अखबार अपने कंटेंट पर बहस नहीं चाहते

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पिछले दिनों महेश्वर में राष्ट्रीय मीडिया संवाद का आयोजन किया गया जिसमें 80 से ज्यादा पत्रकार शामिल हुए. इस संवाद में जो आधार वक्तव्य पेश किया गया, वह इस प्रकार है : भूमंडलीकरण की बीस सालों की प्रक्रिया के बाद अब विकास के तय मानकों के बीच से गरीबी, लाचारी, बेबसी का चेहरा साफ नजर आता है। तमाम जाले साफ हुए हैं। विकास की पक्षधरता सबके हित में समान रूप से नहीं है। आंकड़ों के खेल कुछ और तस्वीरें बयां करते हैं, पर सच्चाई कुछ और है।

जीवन संघर्ष मुश्किल होता जा रहा है। जनकल्याणकारी शासन की अवधारणाएं लगातार कदम पीछे खींच रही हैं। निजीकरण की प्रक्रियाओं के बीच सार्वजनिक ढांचों को जानबूझकर कमजोर करने की प्रक्रियाएं जारी हैं। कर्ज बेजा हैं पर सब जानते हुए समझते हुए भी चुप रहने और सहते जाने के दबाव हैं। पर क्या मीडिया भी इस पूरी तस्वीर को साफ तौर पर समझ पा रहा है। समझ रहा है तो क्या उस पर पर्याप्त सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल हैं भी तो कितने। उनकी दमदारी कितनी है। क्या वे लगातार हैं, बार-बार हैं। वे केवल चंद व्यक्ति की तरफ से हैं या सांस्थानिक। सवालों पर भी कितने और किस तरह के दबाव हैं। और अदद तो यह कि क्या इस पूरे परिप्रेक्ष्य में उन सवालों, सामाजिक सरोकारों के लिए खुद मीडिया की मान्यताएं और मूल्य क्या हैं। क्या वह केवल अपना जनोन्मुखी चेहरा खुद को बाजार में स्थापित होने लायक ही रखे रहना चाहता है या इससे आगे की भावनाएं भी निहित हैं।

गौर करें तो तस्वीर निराश करने वाली अधिक लगती है। एक सामान्य अध्ययन में ही समझ में आता है कि मानव विकास और जनसरोकारों के मुद्दों के लिए मीडिया संस्थानों की तरफ से पहल अत्यंत कम हैं। अब जन से सरोकार नहीं बाजार से सरोकार है। जन से केवल उतना ही सरकार है जो बाजार में टिके रहने के लिए बेहद जरूरी लगता है। बाजार और लाभ के धंधे के बीच लोगों के असल मुद्दे तो सिरे से गायब ही हैं। योजना आयोग द्वारा देश के सौ सर्वाधिक जिलों में मीडिया कंटेंट को लेकर किया गया एक अध्ययन बताता है कि कुल खबरों का केवल पांच फीसदी हिस्सा गरीब और विकास से संबंधित खबरों के लिए था। जब देश के सबसे गरीब जिलों में यह स्थिति है, जहां कि मीडिया की भूमिका और भी प्रभावी होने की जरूरत है, चिंतनीय है।

मीडिया भी बाजार का हिस्सा

इस बात से बिलकुल इंकार नहीं किया जा सकता कि मीडिया बाजार का हिंस्सा है। इसका संचालन निजी हाथों में है। बड़ा पूंजी निवेश है। पूंजी की प्रवृत्ति बेहतर उत्पाद प्रस्तुत कर लाभ कमाना है। यह लोकतंत्र के तीन अन्य स्तंभ की तरह नियमों, कायदों प्रावधानों के तहत बंधनकारी भी नहीं है। संविधान इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। पर क्या यह अन्य उत्पादों की तरह ही अंतिम उपभोक्ता तक की संतुष्टि के लिए जिम्मेदार है। क्या यह सारी सूचनाएं समाज तक पहुंचा रहा है या फिर उनसे वंचित भी किया जा रहा है। और फिर जब हम मीडिया को निजी हाथों में होते हुए भी एक लोकसंस्थान का दर्जा देते हैं, क्योंकि इसकी गतिविधियों का समाज और संस्कृति पर व्यापक असर होता है तब क्या इसे सामाजिक जवाबदेही की दायरे में लाया जाना चाहिए। इस जवाबदेही का स्वरूप क्या हो, इस पर भी विमर्श जरूरी है।

आजादी से पहले की पत्रकारिता का मकसद सभी भली-भांति जानते हैं। आजादी की लड़ाई में एक सशक्त माध्यम की भांति इसका उपयोग बेहद जरूरी दिखाई देता था। तभी पत्रकारिता एक मिशन भी थी और जरूरत भी। गांधी, से लेकर तमाम गरम और नरम दलों का एक बेहतर हथियार थी पत्रकारिता। संकट एक जैसा था,सरोकार एक जैसे थे और मकसद भी एक ही था ? आजादी। सभी के एक जैसे सुर निकलना लाजिमी था। पत्रकारिता का मिशन तय था। औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाने की इस प्रक्रिया में पत्रकारिता के योगदान को कोई नहीं नकारता। उसी जमाने से पत्रकारिता अन्य पेशे की अपेक्षा बहुत अलग स्थान पर खड़ी थी। समाज में अहमियत और सम्मान प्राप्त था।

उदारीकरण, भूमंडलीकरण और इस बहाने निजीकरण की प्रक्रियायों को आज से बीस बरस पहले जब हिंदुस्तान में गति दी गई तब इसके प्रभाव की शुरूआत मीडिया पर भी समान रूप से दिखाई देने लगी। क्या अखबार भी एक साबुन या अन्य ऐसे ही प्रोडक्ट है यह सवाल बार-बार सुनाई देने पड़ने लगा और इस बात पर तमाम तरह की बहस चारों ओर से चल पड़ी। यह वह दौर था जबकि अखबार साज-सज्जा ओर प्रिंटिंग के नजरिए से तो उन्नत हो रहे थे लेकिन उनमें सरोकार और मानव विकास के विषय लगातार घटते जा रहे थे। यह वह दौर था जबकि समाचार पत्रों में वैचारिक बहस, मंथन के लिए जगह कम होने की शुरूआत हो चुकी थी। यह वह दौर था जब अखबार बाजार से लगातार प्रभावित हो रहे थे और विज्ञापनों का स्थान भी लगातार बढ़ता जा रहा था। इस पूरे परिप्रेक्ष्य के बीच विकास के मुद्दों के लिए विशेष प्रयासों की जरूरत लग रही थी और यहीं से विकास पत्रकारिता की शुरूआत एक नए सिरे और जरूरत के हिसाब से मानी जाती है।

जनसरोकारों की बातें करने और समाज को दिमाग देने की भूमिका निभाने वाला मीडिया खुद अपनी भूमिका पर सबसे कम सवाल खड़े करता है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खबरों के चयन और प्रस्तुतिकरण को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठाए जाते हैं। टीआरपी की लड़ाई या रीडरशिप को लेकर चटपटी खबरों को लेकर मीडिया का आग्रह किसी से छिपा नहीं हैं। भूत-प्रेत, बिग बी, और इसी तरह की खबरें प्राइम टाइम के न्यूज आइटम होते हैं, पर विदर्भ में सैकड़ों किसानों की आत्महत्या या भूख और कुपोषण से मौत इसकी सुर्खियां क्यों नहीं होते। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है जिस तेजी से संसाधनों और सुविधाओं ने तरक्की की उसी गति से जनोन्मुखी खबरों का स्थान मीडिया में कम होता गया।

पेड न्यूज और सरोकार

पिछला साल चुनावों के दौर में पत्रकारिता पर एक अलग किस्म के संक्रमण की चुनौतियों से रूबरू कराने वाला था। चुनावों के दौरान अनेक अखबारों ने अपने यहां खबरों के प्रकाशन के लिए पैकेज तय किए। यह थे तो विज्ञापन लेकिन खबर की शक्ल में। अंतर करना मुश्किल था, खबर है या विज्ञापन। न्यूज चैनलों ने प्रायोजित खबरों के लिए टाइम स्लॉट तय किए। जर्नलिस्ट को मार्केटिंग विभाग के लोगों की तरह ही टार्गेट दे दिए गए। यह पहला मौका था जब घोषित रूप से ऐसे साथी जो खबरों के संकलन का काम करते थे वे पैकेज के संकलन के लिए भिड़ा दिए गए। यह खबरों का काम करने वाले लोगों के लिए संस्थान के व्यावसायिक हितों में शामिल होने का पहला मौका था। एक पत्रकार मित्र के ही शब्दों में कहें तो मालिक यह समझता है कि पत्रकार फील्ड में रहते हुए बहुत कमाई करते हैं इसलिए उसने व्यावसायिक हितों में भी दबावपूर्ण तरीके से साझीदार बनाया। टारगेट पूरे करना नौकरी करने की पहली और अंतिम शर्त बनी। जाहिर है टारगेट पूरी करने की प्रक्रिया में दमदार लोगों के सामने झुकने को मजबूर कर दिया। केवल उस छोटे से वक्त के लिए नहीं बल्कि उससे आगे के समय के लिए भी। जिसने इस धारा में खुद को नहीं ढाल पाए उन्होंने अपने-अपने विकल्पों की तरफ रूख कर लिा। पर ऐसे विकल्प गिने-चुने ही थे। आर्थिक संसाधन जुटाने की दृष्टि से पत्रकारिता विज्ञापन से आगे भी बढ़ चुकी थी। ब्यूरो कार्यालय से लेकर मुख्यालयों तक में यह प्रवृत्ति पिछले साल अलग-अलग रूपों में सभी ने करीब से देखी।

विकास के मुद्दे पर बात करते हुए पेड न्यूज और पत्रकारिता के दूसरे सरोकारों पर बात करना थोड़ा अजीब लग सकता है, पर दरअसल यह अपरोक्ष रूप से कहीं न कहीं विकास और जनसरोकार के मुद्दों को प्रभावित करने वाला है। मीडिया से चुनाव के दौरान निष्पक्ष विश्लेषण की अपेक्षा की जाती है। पेड न्यूज के दौर में यह कहां तक संभव होगा, कहा नहीं जा सकता। यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से भी ठीक नहीं हैं। पेड न्यूज के दबाव में वॉच डॉग को चेताने की अनुमति नहीं है।

निष्पंद और बेजान खबरों से अखबार के पन्ने भरे पड़े हैं। लोगों तक वह खबरें ही पहुंच पा रहे हैं जिसे कई तरह के लोग अपने-अपने मकसद और सरोकार से मीडिया तक लाना चाह रहे हैं। इसमें खुद मीडिया की भूमिका बेहद सतही, सपाट नजर आती है। इसे समझने के लिए सतह से नीचे उतरकर उनके निर्माण की प्रक्रिया में जाना होगा। यहीं से समझ में आता है कि खबरें पैदा करने वाले लोग कौन हैं। अफसरों के घरों से करोड़ों की काली कमाई निकलने के बाद तो मीडिया इसे हाथों-हाथ लेकर तमाम एंगल्स से खबरें परोसता है, लेकिन क्या इससे पहले के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए जाते हैं। तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं का क्या हश्र है, आदिवासी और दूरस्थ इलाकों की क्या स्थिति है इस बात कितने सवाल मीडिया में हैं। यह शून्यता कभी-कभार ब्रेक हो जाती है। पर वर्तमान सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में यह बार-बार टूटना बेहद जरूरी है।

जन सहभागिता और मीडिया

मीडिया में लोगों की भागीदारी के मौके हों, एक बेहतर मीडिया के लिए यह जरूरी माना जाता है। खबरों, विचारों पर लोगों की प्रतिक्रियाएं उसे और बेहतर बनाने में मदद करती है। पत्र संपादक के नाम इसका एक बेहतर जरिया हुआ करता था। पिछले कुछ सालों में लगभग पूरे मीडिया से इस कॉलम के लिए इसके लिए स्थान बेहद कम हुआ है। इससे मीडिया में लोगों की भागीदारी में भी कमी आई है। केवल कुछ अखबार ही इन पत्रों को तरजीह देकर प्रकाशित कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ लोगों की तरफ से भी इस तरह का लेखन कम हुआ है। पर इसमें यह भी देखा जाना चाहिए कि इस तरह के कॉलम्स को अखबार खुद कितना प्रोत्साहित कर रहे हैं। ठीक यही बात आलेख पर भी लागू की जा सकती है। कई मीडिया हाउस ने तो इसके लिए पैनल ही तय कर दिए हैं। इससे सभी लोगों के और सब तरह के विचारों के लिए स्थान कम हुआ है। इस बीच अच्छी कोशिश यह दिखाई देती है कि कई अखबारों ने अपनी ओर से जन भागीदारी बढ़ाने के लिए डिबेट आयोजित की हैं। पर उनमें भी सवाल डिबेट के चयन का है। यह डिबेट भी एक लक्षित वर्ग तक ही सीमित है। डिबेट में कौन शामिल होगा यह अखबार के मार्केटिंग टीम मेम्बर्स तय करते हैं। अखबार के कंटेंट पर बहस गायब है। अखबार में क्या होना चाहिए, इस पर बहस गायब है।

असल में अखबार अब अपने कंटेंट को लेकर बहस चाहते ही नहीं हैं। ख़बरों को लेकर, विचारों को लेकर, उनकी पक्षधरता को लेकर अखबार के अंदर भी बहस हो इस बात की गुंजाईश बेहद कम है। इसलिए पिछले कुछ सालों में मीडिया हाउसेस के अंदर के माहौल में बैचेनी बेहद बढ़ गई है। वहां ऐसे मौके जानबूझकर नहीं दिए जा रहे जिनसे अखबार में काम करने वाले लोगों को बौद्धिक विमर्श चिंतन-मनन के मौके मिलें। किसी जमाने में अखबार के कार्यालयों में व्यवस्थित लाइब्रेरी हुआ करती थीं, अब नहीं हैं। जो हैं उन्हें ढर्रे पर चलाया जा रहा है। नए कार्यालयों में तो इन्हें विकसित ही नहीं किया जा रहा। अखबार के अंदर वैचारिक लेखन के अवसर वैसे ही बहुत कम हैं, और नौकरी करते हुए अखबार के बाहर लेखन पर तो बिलकुल ही पाबंदी है। इंटरनेट नहीं है, है भी तो उस पर जासूस नजर। इन सभी के क्या मायने हैं। क्या मीडिया मालिक यह चाहते हैं कि लोग उसकी भूमिका पर सवाल खड़े करने लग जाएं। अब जबकि पूंजीवादी घरानों मीडिया को एक इंडस्ट्री मानकर इस ओर आ रहे हैं तब यह खतरा और भी बढ़ा लगने लगा है।

-राकेश मालवीय, विकास संवाद समूह


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