कश्मीर में पत्रकार निर्गुट नहीं रह सकता

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'आज रिपोर्टिंग में विभिन्न रूप दिखते हैं। सही, निष्पक्ष और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग हो इसके लिए जरूरी है कि पत्रकार आपसी एका बनाए रखते हुए अपनी आचार संहिता बनाए।' दिल्ली यूनियन आफ जर्नलिस्ट (डीयूजे) के अध्यक्ष शैलेंद्र कुमार पांडे ने कहा कि 'यह इसलिए जरूरी है क्योंकि सरकार समानांतर ऐसी व्यवस्था बनाने में जुटी है जिससे पत्रकार सिर्फ सरकारी सूचना ही खबर में दें। सरकार खुद भी पत्रकारों के लिए आचार संहिता बना रही है ऐसी स्थिति में लोकतंत्र में पत्रकारिता के भविष्य और खुद की सुरक्षा के लिहाज से पत्रकार अपनी आचार संहिता बनाएं।'

पांडे शनिवार को 'तनावपूर्ण स्थितियों में मीडिया के अधिकारों की रक्षा' विषय पर कांस्टीट्यूशनल क्लब में हुई वर्कशाप में बोल रहे थे। डीयूजे, डीएमआरसी और इंटरनेशनल फेडरेशन आफ जर्नलिस्ट की ओर से आयोजित इस वर्कशाप में कश्मीर, उत्तर पूर्वी राज्य, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में 'तनावपूर्ण हालातों में रिपोर्टिंग के खतरों' पर वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी बात रखी। इस वर्कशाम में कश्मीर में मीडिया की स्थिति पर इफ्तिखार गिलानी ने अपना पेपर भेजा। वहीं एक अन्य पत्रकार मकबूल साहिल ने आपबीती सुनाई। बरेली में चौबीस दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा उस पर दो पेपर पढ़े गए। इसके अलावा एक पेपर 'टकराव पत्रकारिता व खतरे' विषय पर भी पढ़ा गया।

इंटरनेशनल फेडरेशन आफ जर्नलिस्ट के दक्षिण पूर्व एशिया के कोआर्डिनेटर सुकुमार मुरलीधरन ने कहा कि देश में उत्तर पूर्वी राज्यों, कश्मीर, मुंबई, दिल्ली, बंगलूर और हैदराबाद में मीडियाकर्मियों पर तरह-तरह के खतरे बढ़े हैं। दूसरी तरफ अखबारों पर भी दबाव बढ़े हैं। उप्र में एक पत्रकार को एक घपला उजागर करने पर जान की बाजी लगा देनी पड़ी। पत्रकारों ने जब सुरक्षा और प्रेस की आजादी का दबाव बनाया तो प्रेस कौंसिल आफ इंडिया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उस पत्रकार को राहत दिलाई। लेकिन इस काम में पांच साल लग गए।

मुरलीधरन ने बताया कि इसी तरह बांग्लादेश सीमा, नेपाल-भारत सीमा पर विभिन्न गिरोहों का आतंक है। सीमाई सुरक्षा के लिए समुचित व्यवस्था भारत सरकार नहीं कर पाई। इसलिए ये हावी हैं। उनकी रिपोर्टिंग में खतरे बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मानते हैं कि प्रशासन की नाकामी के चलते उग्रवादी गतिविधियां बढ़ीं। लेकिन जो पत्रकार इन गतिविधियों की खबरें लिखते हैं उन्हें प्रशासन की नाराजगी झेलनी पड़ती हैं।

इस गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए खास तौर पर कश्मीर से आए पत्रकार-संपादक मकबूल साहिल ने कहा कि वे उस राज्य से आ रहे हैं जो तमाम टकरावों का केंद्र रहा है। वहां बासठ साल से आतंकवादी, इसलामी कट्टरपंथियों और पुलिस प्रशासन के बीच टकराव हो रहा है। आप बीती सुनाते हुए उन्होंने बताया कि कैसे पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया। बिना चार्जशीट और एफआईआर के उन्हें गिरफ्तार किया गया और यातनाएं दी गई। तीन साल की इस गिरफ्तारी में उनका परिवार बिखर गया। यह सब उस पत्रकार के साथ हुआ जो इक्कीस साल से फोटोग्राफर, टीवी-केबल और प्रिंट में सक्रिय रहा।

साहिल ने बताया कि कश्मीर में पत्रकार निर्गुट नहीं रह सकता। उसे नहीं पता होता कि कब किस ओर से आई गोली उसे बींध देगी। कश्मीर में विभिन्न धड़ों को 'कवर' करने वाले पत्रकारों के छपे खास लफ्जों और भाषा का भी उन्होंने उल्लेख किया। उनके वक्तव्य पर वरिष्ठ पत्रकार सीसिल विक्टर, इंडियन एक्सप्रेस एंप्लाइज यूनियन के अध्यक्ष व एआईएनईएफ के महासचिव मदनलाल तलवार, सुजाता मधोक व कई और ने बहस में हिस्सेदारी की।

उपन्यासकार व पत्रकार अंजलि देशपांडे ने कहा कि राष्ट्रवादी व गैर राष्ट्रवादी की परिभाषा मीडिया के लिए बहुत साफ नहीं की गई है। उन्होंने बताया कि पंजाब में जब आतंकवाद चरम पर था तो कई पत्रकारों को धमकियां मिलीं। उन्होंने कहा कि एक दम विपरीत परिस्थिति में अयोध्या पर 'कवरेज' कर रही एक पत्रकार के कपड़े फाड़े गए फिर भी उसने अपना काम किया। सवाल है क्या पत्रकार को समुचित सुरक्षा भी नहीं दी जा सकती।

'फ्रंट लाइन' से जुड़े संवाददाता अजय आशीर्वाद ने बरेली दंगों पर अपना पेपर पढ़ा। उन्होंने कहा कि ज्यादातर मीडिया ने यह छानबीन जरूरी नहीं समझी कि कौन सी ताकते दंगों के पीछे सक्रिय थीं। इसी विषय पर अमित प्रकाश सिंह ने भी पेपर पढ़ा। मृणाल वल्लरी ने 'कंफ्लिक्ट रिपोर्टिंग बनाम टकराव पत्रकारिता' पर अपनी बात रखी। वर्कशाप के समापन पर धन्यवाद देते हुए पांडे ने बताया कि सबकी राय से जल्दी ही 'भविष्य के लिए पत्रकारों का घोषणा पत्र' जारी होगा। साभार : जनसत्ता


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