'पेड न्यूज सिंड्रोम' पर लगेगी पाबंदी

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धन लेकर खबरें छापने पर प्रेस परिषद ने जांच बैठाई : दिल्ली में आयोजित सेमिनार में फिर उठा धन लेकर खबर छापने का मुद्दा : पब्लिक विजिलेंस आन मीडिया की जरूरत पर बल : प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने धन लेकर खबर छापने वाले अखबारों पर जांच बैठा दी है। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ज्ञानेन्द्र नारायण रे ने बताया कि इस समय एक विशेष जांच परिषद पूरे मामले की गहराई से छानबीन कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछले आम चुनावों में धन लेकर खबर छापने जैसी बेहद खतरनाक प्रवृत्ति सामने आई है। भारतीय मीडिया जगत के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है और परिषद इस गंभीर मामले पर लगातार नजर रख रही है। यह एक तरह का 'पेड न्यूज सिंड्रोम' है, जिसके खतरे से भारतीय प्रेस के सम्मान और स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी हो गया है। जस्टिस जीएन रे का कहना है कि अब पैसे की इस हवस पर कठोर अंकुश के लिए प्रेस काउंसिल ठोस कदम उठाने जा रही है, ताकि फिर कोई भ्रष्टाचार की ऐसी इबारत लिखने का साहस न करे।

उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनावों में धन लेकर विज्ञापन को खबर के रूप में छापने का मुद्दा सबसे पहले भड़ास4मीडिया ने उठाया। इस मुद्दे पर लगातार खबरें प्रकाशित कीं और कई पीड़ित प्रत्याशियों की शिकायतों का संज्ञान लिया। मीडिया में इस मुद्दे पर बहस चलाकर धन लेकर खबर छापने के मुद्दे पर कई वरिष्ठ पत्रकारों को सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया। देश के वरिष्ठ पत्रकारों प्रभाष जोशी, कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, अजीत भट्टाचार्य, प्रभात खबर के संपादक हरिवंश, आंध्र प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्ट एवं प्रेस एकेडमी तथा दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने धन लेकर खबर छापने के मुद्दा पर कड़ा विरोध जताते हुए इसकी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से शिकायत की। अब प्रेस काउंसिल ने इस पूरे मामले पर विशेष जांच बैठा दी है।


'मीडिया लोक नागरिक आंदोलन' में कूदेंगे प्रभाष जोशी

धन लेकर खबरें छापने के खिलाफ खुला मोरचा : एक बार फिर 'लोकसभा चुनावों में धन लेकर खबरें छापने' का मुद्दा जोर-शोर से उठा। मौका था दिल्ली के केरल हाऊस में डीयूजे-डीएमआरसी की ओर से आयोजित एक सेमिनार, जिसका विषय था 'चुनाव 2009 में धन-शक्ति और मीडिया'। सेमिनार में आम सहमति बनी कि देश में मीडिया लोक नागरिक अभियान (पब्लिक विजिलेंस ऑन मीडिया) की रूपरेखा तैयार हो और इसे जन आंदोलन का रूप दिया जाए। जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी ने कहा कि देश में मीडिया की निष्पक्षता बरकरार रखने के लिए यह आंदोलन बहुत जरूरी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह सब सिर्फ अरण्य-रोदन भर होगा। संघर्ष करके ऐसा लोक आंदोलन खड़ा किया गया तो वह उसमें खुलकर शिरकत करने के लिए तैयार हैं। पत्रकारिता जनता के हाथ में एक ऐसा अंकुश है, जिसके जरिये वह लोकतांत्रिक समाज के सभी खंभों की पड़ताल कर सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार निहाल सिंह ने कहा कि संसाधन जुटाने की चिंता करने की बजाय सहज उपलब्ध इंटरनेट पर ट्विटर और यूट्यूब के जरिए इस आंदोलन की जरूरत और उद्देश्य पर संवाद करते हुए जनमत बनाया जाना चाहिए। डीयूजे के अध्यक्ष एसके पांडेय ने कहा कि पिछले आम चुनाव में मीडिया के धनशक्ति के इस्तेमाल पर हमने प्रभाष जोशी के चार लेख प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सामने रखे। अब उस पर तहकीकात, उपाय और निदान के लिए भारतीय प्रेस परिषद ने विशेष समिति बना दी है। हम अब संसद के अंदर और बाहर इस मसले को उठाने जा रहे हैं। लोकतंत्र के इस चौथे खंभे की ईमानदारी तथा निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि इससे जुड़े अखबारी व गैरअखबारी कर्मचारियों को साथ लिया जाए। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट, वेतन और कार्य संबंधी स्थितियों को भी इसमें शामिल किया जाए। आज मीडिया का परिदृश्य बदल गया है। इसलिए नया मीडिया कमीशन गठित किया जाना चाहिए। पिछला मीडिया कमीशन चालीस साल पहले बना था। मीडिया जनांदोलन को समर्थन देते हुए उन्होंने कहा कि एक व्यापक साझा मंच बने और सभी संगठन उसमें शामिल हों। उन्होंने बताया कि डीयूजे व्यापक हस्ताक्षर अभियान, नुक्कड़ बैठकें और ऑन लाइन संवाद आदि शुरू करने जा रहा है। डेढ़ माह बाद इस मामले में हुई प्रगति का फिर जायजा लिया जाएगा। 

भारतीय प्रेस परिषद की ओर से आम चुनाव में मीडिया में धनशक्ति संबंधी मामलों की जांच पड़ताल, निदान व उपाय के लिए गठित विशेष समिति के एक सदस्य प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने कहा कि राजनीति और मीडिया के बीच गहराते अंतरसंबंध तब और खतरनाक हो जाते हैं, जब इससे पैसे वाली ताकतें जुड़ने लगें। सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज के प्रभाकर ने चुनावों में धनशक्ति के इस्तेमाल का एक तखमीना आकड़ों के जरिए बताया। वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने कहा कि कभी गांवो तक में माना जाता था कि अखबारों में जो छपता है वह सच होता है, लेकिन आज अजब स्थिति हो गई है। प्रेष परिशद से अलग राह बनाने पर भी सोचा जाना चाहिए क्योंकि इसके पास वैधानिक अधिकार नहीं हैं। सेमीनार में वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सांसद कुलदीप नैयर और भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य शीतला सिंह के संदेश पढ़े गए। तहलका से जुड़े अजीत साही, अंजलि देशपांडेय, सुनीत चोपड़ा आदि ने भी पूरी बहस में हिस्सा लिया।


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