मुंबई में अवधी सम्मेलन : जोबन गयो तो भल भयो...

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(बाएं से दाएं)- संयोजक राजेश विक्रांत, कवि-गीतकार  देवमणि पांडेय, प्रमुख अतिथि जगदीश पीयूष, अर्चना मिश्र, एडवोकेट विजय सिंह, समारोह अध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी, संपादक प्रेम शुक्ल, पं. किरण मिश्र, पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी,  वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी

अवधी का सौभाग्य कि उसको राम मिले : लोक जीवन की अदभुत झाँकी प्रस्तुत करने वाली अवधी भाषा बड़ी भाग्यशाली है। इसके सौभाग्य का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इसे गोस्वामी तुलसीदास सरीखा महाकवि मिला और गोस्वामीजी का सौभाग्य कि उन्हें श्रीराम सरीखा महानायक मिल गया। परिणामस्वरूप श्रीरामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचना हुई। ये विचार मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी ने ‘रंग भारती’ और "हम लोग" द्वारा मुम्बई (विलेपार्ले) के शुभम हाल में आयोजित "अवधी सम्मेलन" में व्यक्त किए।

अवधी अकादमी के अध्यक्ष व बोली बानी के संपादक जगदीश पीयूष ने प्रमुख वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि अवधी भाषा उ.प्र. के 24, बिहार के 2 तथा नेपाल के 8 जिलों में लगभग 12 करोड़ लोगों की भाषा है। तुलसीदास, अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, कबीर, कुतुबन, मंझन और रहीम सरीखे महाकवियों ने अवधी में काव्य रचना करके इस लोकभाषा को गौरव प्रदान किया।

नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी को जन्म देनेवाली अवधी का दीप मुंबई में पहली बार प्रज्जवलित हुआ है, हमें इसे हमेशा जलाए रखना है। दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल ने अवधी हिंदी की आत्मा है। श्रीरामचरितमानस व पदमावत के बिना हिंदी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। उन्होंने अवधी प्रेमियों को भरोसा दिलाया कि "रंगभारती" की ओर से शीघ्र ही "अवध महोत्सव" का आयोजन किया जाएगा ताकि अवधी का प्रवाह रुकने नहीं पाए।

कवि-गीतकार देवमणि पांडेय ने बताया कि सुलतानपुर के लोककवि पं.रामनरेश त्रिपाठी ने 1925 और 1930 के बीच अवध क्षेत्र का दौरा करके 15 हज़ार  से भी अधिक लोकगीतों का संग्रह किया था। इसी के आधार पर उन्होंने ‘कविता कौमुदी’ किताब लिखी। उनके इस प्रयास की सराहना महात्मा गाँधी और पं. जवाहरलाल नेहरु ने भी की थी। लोककाव्य के लालित्य पर चर्चा करते हुए पांडेयजी ने कहा कि एक तरफ इसमें उमंग और उल्लास की मधुर छवियाँ हैं तो दूसरी तरफ़ दुख और अभाव के त्रासद चित्र भी हैं –

मन तोरा अदहन, तन तोरा चाउर, नैना मूँग कै दालि ।

अपने बलम का जेंवना जेंवतिउ, बिनु लकड़ी बिनु आगि ।।

 

मँहगी के मारे बिरहा बिसरिगा, भूलि गइ कजरी कबीर ।

देखि क गोरी क मोहिनी सुरति अब, उठै न करेजवा मँ पीर ।।

देवमणि पांडेय ने लोककाव्य के विविध रूपों – सोहर, कजरी, बिरहा, होरी, मेला गीत, विदाई गीत आदि पर भी रोचक चर्चा की। उन्होंने कहा कि अवध में बड़े किसान अहीर के लड़कों को चरवाहे का काम देते थे। ये नौजवान चरवाहे  अँगोछे में बासी रोटी बाँधकर सुबह गाय-भैसों के साथ जंगल में चले जाते थे और शाम ढलने पर वापस लौटते थे। अपना समय काटने के लिए मौज-मस्ती में या प्रिय जनों के विरह (याद) में ये लोग जो गीत गाते थे उसे बिरहा कहा गया। शादी-व्याह के अवसर पर अहीरों के नाच में बड़े मज़ेदार बिरहे सुनने को मिलते थे –

बड़ निक लागै गाइ चरवहिया भुइयाँ जो परती होय ।

बड़ निक लागै मेहरी क कोरवा जबले लरिकवा न होय ।।

दोहे में भी लोकजीवन की अदभुत छटा दिखाई देती है। सुंदर स्त्री से हर कोई बात करना चाहता है। मगर उसकी व्यथा देखिए –

जोबन गयो तो भल भयो, तन से गई बलाय ।

जने जने का रूठना, मोसे सहा न जाय ।।

इस अवसर पर आयोजित लोककाव्य संध्या में गीतकार हरिश्चंद्र, बृजनाथ, आनंद त्रिपाठी, पं. किरण मिश्र, देवमणि पांडेय, डॉ.बोधिसत्व, ह्रदयेश मयंक, रामप्यारे रघुवंशी, सुरेश मिश्र, ओमप्रकाश तिवारी, अभय मिश्र, रासबिहारी पांडेय, मनोज मुंतशिर, आदि ने लोकभाषा की बहुरंगी रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। समारोह में मुम्बई की धरती पर सर्वप्रथम रामलीला का आयोजन करने वाले स्व.शोभनाथ मिश्र के सुपुत्र तथा "श्री महाराष्ट्र रामलीला मंडल" के महामंत्री द्वारिकानाथ मिश्रा का सम्मान किया गया। लोकगायक दिवाकर द्विवेदी व बाल कलाकार आदित्यांश ने भी सम्मेलन में भागीदारी की। अतिथियों का स्वागत "हम लोग" संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट विजय सिंह ने किया। आभार प्रदर्शन अवधी सम्मेलन मुंबई के संयोजक राजेश विक्रांत ने माना।

मुंबई से राजेश विक्रांत की रिपोर्ट

 


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