बौनों के दौर में बहुत बड़े आदमी थे प्रभाषजी

E-mail Print PDF

: जन्मदिन पर आयोजन ने साबित किया : खचाखच भरा था संत्याग्रह मंडप : पंडित कुमार गंधर्व को बहुत सुनते थे प्रभाषजी. मालवा की दाल बाटी को बहुत पसंद करते थे प्रभाषजी. गांधीजी और हिंद स्वराज पर खूब बतियाते और सक्रिय रहते थे अपने प्रभाष जोशी जी. कल तीनों का ही संगम था.

पंडित कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र ने अपने गायन के जरिए शब्द, तर्क के परे एक दुनिया का निर्माण किया, जो सिर्फ संवेदना व सुर के जरिए संचालित होती है. दाल-बाटी इतना पसंद किया लोगों ने कि प्लेटें कम पड़ गईं. पानी के दस हजार ग्लास खत्म हो चुके थे, लेकिन पीने वाले पानी तलाश रहे थे. राजघाट के गांधी दर्शन परिसर स्थित सत्याग्रह मंडप का विशाल मंडप कई सौ लोगों की मौजूदगी के कारण छोटा पड़ गया.

मठाधीशों नहीं, आम लोगों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, समर्थकों, शुभचिंतकों का कब्जा रहा मंडप पर. सुगठित आयोजन में बड़े समूह की मौजूदगी ने साबित किया कि प्रभाषजी हमारे समय के अद्वितीय व्यक्ति थे. बौनों के दौर में बहुत बड़े आदमी थे. वे अब सशरीर तो नहीं हैं इस दुनिया में लेकिन उनके विचार, उनकी सोच, उनकी बातें हमेशा हमें बताती रहेंगी कि देश-समाज और मानवता के साथ कैसे जिया जाना चाहिए.

बहुत दिनों बाद दिल्ली के किसी आयोजन में मैं शरीक हुआ. दिल्ली आए तीन बरस हुए और इसमें प्रभाषजी से कुछ बार ही मिलने के बावजूद उनके लेखन, उनके कर्म के कारण मैं खुद को उनके बेहद करीब पाता रहा. उनका अचानक जाना अनाथ कर गया. लगा, संबल देने वाला नहीं रहा. अपना नेता नहीं रहा. पर कल के आयोजन में रामबहादुर राय, हरिवंश, नामवर सिंह, बीसी वर्गीज आदि को देखकर लगा कि ये लोग बहुत कुछ कर रहे हैं, बहुत कुछ सोच रहे हैं. निराश नहीं होना चाहिए. दुनिया से व्यक्ति चले जाते हैं पर विचार को आगे ले जाने वाले नए शख्स फिर सामने आ जाते हैं.

पूरे आयोजन में प्रो. सुधीर चद्र का गांधी पर व्याख्यान ऐसा लगा जैसे गांव पर दादाजी गांधी के किस्से-कहानी सुना रहे हों और बेटे का बेटा चुपचाप आंखें बंद कर सुन रहा हो और अपने मतलब की चीजें समझ रहा हो और रिसीव कर रहा हो. सुधीर चंद्र का लंबा व्याख्यान बोझिल नहीं हुआ. गांधी से जुड़ी कई घटनाओं का जिक्र और उसका विश्लेषण उन्होंने बहुत सरल-सरस तरीके से किया. पर मंडप में मौजूद ढेर सारे लोग, जो बौद्धिकता को एक हद तक ही जीते हैं, व्याख्यान को बोझिल मानते-पाते रहे.

नामवर सिंह ने अपने अंदाज में प्रभाष जोशी की व्याख्या की. प्रभाष का मतलब, शाब्दिक अर्थ डिस्क्लोज करना होता है,  रिवील करना होता है. यही तो करते रहे प्रभाष जी जीवन भर. खुलासे करते रहे. उदघाटित करते रहे. नामवर की यह व्याख्या सबको भाई. लोक धुनों, लोक संगीत, लोक जीवन के प्रति प्रभाषजी के प्रेम को नामवर ने अच्छे तरीके से बताया-सुनाया.

हरिवंश और रामबहादुर राय को मैं सुन नहीं पाया क्योंकि थोड़ी देर से पहुंचा था. मुकुल शिवपुत्र का गायन शुरू में धीमा और उबाऊ रहा. एक ने कान में कहा- अभी इंजन गरम हो रहा है. रफ्तार पकड़ने पर देखना. और हुआ वही. सर्दी-जुकाम और खराब साउंड सिस्टम के बावजूद मुकुल शिवपुत्र जब फार्म में आए तो सबके सिर-हाथ हिलने लगे. आयोजन में दिल्ली के सबसे युवा पत्रकार (ऐसा मैं मानता हूं) शेष नारायण सिंह पूरी जीवंतता के साथ मौजूद थे तो प्रभाष जी के परिजन, दिल्ली-मुंबई के ढेरों वरिष्ठ पत्रकार, युवा पत्रकार पर्याप्त संख्या में आए हुए थे. शेषजी ने प्रभाषजी की पुत्री सोनल जोशी से परिचय कराया जो मुंबई में टीवी जर्नलिस्ट हैं.

हरिवंश जी दिखे तो उनका चरण छुआ. बड़े स्नेह से मेरे हाथों को हाथ में पकड़ा. रांची में अखबारी युद्ध के बावजूद प्रभाषजी के जन्मदिन पर आयोजन में समय निकाल कर आए हरिवंश जी. हरिवंश जी ने अपने साथ के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से मिलवाया जिनमें कुछ लोग मुंबई तो कुछ दिल्ली में हैं. मयंक सक्सेना, राजीव शर्मा, नीरज सिंह, देविका, आरिफ, शिशिर, अजय प्रकाश, विवेक बाजपेयी, सुरेश कई दोस्त मित्र मिले.

आयोजन के बोर्ड पर सबसे उपर राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड का नाम थोड़ा खटकता रहा. मंच के पीछे लगे आयोजन से संबंधित बोर्ड का कलर व लेआउट भी राजकमल वालों की थीम पर था. सोचता रहा कि कम से कम ऐसे आयोजन आयोजकों से मुक्त होने चाहिए. इन आयोजनों के लिए जनता पर भरोसा करना चाहिए. लोगों से चंदा लेना चाहिए.

इस आयोजन को दिल्ली के ज्यादातर अखबारों ने क्या डिस्प्ले दिया, यह ठीक-ठीक पता नहीं पर जिन दो अखबारों को मैं देख पाया, उसमें जनसत्ता ने तो अच्छी जगह पर सचित्र खबर का प्रकाशन किया है, हिंदुस्तान अखबार में भी पेज चार पर तीन कालम में फोटो के साथ खबर है. कार्यक्रम में जनसत्ता के संपादक ओम थानवी और हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी भी मौजूद थे. जनसत्ता में इस आयोजन के बारे में जो कुछ प्रकाशित हुआ है, उसे यहां हम ज्यों का त्यों दे रहे हैं-

प्रभाष जोशी देशज शब्दों के धनी थे : नामवर सिंह

प्रभाष जोशी अपने नाम के अनुरूप जीवन भर काम करते रहे. वे ताउम्र तथ्‍यों को उदघाटित व प्रकाशित करते रहे. देशज शब्‍दों के धनी जोशी से आज की मीडिया को सीखना चाहिए जो दुखद रूप से हिंग्लिश की ओर बढ़ रही है. प्रभाष परंपरा न्‍यास की ओर से गांधी दर्शन परिसर में आयोजित पहले प्रभाष जोशी स्‍मारक व्‍याख्‍यान कार्यक्रम में वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने यह कहा. इस मौके पर राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित प्रभाष जोशी की तीन पुस्‍तकों का लोकार्पण भी किया गया. सभा की अध्‍यक्षता करते हुए नामवर सिंह ने कहा कि प्रभाष जी गांधी के सपनों के भारत के लिये जीना और मरना चाहते थे. ऐसे भारत के लिये जहां सभी को आजादी, समानता और इज्‍जत मिले.

प्रभाष जी के जन्‍म दिवस पर 15 जुलाई पर उनकी पुस्‍तकों- 'आगे अंधी गली है' का लोकार्पण सांसद एवं पत्रकार एच के दुआ ने, '21वीं सदी :पहला दशक' (जनसत्‍ता में छपे लेखों का संकलन) का विमोचन शिक्षा शास्‍त्री शरद चंद्र बेहार और 'मसि कागद' के नए संस्‍करण का विमोचन योगाचार्य स्‍वामी विद्यानंद ने किया.

इस मौके पर हुए पहले व्‍याख्‍यान का विषय था- गांधी: एक असंभव संभावना. प्रो. सुधर चंद्र ने गांधी की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि अहिंसा और सत्‍य के पुजारी गांधीजी वास्‍तविक रूप से केवल एक ही बार अहिंसक रहे. उन्‍होंने हिन्‍द स्‍वराज्‍य को लेकर गांधी की सोच का उल्‍लेख करते हुए कहा कि गांधी खुद उसकी अवधारणा पर चले लेकिन राष्‍ट्रीय आंदोलन को हिन्‍द स्‍वराज्‍य से अलग रखा.

वरिष्‍ठ पत्रकार हरिवंश ने कहा कि जोशी नक्‍सलवाद हो या सामाजिक सरोकार के दूसरे अन्‍य मुद्दे -सभी पर पूरी निष्‍ठा के साथ खुद भी काम करते थे. उन्‍होंने उन मुद्दों को ताकत देने का काम किया जिनका आज अभाव है.

न्‍यास के प्रबंध न्‍यासी राम बहादुर राय ने संस्‍था के उद्देश्‍यों का उल्‍लेख किया. उन्‍होंने बताया कि पैसे के बदले खबर पर जोशी की मुहिम का नतीजा रहा कि प्रेस काउंसिल की ओर से गठित टीम ने 72 पेज की रपट दी है. जो देश भर की हालत उजागर करती है. लेकिन बड़े मीडिया घरानों के दबाव में दूसरी 12 सदस्‍यीय टीम बनी जिसने महज आठ पेज में रपट दी है. सभा के अंत में पंडित कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र का गायन हुआ.


AddThis