सब बिकता है तो खबरें क्यों न बेचें : वैदिक

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कारपोरेट हाउस जैसा चाहते हैं, पैसा देकर अखबार में वैसा छपवाते हैं- जस्टिस जीएन रे : अकेला अखबार अपने को पवित्र नहीं कर सकता क्योंकि समाज में बुराई के प्रति सहनशीलता विकसित हो गई है- अभय छजलानी : पेड न्यूज सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, हर दिन पैसा ले-देकर खबरें छप रही हैं- श्रवण गर्ग :  

यह बात सही है कि मीडिया में पेड न्यूज जैसे मामलों का चलन बढ़ा है और इसे रोकने के लिए मीडिया को आत्मावलोकन करना होगा। पेज न्यूज के दौर में नईदुनिया जैसे कुछ अखबार मौजूद हैं जिन्होंने आज भी अपने मानदंड कायम रखे हैं। यह बात भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जीएन रे ने इंदौर में कही। इंदौर प्रेस क्लब में 'पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां' विषय पर आयोजित परिसंवाद में रे ने कहा कि बाजारीकरण के दौर ने पेड पत्रकारिता को बढ़ावा दिया है। उन्होंने नईदुनिया का उदाहरण देते हुए कहा कि आज तक नईदुनिया पर किसी ने उंगली नहीं उठाई। उन्होंने कहा, आज कारपोरेट हाउस जैसा चाहते हैं, अखबार में पैसा देकर वैसा छपवा लेते हैं। इससे पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट आई है।

नईदुनिया संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष अभय छजलानी ने कहा कि पत्रकारिता को विकृत करने के लिए समाज भी काफी हद तक जिम्मेदार है। पेड न्यूज जैसे मामलों को रोकने के लिए पत्रकार की शुद्धता, अखबार की शुद्धता और समाज की शुद्धता का त्रिकोण बनाना जरूरी है। अकेला अखबार अपने को पवित्र नहीं कर सकता क्योंकि समाज में बुराई के प्रति सहनशीलता विकसित हो गई है। उन्होंने कहा, समाज जिससे पीड़ित नहीं होता, वैसी शुद्धता के साथ अखबार निकालना आज अव्यावहारिक है।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कहा कि आज जब सब चीज बिक रही है तो खबरें क्यों न बेची जाए। पेड न्यूज को विज्ञापन की तरह छापने में कोई बुराई नहीं, लेकिन विज्ञापन को खबर की तरह छापने में बुराई है।

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कहा कि हम पेज न्यूज जैसे संवेदनशील मुद्दे को बादाम-पिस्ता की तरह चबाना चाहते हैं जबकि यह मामला गंभीर है। पेज न्यूज सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, हर दिन पैसा ले-देकर खबरें छप रही हैं। खासकर राजनीतिक खबरों में यही हो रहा है। गर्ग ने कहा कि पेड न्यूज की रोकथाम के लिए कानून बनाना चाहिए। अपराधी को सजा दी जाए।


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