैं। पर चारों तरफ ऐसी स्थिति नहीं है। आज भी ईमानदारी है ओर ईमानदार पत्रकार के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी ईमानदार इन्सान हैं। बालयोगी ने कहा कि आज भी मीडिया की विश्‍वसनीयता बनी हुई है और पत्रकारों को छोटे लाभ के चक्कर में पड़कर अपने मूल आधार को नहीं खोना चाहिए।

एक श्रोता स्थानीय शिक्षाविद डॉ. ए.एल.जैन के सवाल पर अतुल अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में जोड़ते हुए कहा कि ये बात भी सच है कि मीडियाकर्मियों की तनख्वाह बढ़ जाने से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होगा. सही मायने में ये सबकुछ नीयत का मामला है। न्यूनतम मजदूरी हो या लाखों की पगार, नीयत बिगड़ने पर सरोकार गौण हो जाते हैं। अग्रवाल ने कहा कि पिछले चौदह सालों में नौ टीवी चैनल में काम करने का तजुर्बा है, और उसके बलबूते कह सकता हूँ कि देश के कई गणमान्य लोग टीवी पर फोकट का ज्ञान परोसते नजर आते हैं। आठ दस लाख की महीनावार पगार पाते हैं। बिना किसी का नाम लिए अतुल अग्रवाल ने कहा कि इसी देश में कुछ संपादकों का गैंग हैं जिसे दंडवत किए बगैर लोगों की नौकरी नहीं चल सकती है।

जिला कलेक्टर रवि जैन ने कहा कि इन बीते सालों में पत्रकारिता बहुत प्रखर होकर निखरी है। आज पत्रकार प्रशासन से भी दो कदम आगे जाकर काम कर रहा है। लेकिन कई बार इस व्यवसाय में पावर और पैसे की भूख आदमी को ब्लैकमेलिंग के धंधे में जा बिठाती है। आपाधापी के इस युग में भी अधिकाँश पत्रकार साथी पूरी इमानदारी से अपने काम में लगे हुए हैं, वे बधाई के पात्र हैं। कलेक्टर ने कहा कि मैं अनिल सक्सेना को बधाई देता हूं कि उन्होंने चित्तौडगढ़ जिले में प्रदेश की मीडिया कार्यशला आयोजित कर मुझे इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया।

बिड़ला सीमेंट के सयुंक्त अध्यक्ष और समाजसेवी निरंजन नागौरी ने कहा कि हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि पत्रकार भी कई बार द्वंद्व की स्थिति में आ खड़ा होता है। ऐसे में उसका निर्णय बहुत मायने रखते हुए लोगों को प्रभावित करता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय या कॉफी हाउस में बौद्धिक चिंतन के दौर चलते हैं, मगर अंत ठीक हमेशा की तरह ही होता है।

बूंदी राजस्थान के जिला प्रमुख राजेश बोयत ने बताया कि ये वही चौथा स्तंभ है जिसके बूते सरकारें तक आती-जाती हुए दिखती हैं। जो मीडियाकर्मी न्यायसंगत बात को असल रूप में समाज के सामने रखने के जोखिम को उठाता है तो उसे महफूज रखने का दायित्व भी समाज का ही होना चाहिए। दैनिक और जरूरी आवश्यकताओं के पूरने के बाद ही मीडिया साथी भली प्रकार से अपना दायित्व निभा सकेगा, ये बात हमें भूलनी नहीं चाहिए।

सेवानिवृत जनसंपर्क अधिकारी और स्वतंत्र पत्रकार नटवर त्रिपाठी के अनुसार आज केवल सूचनाओं का अम्बार लगा देना ही मीडिया का काम नहीं है क्योंकि कई बार ये सूचनाएं समुदाय की जरूरतें पूरी नहीं करती। ऐसे में कई बार अनुत्तरित प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। कम्प्यूटर और विज्ञान की इस क्रान्ति के बाद से ये देखा गया है कि कहीं न कहीं हमारी अपनी भारतीयता खत्म हो गयी है। बच्चों के लिए स्कूल से ज्यादा वक्त ये टीवी खा जाता है। इन हालात में मीडिया का रोल बढ़ जाता है। शहरों में अनवरत मिल रही सुविधाओं को गाँव तक ले जाने में मीडिया की अहम् भूमिका हो सकती है। एक और जरूरी बात कि आजकल सभी तरफ हम मूल्यों में गिरावट और संक्रमण की बात करते नजर आते हैं मगर उनका असल मूल्यांकन कोई नहीं करता।

उन्‍होंने कहा कि मुझे ये भी लगता है कि बड़े अखबारों के साथ ही छोटे अखबारों में सम्पादकीय जैसा कुछ छपना चाहिए। इस पूरे मामले में प्रेस काउन्सिल को भी कड़े कानून बनाने की जरूरत है। कितनी अजीब बात है कि आजकल सभी बड़े मीडिया हाउस कार्पोरेट जगत की तर्ज पर चल रहे हैं। उनके लक्ष्य भी कुछ बदले बदले हैं। बड़ी चिंता की बात ये भी है कि अधिकाँश पत्रकार आज भी मेहनत करने के बजाय सरकारी या सामाजिक संस्थाओं के प्रेस नोट के भरोसे अपनी खबरें छापते हैं और इसी में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते प्रतीत होते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संगठन के प्रदेशाध्यक्ष ईशमधु तलवार ने श्रमजीवी पत्रकार संघ की कार्यशालाएं प्रत्येक जिले में आयोजित करने का वादा करने के साथ ही कहा कि आज सभी तरफ बाजारवाद का प्रभाव है जहां उस्ताद फहीमुद्दीन डागर और उस्ताद असद अली खाद और रुकमा देवी मांगनियार जैसे कलाकारों के नहीं रहने की खबर तक नहीं बनती. यहाँ जो बिकता है वही दिखता है।

भाजपा जिलाध्यक्ष सीपी जोशी ने अपने भाषण में कहा कि व्यवस्था से जनता का विश्वास लगभग उठ गया है। अन्‍ना हजारे के आन्दोलन में मीडिया के रोल से देश में एक ईमानदार माहौल बना है। पत्रकार जैसा प्राणी पूरे समय समाज के हित लगा रहता है। तो उसके हिस्से की चिंता भी समाज की अपनी चिंता होनी चाहिए। नगर पालिका उपाध्यक्ष और एसबीएन चैनल के निदेशक संदीप शर्मा के बयान की मानें तो विश्व की सबसे बड़ी संसद भारतीय लोकतंत्र में आज जनता का सर्वाधिक विश्वास मीडिया में है और अखबारों की बात लेते हैं, इसलिए इसकी विश्वनीयता का बने रहना बेहद जरूरी है।

स्थानीय विधायक सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत ने कहा कि आज मीडिया नेताओं और औद्योगिक घरानों तक को नहीं छोड़ता, समय आने पर उन्हें भी सच्‍चाई की राह दिखाता है। आन्दोलन हो, आपातकाल हो या कि फिर आतंकवाद जैसे हालात, पत्रकार हमेशा अपनी राह पर अडि़ग नजर आता है। उसकी सच्चाई ही उसकी असली ताकत है और उसके बगैर जनता भी उसका साथ छोड़ने में देर नहीं करती।

ये आयोजन यहाँ मेवाड़ मीडिया वेलफेयर यूनियन के साथ जोड़कर हुआ जिसे उपस्थित प्रतिभागियों ने सराहा। विमर्श में बहुतेरे वक्ताओं ने कभी सत्ता, प्रशासन को आड़े हाथों लिया तो कभी खुद मीडिया जगत में ही फैल रहे भ्रष्टाचार को निशाना बनाया। ये कार्यशाला कहीं न कहीं स्थानीय मेहनती पत्रकारों को देश दुनिया के मीडिया जगत को जानने के साथ ही कई जरूरी और अछूते मुद्दों पर सोचने को प्रेरित कर गयी।

आयोजन में पत्रकारों की रोजी-रोटी के साथ ही उनकी सुरक्षा और मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर भी मांगें पुरजोर तरीके से रखी गयी, जिन्हें मंच ने बहुत सोच के साथ-साथ अपने उद्बोधन में शामिल किया। मंच पर समाज के हर वर्ग से प्रतिनिधि मौजूद थे जिसने कार्यशाला को सम्पूर्ण आकार दे दिया। सामाजिक परिदृश्य से जुडी एक गजल और फिर माँ भारती पर केन्द्रित एक गजल के साथ ही मेवाड़ मीडिया वेलफेयर यूनियन की संभागीय सचिव और कुशल सूत्रधार शकुन्तला सरूपरिया ने कार्यशाला को आगाज दिया, जिसे वक्ताओं ने अपने अनुभव और वाणी से उत्तरोत्तर गाढ़ा किया।

वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र गुंजल, फिल्म निर्माता और समीक्षक रामकुमार सिह, डाक्टर दुष्यन्त सिंह सहित पूरे कार्यक्रम में राज्यभर के चुनिन्दा पत्रकारों के साथ जिले के कई नामचीन पत्रकार सहित दिनेश प्रजापति के साथ नीमच, मध्यप्रदेश के पत्रकार भी  शामिल हुए। वरिष्ठ पत्रकारों का अभिनन्दन-कार्यक्रम में 20 साल से भी ज्यादा अपनी सेवाएं दे रहे जिले के पत्रकारों का माल्यापर्ण और प्रतीक चिन्ह नवाज कर अभिनन्दन किया गया। इसमें दैनिक ललकार के सम्पादक शरद मेहता, दैनिक नवज्योति के संपादक गोविन्द त्रिपाठी, प्रातःकाल से नरेश ठक्कर, जय राजस्थान से हेमन्त सुहालका, स्वतंत्र पत्रकार और पूर्व जनसम्पर्क अधिकारी नटवर त्रिपाठी, एस.बी.एन. टी.वी. चैनल के कैलाश सोनी और अजीत जैन शामिल थे।

कार्यशाला में नगर के पत्रकारों के अतिरिक्त भी कई शिक्षाविद, जानकार, आकाशवाणी के उदघोषक, शैक्षणिक संस्थाओं के प्रमुख और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे। इस पूरी कार्यशाला के बीच में उपस्थित पत्रकारों और श्रोताओं ने आपसी संवाद से भी कई बातों पर चर्चा और विमर्श किया। अंत में कार्यशाला समन्वयक अनिल सक्सेना ने आभार व्यक्त किया। आयोजन का सम्पूर्ण संचालन मेवाड मीडिया वेलफेयर यूनियन की महासचिव और कार्यक्रम सह संयोजिका शंकुतला सरूपरिया के साथ ही भीलवाड़ा की संस्कृति कर्मी, कुशल उदघोषिका और नृत्यांगना प्रतिष्ठा ठाकुर ने किया।

पत्रकार के हितों के लिए श्रमजीवी पत्रकार संघ ने बनाया प्रतिवेदन : श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रत्येक जिलों के पदाधिकारियों की बैठक हुई। इसमें पत्रकारों की समस्याओं और उनके हितों के लिए दर्जनों बिन्दुओं को लेकर राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश अध्यक्ष ईशमधु तलवार की अध्यक्षता में कार्यशाला के दूसरे चरण में एक प्रतिवेदन तैयार किया गया। संघ अध्यक्ष तलवार के नेतृत्‍व में इस प्रतिवेदन को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को देकर पत्रकारों की मांगों को मानने और अमल में लाने की मांग की करने का निर्णय लिया गया।

राजस्थान सरकार के सूचना ओर जनसर्म्पक मंत्री बैरवा ने दिखाई संवेदनहीनता : राजस्थान सरकार के सूचना ओर जनसर्म्पक मंत्री अशोक बैरवा ने मीडिया के प्रति अपनी संवेदनहीनता दिखाई, जिससे कांग्रेस की राजस्थान सरकार को राज्य के पत्रकारों के समक्ष नीचा देखना पड़ा. उल्लेखनीय है कि रविवार को चित्तौडगढ़ में आयोजित प्रदेश मीडिया कार्यशाला में दिल्ली के पत्रकार यशवन्त सिंह और अतुल अग्रवाल, राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार के साथ ही राज्य के जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, कोटा, बीकानेर ओर जयपुर संभाग के दर्जनों पत्रकारों ने भाग लिया। चित्तौडगढ़ के विधायक सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत के साथ ही कांग्रेस के तेजतर्रार और राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले बेंगू विधायक राजेन्द्र सिंह बिधुडी ने भी राज्य के सूचना और जनसर्म्पक मंत्री अशोक बैरवा को चित्तौडगढ मुख्यालय पर होने वाली प्रदेश मीडिया कार्यशाला के बारे में अवगत कराते हुए कांग्रेस सरकार की हित में कार्यशाला में भाग लेने की अपील की थी परन्तु बैरवा अपनी मस्ती का रंग दिखाते हुए कार्यशाला में नहीं आए.

चित्‍तौड़ से माणिक/श्‍याम जाटव की रिपोर्ट.


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