सवर्ण पत्रकारों ने पेश की घटिया तस्वीर!

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मीडिया में बिहार की छवि : सेमिनार रपट : हिंसा और अशांति आज मनोरंजन का जरिया हैं- मुकेश कुमार : बिहार में मीडिया आंख मूंद कर नीतीश के साथ खड़ी हुई- अरुण रंजन : बिहार की बदहाली माडिया के लिए सेलेबल आइटम- परवीन अमानुल्ला :  बिहार की तस्वीर बदली लेकिन अराजकता खत्म नहीं हुई- अजीत अंजुम : ये समय संतुष्ट होने का नहीं डिमांड करने का है- रवीश कुमार : जिसको भ्रम हुआ, जनता ने भ्रम तोड़ा- अली अनवर : बिहार की मीडिया को बंद खांचे से निकलना होगा- नीलाभ मिश्र :

बिहार की कोई एक मुकम्मल छवि नहीं बन सकती और न ही बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। बिहार में छवि की एक राजनीति चल रही है। असली और नकली छवियाँ आपस में टकरा रही हैं। कुछ प्रायोजित छवियाँ भी गढ़ने की कोशिश की जा रही हैं, जिसमें मीडिया भी हाथ बँटा रहा है। मगर बिहार को को किसी एक छवि का बंधक नहीं बनना चाहिए और न ही बनावटी छवियों के झाँसे में आना चाहिए। मीडिया की भूमिका छवि निर्माण की नहीं है, बल्कि उसे बिना किसी दबाव या प्रलोभन के ख़बरों को दिखाना चाहिए।

ये विचार बिहार की राजधानी पटना में रविरवार के आयोजित एक सेमिनार में रखे गए। सेमिनार का आयोजन बिहार-झारखंड के न्यूज चैनल मौर्य टीवी ने किया। सेमिनार का विषय था- मीडिया में बिहार की छवि। इस सेमिनार में जाने माने पत्रकार अरुण रंजन, नीलाभ मिश्र, रवीश कुमार, अजीत अंजुम, सांसद दिग्विजय सिंह, अली अनवर और सामाजिक कार्यकर्ता परवीन अमानुल्ला वक्ता के रूप में शामिल हुए।

मौर्य टीवी के निदेशक मुकेश कुमार ने विषय का प्रवर्तन करते हुए कई सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि क्या बिहार की कोई ऐसी मुकम्मल छवि बन सकती है जो सबको संतुष्ट कर सके। ऐसा संभव ही नहीं है..... क्योंकि नीतीश कुमार की नज़र में बिहार की असली छवि वह होगी जिसमें उसे 11 परसेंट के हिसाब से विकास करता दिखाया जाए और लालू यादव चाहेंगे कि मीडिया में बिहार की छवि में नीतीश कुमार और उनके शासन की विसंगतियाँ दिखनी चाहिए। लोग भी इन या दूसरे आधारों पर बँटे हैं। सबको रास आने वाली छवि बन ही नहीं सकती।

मुकेश कुमार ने दूसरा सवाल ये किया कि क्या ये छवि पिछले ढाई-तीन दशकों की देन है--- इसी दौरान बिहार में भ्रष्टाचार, राजनीतिक उथल-पुथल और हिंसक वारदातों में ज़्यादा बढ़ोतरी हुई या यों कहें कि मीडिया में ये चीज़ें प्रमुखता से दिखाई देने लगीं। इसी दौरान सत्ता सवर्णों के हाथों से खिसककर पिछड़ों के हाथों में गई और ज़ाहिर है कि मीडिया में बैठे सवर्णों को ये रास नहीं आया और उन्होंने घटनाओं को अतिरंजित करके पेश किया, जिससे बिहार की छवि ज़्यादा बिगड़ी. यहाँ क्या इस बात पर भी गौर नहीं किया जाना चाहिए कि पतन का ये सिलसिला केवल बिहार में ही नहीं दिखा, बल्कि ये राष्ट्रीय फिनामिना थी.....हर जगह यही हो रहा था। उन्होंने कहा कि छवि का सवाल बाजार से भी जुड़ा है। बाजार अपने खरीदारों के हिसाब से इमेज गढ़ता है। तभी तो हिंसा और अशांति आज मनोरंजन का जरिया हैं। अब तो हिंसा की खबरों का एक बाजार बन गया है। अब खतरा इस बात का बढ़ गया है कि मीडिया मैनेजमेंट के चलते कहीं छवि एकांगी न बन जाए।

नवभारत टाइम्स, पटना के पूर्व सम्पादक अरुण रंजन ने कहा कि मीडिया में बिहार की दो छवियां हैं- एक प्रगट है को दूसरी अप्रगट। इन दोनों के बीच अंदर ही अंदर टकराहट चलती रहती है। जेपी आंदोलन के समय और आपातकाल के बाद बिहार में एक नयी पत्रकारिता का उदय हुआ, जिसने भूमि संघर्ष, बूथ कैप्चरिंग, अवैध हथियार के बारे में खुल कर लिखा। सामाजिक मान्यता प्राप्त अपराधियो के खिलाफ भी लिखा गया। इससे बिहार की खून खराबे वाली तस्वीर तो बनी, बदनामी भी हुई लेकिन उससे बड़ी एक और छवि बनी वह थी प्रतिरोध करने के जुझारूपन की। इसी जुझारूपन से राज्य और देश में बड़े बदलाव का रास्ता तैयार हुआ। नेगेटिव इमेज के डर से बड़े मकसद को छोड़ा नहीं जा सकता है। पोजिटिव और नेगेटिव छवियां साथ- साथ चलतीं हैं। पिछले कुछ समय से बिहार में मीडिया एकतरफा हो गया है-  पहले एकसुर से लालू के विरोध में थी और अब आंख मूंद कर नीतीश के साथ खड़ी हो गई है। मतलब मीडिया आभासी छवियों को गढ़ने में लग गया है। उन्होंने कहा कि यहां छवियों का अंडरवर्ल्ड भी बन गया है। एक प्रचारित सच है और एक जमीनी सच है। इन स्थितियों की टक्कर से ही असली चेहरा सामने आएगा। और तो और छवियां आत्महंता भी होती हैं- एक छवि दूसरे की बेखटक जान ले लेती है। एक समय सवर्ण की छवि बनी, फिर माई समीकरण आया और अब सुशासन सामने है। एक सच ये भी है कि यहां छवियां बिकती भी हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता परवीन अमानुल्ला ने कहा कि पहले बिहार अगुआ था फिर धीरे-धीरे पिछड़ने लगा। आजादी के बाद पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह बिहार में बरौनी, सिंदरी, डीवीसी के रूप में कल कारखाने दिये लेकिन इसके बाद उनकी टक्कर का कोई सीएम ही नहीं हुआ। फिर लाठी- लठैत की राजनीति होने लगी और बिहार पीछे जाने लगा।  बिजली, सड़क, शिक्षा और रोजगार जैसे विषय नेताओं के एजेंडा से गायब हो गये। बिहार की बदहाली माडिया के लिए सेलेबल आइटम हो गई। यहां तक कि खबरें खरीदी और बेची जाने लगीं। विज्ञापन के आगे मीडिया ने घुटने टेक दिये। अब जैसे पीएमसीएच में कैंसर की दवाइयों की खरीद में धांधली हुई लेकिन मीडिया को इस खबर में कोई दिलचस्पी ही नहीं हुई। लोगों की बेहतरी के लिए जो रोल मीडिया को निभाना चाहिए था, वह निभा नहीं रही। उसे टीआरपी के मोहजाल से निकल कर जनता के साथ जुड़ना होगा।

न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम ने कहा कि बिहार की छवि बनाना मीडिया का काम नहीं है, उसकी जवाबदेही है कि जो घट रहा है उसे दिखाये। ऐसे में अच्छा, बुरा जो सामने है उसे दिखाना होगा। बेशक बिहार में तस्वीर बदली है लेकिन मूल में जो अराजकता है वह खतम नहीं हुई है। मीडिया के बॉस बिहार से हमेशा हिंसा और खून- खराबे वाली खबरें और तस्वीरें डिमांड करते हैं। कई बार आगे निकलने की होड़ में प्लांटेड न्यूज और फोटोग्राफ दिखाये जाते हैं। यहां मीडिया गलत है। जो है नहीं उसे दिखाना तो ठगना हुआ। इससे बचना होगा।

एनडीटीवी के सम्पादक रवीश कुमार ने कहा कि जिस छवि को नकारात्मक कहा जा रहा है दरअसल वह सकारात्मक है, क्योंकि सब कोई सच से रू-ब रू हो जाता है। जिनको सच्ची छवि अच्छी नहीं लगती उनको तकलीफ होती है- इसमें शासक वर्ग, मध्यम वर्ग और माइग्रेटेड एक्जक्यूटिव शामिल हैं। दूसरों के सामने बेहतर दिखें इसलिए ये यही चाहते हैं कि उनके स्टेट का साइन बोर्ड चमका दिया जाए। मौजूदा समय में बिहार की एक छवि प्रचारित की जा रही है और एक छवि छिपायी जा रही है। बिहार सरकार के वेबसाइट पर बताया गया है कि राज्य़ में पीएम कोटे के तहत केवल 300 किलोमीटर रोड बना है जब कि राज्य सरकार के कोटे के तहत करीब 1700 किलोमीटर सड़कें बनीं हैं। मतलब एक दिन में अगर दो किलोमीटर ही सड़क बनी है तो फिर हम क्यों राज्य सरकार की वाहवाही करें, माइनस से जीरो पर आये को क्या खुशी की बात है। ये संतुष्ट होने का समय नहीं है, बल्कि डिमांड करने का है, क्यो कि हमें कुछ मिला नहीं है, बस सिर्फ सपना दिखाया गया है।

जेडीयू सांसद अली अनवर ने कहा कि बिहार लोकतंत्र की प्रयोगशाला रहा है। यहां बड़े-बड़े बदलाव हुए हैं। जब-जब लोगों को भ्रम हुआ कि बिहार उनकी बदौलत है, जनता ने उनका भ्रम तोड़ दिया। अब बिहार में बहुत कुछ बदला है। पहले बिहारी कहने पर दूसरे राज्य के लोग लोग मुंह बिचकाते थे लेकिन अब गौर करते हैं। मीडिया की बनायी छवि अंतिम नहीं होती, जनता के मन में जो छवि है वही असल है।

सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि मीडिया पर बिहार की छवि खराब करने का आरोप ठीक नहीं है। मीडिया इसके लिए जिम्मेबार भी नहीं है। मीडिया बस निष्पक्ष रहे यही अच्छी बात है। छवि अच्छे काम से बनती है, उसे कोई रोक नहीं सकता। बिहार सरकार का ही आंकड़ा है कि यहां करीब डेढ़ करोड़ परिवार गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। औसत परिवार में पांच लोगों की गिनती मानी गई है। इस हिसाब से गरीब लोगों की संख्या साढ़े सात करोड़ हो गई। अब आठ करोड़ की आबादी में अगर साढ़े सात करोड़ लोग गरीब हैं तो उस राज्य को कैसे आगे बढ़ता माना जाय। कैसे ऐसे राज्य को बेहतर छवि वाला माना जाय।

आउटलुक के सम्पादक नीलाभ मिश्र ने कहा कि छवि एक तरह से सेंसरशिप है। छवि के खांचे में कैद रहने से कई चीजें छूट जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के दखल से पता चला कि बिहार में मिड डे मील का उठाव करीब 38 परसेंट है। मतलब 62 परसेंट चावल- दाल उठता ही नहीं है कि उसे बच्चों में बांटा जाए। यहां पिछले चार साल से खेती का विकास दर माइनस में है लेकिन इस पर कोई स्टोरी नहीं बनती। हरियाणा में कम लड़कियां होने के चलते शादी के लिए बिहार से लड़कियां खरीदी जाती हैं। इस पर भी बिहार में स्टोरी नहीं बनायी जाती। बिहार की मीडिया को बंद खांचे से निकलना होगा।

मौर्य टीवी के समाचार निदेशक गुंजन सिन्हा ने आये अतिथियों और वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया। मौर्य टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ ने मंच संचालन किया।


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