अब मीडिया साक्षरता अभियान शुरू करने की जरूरत

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मीडिया पर बाजार का बढ़ता प्रभाव शुभ संकेत नहीं : समाचार माध्यमों में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के बढ़ते दबदबे के कारण समाचारों के चयन, संग्रह और प्रस्तुति पर बाजार का दबाव बढ़ा है और प्राथमिकताएं बदल गयी हैं। समाचारों के 'डबिंग डाउन' के कारण उनमें देश और आम लोगों के दुख-दर्द के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है। समाचार माध्यमों पर अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के बढ़ते दबाव के बीच समाचार और विज्ञापन के बीच की दीवार ढह चुकी है और 'समाचारों की बिक्री और पैकेजिंग' की अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। मीडिया में संकेन्द्रण और एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं। समाचार माध्यमों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मीडिया साक्षरता का अभियान शुरू किया जाना चाहिए।

यह कहना है हिंदी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक, प्रभारी (हिन्दी प्रत्रकारिता), भारतीय जनसंचार संस्थान, डा. आनंद प्रधान का। वे 4 नवम्बर को दिल्ली के शहीद भगतसिंह कॉलेज (सांध्य) के गोष्ठी सभागार में 'बाजार, मीडिया और भारतीय समाज' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे। गोष्ठी की अध्यक्षता जाने-माने हिन्दी आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व-अध्यक्ष प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी ने किया। मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. आनन्द कुमार संयोजक, वैश्विक अध्ययन केन्द्र, जे.एन.यू. का कहना था कि हमारा समाज आज बाजार और मीडिया के बीच उलझता जा रहा है। बाजार भोगवाद और मुनाफे के सिद्धांतों पर समाज को चलाना चाहता है जबकि मीडिया सरकार की आड़ से अब बाजार की बाढ़ में फँस गया है। अत: समाज के सजग लोगों को मीडिया और बाजार दोनों की सीमाओं को नये संदर्भ में समझना होगा। अन्यथा लोकतंत्र के वावजूद मीडिया हमारे समाज में विदुर की जैसी नीति सम्मत भूमिका छोड़कर मंथरा जैसी स्वार्थ प्रेरित भूमिका में उलझती जाएगी। मीडिया का बाजारवादी हो जाना भारत के लोकतंत्र को मजबूत नहीं करेगा।

कॉलेज प्राचार्य डॉ. पी.के. खुराना के अनुसार अर्थव्यवस्था में बदलाव के कारण कैसे बाजार मजबूत हुआ है और मानवीय मूल्य निरंतर टूटते जा रहे हैं। सभा का संचालन करते हुए डॉ. विन्ध्याचल मिश्र ने मीडिया पर बाजार के बढ़ते प्रभाव एवं उसके सामाजिक आयामों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए।

अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. तिवारी ने कहा बाजार, मीडिया और टैक्नालॉजी उत्तर आधुनिक चिंतन के प्रमुख स्रोत हैं। इसमें समाज, इतिहास और विज्ञान का बहिष्करण किया जा चुका है। ये पद आधुनिक चिंतन के थे और इनके सरोकार ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समाज और मनुष्य से सम्बन्धित थे यानी इस चिंतन में सामाजिक और मानवीय सरोकारों का कोई विशेष अर्थ नहीं है। दूसरी बात कि इन स्रोतों (बाजार, मीडिया, टैक्नोलॉजी) ने ज्ञान को जो सबसे महत्वपूर्ण शास्त्र बनाया, वह प्रबंधन का है। इस प्रक्रिया का विश्लेक्षण करते हुए उन्होंने बताया कि ज्ञान के सामाजिक और दार्शनिक संघटकों को आर्थिक उदारवादी भूमण्डलीकरण ने बहिष्कृत कर दिया है।

इस ज्ञान प्रक्रिया ने सबसे बड़ा पाठ (जमगज) विज्ञापन का पैदा किया है। विज्ञापन, विज्ञापित वस्तु की असलियत की जिम्मेदारी नहीं लेता। मानवीय इतिहास में पहली बार किसी पाठ (जमगज) का इतना शक्तिशाली रूप सामने आया है जो बिना जिम्मेदारी के इतना प्रभावी और इतना मुनाफा देने वाला है। इस उदारीकृत भूमण्डलीकरण के ज्ञान ने मनुष्य को भूमिका (तवसम) विहीन बनाकर केवल उपभोक्ता जीव में बदल दिया है।  इस बुद्धि और ज्ञान शास्त्र का प्रतिरोध ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें मानवीय संभावना बच सकती है।  

 


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