सरकारी आलोक में रज्जू बाबू की सालगिरह

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राजेंद्र माथुरदृश्य-1 : राजेंद्र माथुर की 75वीं जयंती का आयोजन। सात अगस्त की शाम साढ़े पांच बजे। दिल्ली के आईसीसीआर के आजाद भवन का बैंक्वेट हॉल। नौसिखिया से लेकर खुद को दिग्गज समझने वाले पत्रकारों की भीड़। पूरी जमात चाय-पान के लिए इकट्ठी हो चुकी थी। अशोक वाजपेई तो भीड़ में घुल गए थे। जयराम रमेश (पर्यावरण मंत्री) सरकारी ओहदा और सुदर्शनीयता से आकर्षण का केन्द्र बने हुए थे। ये बात अलग है, कि उनके दाहिनी ओर जूठे कप-प्लेट रखे जा रहे थे। मणिशंकर आए तो भीड़ भरे हॉल में हलचल मच गई। यूं तो नरेश गोयल को ढेर सारे लोग जानते ही हैं, फिर भी रंजन बख्शी पूरे प्रोटोकॉल के साथ उनका परिचय करवा रहे थे। उमस ज्यादा थी। खचाखच भीड़ की वजह से कुछ ज्यादा ही महसूस हो रही थी। हॉल के एसी का व्यवहार किसी कंजूस या जमाखोर सरीखा लग रहा था। चाय-पान से निकल कर कुछ लोग आजाद भवन के मुहाने पर लगे वोल्टास के टावर एसी की शरण में चले गए।

दृश्य-2 : चिपचिपाता पसीना देह से दूर होता कि इससे पहले जयराम रमेश और मणिशंकर अय्यर आजाद भवन में दाखिल हो चुके थे। चाय-नाश्ते को ही लंच-डिनर मानकर मेहनत करने वाली भीड़, आजाद भवन के आकार-प्रकार के मुकाबले काफी कम थी। औपचारिकताओं को दरकिनार कर, “पद्मश्री” आलोक मेहता ने मंच और माइक दोनों संभाल लिए। “पद्मश्री” आलोक मेहता ने जयराम रमेश, मणिशंकर अय्यर, अशोक वाजपेई, नरेश गोयल और अरुणा शर्मा सभी को मंच पर स्थान दिया। सभी को गुलदस्ते देकर औपचारिक स्वागत-सम्मान भी करवाया। नेता-मित्र और मंत्री की आवभगत में “पद्मश्री” आलोक मेहता ने राजेंद्र माथुर की पत्नी को शायद इस काबिल नहीं समझा कि उन्हें भी मंच पर स्थान दिया जाए। जिस महिला के पति की याद में आयोजन हो रहा था, वो सामान्य दर्शक दीर्घा में पूरे ढाई घंटे बैठी रहीं। माता पिता के बाद, राजेंद्र माथुर की उपलब्धियों में सबसे बड़ा योगदान उनकी पत्नी का ही रहा। ऐसा मैं नहीं, राजेंद्र माथुर को करीब से जानने वाले बताते हैं। वो महिला यानि राजेंद्र माथुर की पत्नी की अहमियत “पद्मश्री” आलोक मेहता की नजरों में सिर्फ इतनी ही थी कि उन्हें आयोजन में बुलाया भर जाए और जयराम रमेश के हाथों गुलदस्ता लेने के लिए मंच पर आमंत्रित किया जाए। भला हो जयराम रमेश का, जिन्होंने श्रीमति माथुर को ऊपर आने की ज़हमत नहीं दी और खुद दर्शक दीर्घा में पहुंच कर उन्हें गुलदस्ता भेंट किया। लोग अच्छी तरह जानते हैं कि  “पद्मश्री” के बाद वाला सरकारी पुरस्कार स्वर्गीय राजेंद्र माथुर की पत्नी नहीं, नेता-मित्र और मंत्री ही दिला सकते हैं। ये आलोक मेहता को ही मालूम है कि एक पत्रकार को, साहित्य और शिक्षा की श्रेणी में “पद्मश्री” लेने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। भला हो वक्ताओं का जिन्होंने अपने वक्तव्य से पहले श्रीमति माथुर को संबोधित किया। वरना आयोजन की सरकारी दुकान पर राजेंद्र माथुर को तो बे-भाव बिकना ही था।

दृश्य-3 : मणिशंकर अय्यर और जयराम रमेश का वक्तव्य अलग-अलग था, मगर दोनों की आवाज एक ही ओर इशारा कर रही थी। ये लोग बोले- फर्जी आडम्बर छोड़ कर अखबार और टीवी चैनलों को देश का वास्तविक चेहरा दिखाना होगा। भले ही मुद्दा नक्सलवाद का हो या आर्थिक विकास का। मणिशंकर, बीच में ही चले गए लेकिन जयराम रमेश ने इस बात को मंच से स्वीकार भी किया कि सत्तर मिनट तक मंच पर वो दोनों साथ रहे और एक बार भी मणिशंकर ने उनकी खिंचाई नहीं की, बल्कि तारीफ और चिंता जरूर की। प्रसंगवश दो बातों की चर्चा जरूरी है। पहली, जयराम रमेश की सादगी और राम बहादुर राय की मौजूदगी। मणिशंकर की सादगी का जिक्र इसलिए नहीं, क्योंकि वो अभी मंत्री नहीं हैं। राम बहादुर राय की राजीव शर्मामौजूदगी का जिक्र इसलिए कि राजेंद्र माथुर और प्रभाष जी दोनों का सिलसिला इंदौर से है। दोनों नई दुनिया से दिल्ली आए। भारतीय अखबारी जगत की क्रांति में दोनों का अहम् योगदान है। प्रभाष जी के जन्मदिन के आयोजन में लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे, आलोक मेहता दिखे क्या? राजेंद्र माथुर के जन्मदिन के आयोजन में राम बहादुर आए, श्रद्धांजलि दी, सबको सुना और चुपचाप चले गए क्योंकि वो “पद्मश्री” नहीं है।

लेखक राजीव शर्मा एस-1 न्यूज चैनल में डायरेक्टर न्यूज के पद पर कार्यरत हैं.


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