विकृत पत्रकारिता का ‘आम’ सड़ रहा है!

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उसके बाद फूटेंगी नई कोंपलें : अशोक शास्त्री स्मृति संवाद में बोले विख्यात पत्रकार संतोष भारतीय : ‘चौथी दुनिया’ के संपादक और विख्यात पत्रकार संतोष भारतीय ने जयपुर में आयोजित 'अशोक शास्त्री स्मृति संवाद' में अपनी विचारोत्तेजक टिप्पणियों से लोगों का मन मोह लिया। पत्रकारिता की गिरावट के दौर के सवालों पर उन्होंने कार्ल मार्क्स को उद्धृत करते हुए कहा-

''जब आम का फल आता है तो पहले वह कच्चा होता है, जिसकी लोग चटनी बना कर खाते हैं। फिर वह पकता है। पकने के बाद उसके सड़ने का नम्बर आता है। हम पत्रकारिता में जिस गिरावट की बात कर रहे हैं, उसका आम अब सड़ रहा है। इसका इन्तजार कीजिए। उसके बाद नई कोंपले फूटेंगी। निराश होने की जरूरत नहीं है।''

मूर्धन्य पत्रकार एवं साहित्यकार अशोक शास्त्री की 53वीं जयन्ती पर जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में इस ‘स्मृति संवाद’ का आयोजन किया गया था, जिसका विषय था ‘पत्रकारिता, साहित्य, संस्कृति और समाज।’ राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ, जवाहर कला केन्द्र और भारतेन्दु हरिश्चंद्र संस्थान का यह साझा कार्यक्रम था। जवाहर कला केन्द्र के कृष्णायन सभागार में शहर के कोई 150 पत्रकार, लेखक और संस्कृतिकर्मी जमा हुए जो आखिर तक बैठे रहे।

भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रवीण चंद्र छाबड़ा की अध्यक्षता में दो घंटे से ज्यादा चले इस कार्यक्रम में संतोष भारतीय ने अपनी सधी हुई रचनात्मक भाषा में सवालों के जवाब दिए और लोग उन्हें गौर से सुनते रहे। उनसे संवाद किया पत्रकार ईशमधु तलवार और साहित्यकार प्रेमचंद गांधी ने। संतोष भारतीय से पूछे गए सवालों में आज की पत्रकारिता और साहित्य की मौजूदा तस्वीर दिखाई दे रही थी।

कुछ सवाल इस तरह थे-

ईशमधु‘‘इलेक्ट्रोनिक और प्रिन्ट-दोनों तरह के मीडिया से आम आदमी गायब हो चुका है। अखबारों के चिकने व रंगीन पन्नों पर मॉडल्स छाई हुई हैं तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के धारावाहिकों में शराब, कार, बंगले और अवैध शारीरिक रिश्ते दिखाए जा रहे हैं। आम आदमी को यहां कैसे जगह मिलेगी?’’

‘‘पत्रकारिता व्यवसाय बन गई है पर हर व्यवसाय के भी कुछ उसूल होते हैं. पत्रकारिता में सच्ची खबरें देने का उसूल कैसे गायब हो गया?’’

प्रेमचंद‘‘अखबारों से साहित्य और संस्कृति के पन्ने क्यों छूटते जा रहे हैं?’’

‘‘अशोक शास्त्री कहते थे कि यदि आकाशवाणी नहीं होती तो ठुमरी, दादरा, ख्याल आदि शास्त्रीय संगीत कब का खत्म हो गया होता, क्योंकि यह बाजार में नहीं बिकता। बाजार इन कोमलताओं को कब तक नष्ट करता जाएगा?’’

ये और ऐसे ही अनेक सवालों के जवाब में संतोष भारतीय ने लोगों के मन में आशा की किरण जगाए रखी और कहा कि आने वाला वक्त अच्छी खबरें ले कर आएगा। एक धुरी पर जब कोई मशीन लगातार तेजी से घूमती है तो न दिखाई देने वाली धुरी घिस-घिर कर कमजोर पड़ती जाती है, जिससे ब्रेक डाउन हो जाता है। बाद में इस धुरी को बदलना पड़ता है। तेजी से दौड़ते अखबारों और चैनलों के बीच इस धुरी के बदलने के साथ ही हमें पत्रकारिता के एक नए युग की उम्मीद जगाए रखनी चाहिए।

संतोष भारतीय ने कहा कि इंटरनेट के रूप में अभिव्यक्ति के नए साधन विकसित हो चुके हैं जो युग परिवर्तनकारी साबित होंगे। इंटरनेट पर आज पत्रकारिता की एक नई दुनिया जन्म ले चुकी है। कई बार इंटरनेट पर इतनी समृद्घ और स्तरीय  सामग्री देखने को मिलती है कि आश्चर्य होता है। यह माध्यम अभी और तेजी से आगे बढऩे वाला है।

उन्होंने कहा कि विरोध के स्वर अब देखने को नहीं मिलते। पत्रकारिता में साहित्य और संस्कृति से परहेज किए जाने पर भी कहीं विरोध मुखर होता दिखाई नहीं देता। लेकिन जिस तरह आम आदमी की तकलीफ बढ़ रही है, उससे आज देश के 260 जिलों में बगावती आवाज उठ रही है, जिसमें राजस्थान भी जल्द शामिल होने वाला है। असंतोष के खिलाफ आवाज उठती है तो नतीजे जरूर निकलते हैं। रघुवीर सहाय अपनी एक कविता में कह चुके हैं कि बोलेंगे तो कुछ अवश्य होगा। आशा की किरण अभी बाकी है। अंधेरे के गर्भ से ही नया सवेरा निकलेगा।

सभागार में स्व. रांगेय राघव की पत्नी श्रीमती सुलोचना रांगेय राघव, अशोक शास्त्री की पत्नी श्रीमती सीमन्तिनी शास्त्री राघव और उनकी पुत्री वाग्मी भी मौजूद थी। विख्यात कवि नंद भारद्वाज और प्रसिद्घ कहानीकार भगवान अटलानी ने भी अपने सवालों से चर्चा को सार्थक बनाया। सभी वक्ताओं ने अशोक शास्त्री को भाव भीनी श्रद्घांजलि दी। कार्यक्रम का सफल संचालन किया फारूख आफरीदी ने और अंत में आभार व्यक्त किया ओमेन्द्र ने।


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