'अब चोर भी लेंगे चोरी न करने की कसम!'

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: सवाल केवल पेड न्यूज का ही नहीं : चुनावों के समय मीडिया में पेड न्यूज मीडिया के अस्तित्व के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। इसे लेकर आंदोलन कई रूपों में पिछले 40 सालों से चलता रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि जो इस कुरीति का विरोध करते हैं, वही पत्रकार जब अपने मीडिया हाऊस में निर्णायक की भूमिका में आते हैं, तो वह भी वही करते हैं जो अन्य करते हैं। इस संदर्भ में कई लोगों का नाम लिया जा सकता है, लेकिन नाम न लेना ही बेहतर होगा। कल पटना के एलएन मिश्रा संस्थान में 'एंटी पेड न्यूज फ़ोरम' द्वारा आयोजित 'एंटी पेड न्यूज महासम्मेलन' के अवसर पर जो कुछ देखने को मिला, उससे मेरे अनेक विश्वास टूटे। जिन लोगों को मैं आम आदमी मानता था, वे बहुरुपिये निकले।

इनमें सबसे अधिक दुख मुझे प्रो नवल किशोर चौधरी और प्रो विनय कंठ के कारण हुआ। अब तक कई अवसरों पर मैंने इन दोनों को आम आदमी के लिये सत्ता से लड़ते देखा है। कल पहली बार अहसास हुआ कि बिहार में अधिक पढा लिखा और स्वयं को सबसे प्रगतिशील मानने वाला आदमी भी सामंती हो सकता है। दरअसल हुआ यह कि इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान सहित अनेक नेता अपना विचार व्यक्त करने आये। जैसे ही रामविलास पासवान ने बोलना शुरू किया, ये दोनों महानुभाव सभास्थल से निकल गये। यदि स्वभाविक तरीके से जाते तो कोई और बात होती, लेकिन इनके चेहरे पर नफ़रत का भाव स्पष्ट झलक रहा था।

इससे पहले कार्यक्रम के शुरू में ही जब उदघोषक पत्रकार नवेन्दु ने कहा कि इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और विजय कुमार चौधरी आने वाले हैं, तब सभा स्थल में उपस्थित लगभग सभी पत्रकारों के मुंह से निकला – अब चोर भी लेंगे चोरी न करने की कसम। मैं उनके इस कथन का आशय समझ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्रा सहित श्याम रजक और निहोरा यादव जैसे नेता भी ऐसे भागे, मानों लालू प्रसाद नहीं, कोई अछूत अथवा उनका सबसे पराक्रमी दुश्मन आ रहा हो और उसका सामना करना उनके वश में नहीं।

वास्तविकता यह है कि आज भी बिहारी समाज में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान अछूत हैं। हर सामंती चाहे वह बुद्धिजीवी हो या फ़िर आम आदमी इन नेताओं से दूर रहना चाहता है और इनके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है। इस रोग से मीडिया भी ग्रसित है। इसलिये केवल पेड न्यूज का विरोध करने का सवाल ही नहीं है, बल्कि यह तो इससे भी बड़ा सवाल है। अस्पृश्यता और भेदभाव का।

-नवल किशोर कुमार (साभार- अपना बिहार)


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