बात थी अभिनंदन की, दे रहे हैं हम श्रद्धांजलि : नामवर

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प्रभाष जोशीरामनाथ गोयनका और प्रभाष जोशी में पेशेवर नहीं बल्कि जिद्दी व दृढ निश्चयी पिता-पुत्र जैसा संबंध था : जोशी को याद किया लेखकों, पत्रकारों और नेताओं ने : राजधानी के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शनिवार को हुई श्रद्धांजलि सभा में बड़ी संख्या में पत्रकारों, साहित्यकारों, राजनेताओं, समाजसेवकों और बुद्धिजीवियों ने वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि दी। इन लोगों ने भरे गले व नम आंखों से जोशी को याद किया और कहा कि उनका जाना न केवल पत्रकारिता जगत के लिए बल्कि साहित्य जगत और जन आंदोलनों के लिए भी अपूरणीय क्षति है। वक्ताओं ने उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाने की बात कही। करीब तीन घंटे चली इस सभा में वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्य, सामाजवादी नेता सुरेंद्र मोहन, समाजसेवी अरुण राय, पर्यावरणविद अनुपम मिश्र, आलोचक डा नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, वरिष्ठ साम्यवादी एबी बर्धन, महासचिव दिग्विजय सिंह, गोविंदाचार्य, डीपी त्रिपाठी और श्रीमती अनन्या गोयनका सहित अनेक वक्ता बोले। सभा में प्रभाष जोशी की पत्नी उषा जोशी, उनके छोटे भाई सुभाष जोषी, दोनों बेटे, बहु व अन्य परिजन भी मौजूद थे।

वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्य ने कहा कि प्रभाज जी ने हिंदी पत्रकारिता को नया चेहरा दिया। वे बड़े दृढ़ निश्चयी और धुन के पक्के इंसान थे। उन्होंने लिखकर, बोलकर हर तरह से समाज को योगदान दिया। सुरेंद्र मोहन ने कहा कि प्रभाष जोशी नर्मदा बचाओ आंदोलन, सूचना के अधिकार आंदोलन जैसे जनांदोलनों में जी-जान लगा देते थे। खराब स्वास्थ्य होने के बावजूद 'नामवर के निमित्त' नाम से पूरे देश में हिंदी आलोचना को आगे बढ़ाया। मोतीलाल वोरा ने उन्हें व्यक्तित्व व कृतित्व का धनी बताया और कहा कि वे बड़े लिक्खाड़ थे। अनुपम मिश्र ने कार्यक्रमों में उनके देर से पहुंचने की आदत का जिक्र करते हुए कहा कि वे देर से तो आते थे पर आते ही छा जाते थे।

डा. नामवर सिंह ने उनके साथ बीते पलों को याद करते हुए कहा कि वादा तो किया था कि 75वें जन्मदिन पर हम सभी का अभिनंदन स्वीकार करेंगे पर अब श्रद्धांजलि को विवश कर दिया। विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन्हें शब्द साधक बताया और कहा कि देशज व तदभव शब्दों का जो प्रयोग उन्होंने किया वह भाषा व साहित्य के इतिहास में उनका बड़ा योगदान है। साहित्यकार व सजग पत्रकार उनसे भाषा सीखते थे।

गोविंदाचार्य ने कहा कि हिंद स्वराज के प्रचार, लोक परंपरा के संकलन, देशज शब्दों के संकलन, जेपी आंदोलन से जुड़े तथ्यों के संकलन सहित छह काम जोशी जी ने तय किए थे। अब उन कामों को हमें आगे बढ़ाना होगा। डीपी त्रिपाठी ने उन्हें हर मायने में योद्धा करार दिया। दिग्विजय सिंह ने कहा कि वे हर धर्म व विचारधारा से जुड़े रहते थे लेकिन अपनी बात अपने तरीके से कहते थे। यह उनकी खासियत थी।

समाजसेवी अरुणा राय ने सूचना के अधिकार आंदोलन में उनके योगदान को याद करते हुए बताया कि इस आंदोलन में जहां भी वे गए थे वहां की जनता आज उनको नम आंखों से याद कर रही है। अनन्या गोयनका ने उनको बरगद के पेड़ के मानिंद बताया, जिसकी छाया में आने वाले शीतलता ही मिलती है। उन्होंने बताया कि रामनाथ गोयनका और प्रभाष जी ने एक मिशन के तौर पर काम शुरू किया था। उन दोनों के बीच पेशेवर संबंध नहीं बल्की एक जिद्दी व दृढ़ निश्चयी पिता और पुत्र जैसा संबंध था।

सभा में प्रभाष जोशी के छोटे भाई सुभाष जोशी, पुत्र सोपान, पत्रकार रामबहादुर राय, पत्रकार राहुल देव और पत्रकार ओम थानवी ने भी हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुष को याद कर उनको श्रद्धा सुमन चढ़ाए। उनके साथ अपने अनुभवों को याद किया। उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाने का वचन दोहराया। वरिष्ठ गांधीवादी नेताओं सहित कई लेखक, पत्रकार, समाजसेवी व राजनेता मौजूद थे।

सभा में कुमार गंधर्व की पुत्री कलापिनी कोमकली व मालवा के लोक गायकों ने कबीर ने निर्गुण भजन गाकर पत्रकारिता की दशा व दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले शब्दशिल्पी को श्रद्धांजलि दी। निर्गुण भजन सुनकर प्रभाष जोशी की याद में मौजूद लोगों की आंखे नम होती रहीं। जोशी जी का निधन पांच नवंबर की आधी रात को हो गया था। वे 72 साल के थे। सभा का संचालन पत्रकार राहुल देव ने किया। (साभार : जनसत्ता)


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