महाबलशाली देश मजबूर हैं हिंदी सीखने के लिए

E-mail Print PDF

दयानंद पांडेय का संबोधन''कोई भाषा बाज़ार और रोजगार से आगे बढती है। हिंदी अब बाज़ार की भाषा तो बन ही चुकी है, रोजगार की भी इसमें अपार संभावनाएं हैं। अब बिना हिंदी के किसी का काम चलने वाला नहीं है। बैंक किसी भी बाज़ार की धुरी हैं। तो बैंक हिंदी को आगे बढाने में मह्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि कोई भी भाषा विद्वान नहीं बनाते, जनता बनाती है। अपने दैनंदिन व्यवहार से। इसीलिए बैंकों की भूमिका हिंदी को आगे बढाने में बहुत बड़ी है।''

ये बातें कहीं दयानंद पांडेय ने. कहानीकार-उपन्यासकार और पत्रकार दयानंद पांडेय हिराल बैंक्वेट हाल, इंदिरानगर लखनऊ में कारपोरेशन बैंक, आंचलिक कार्यालय लखनऊ द्वारा आयोजित हिंदी दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे। अध्यक्षता बैंक के सहायक महाप्रबंधक श्री निराकार प्रधान ने की। दयानंद पांडेय ने अपने संबोधन में आगे कहा कि दुनिया अब हिंदी की तरफ़ बड़े रश्क से देख रही है। अमरीका, चीन जैसी महाशक्तियां भी अब हिंदी सीखने की ज़रूरत महसूस कर रही हैं और कि सीख रही हैं क्योंकि हिंदी के जाने बिना वह हिंदुस्तान के बाज़ार को जान नहीं सकते, हिंदी के बिना उनका व्यापार चल नहीं सकता। सो वह हिंदी सीखने, जानने के लिए लालायित हैं क्योंकि हिदी के बिना उनका कल्याण नहीं है। दयानंद पांडेय ने कहा कि हिंदी अब अपने पंख फ़ैला कर उड़ने को तैयार है। और यकीन मानिए कि आगामी 2050 तक हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने जा रही है। अब भविष्य का आकाश हिंदी का आकाश है। अब इसकी उड़ान को कोई रोक नहीं सकता। हिंदी अब विश्वविद्यालयी खूंटे को तोड़ कर आगे निकल आई है।

दयानंद पांडेय ने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई इसका विधवा विलाप करने से कुछ नहीं होने वाला है। आप ही बताइए कि हिंदी के लिए देश को तोड़ना क्या ठीक होता? और कि क्या देश चलाने में तब क्या हिंदी सक्षम भी थी भला? जो आप हिंदी को राष्ट्रभाषा बना लेते? शासन चला पाते आधी-अधूरी हिंदी के साथ? हालत यह है कि आज भी तकनीकी शब्दावली हिंदी में हमारे पास पूरी नहीं है। लगभग सभी मंत्रालयों में इस पर काम चल रहा है। भाषाविद लगे हुए हैं। काम गंभीरता से हो रहा है। इसी लिए मैं कह रहा हूं कि हिंदी 2050 में दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने जा रही है। कोई रोक नहीं सकता। बस ज़रूरी है कि हम आप हिंदी को अपने स्वाभिमान से जोड़ना सीखें। उन्होंने कहा कि हमारे देश में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी लाई थी। बाद में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने इसको हमारी गुलामी से जोड़ दिया। इसीलिए आज भी कहा जाता है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए। तय मानिए कि अंग्रेजी सीख कर आप गुलाम ही बन सकते हैं, मालिक नहीं। मालिक तो आप अपनी ही भाषा सीख कर बन सकते हैं। चाहे वह हिंदी हो या कोई भी भारतीय भाषा। आज लड़के अंग्रेजी पढ कर यूएस, यूके जा रहे हैं तो नौकर बन कर ही, मालिक बन कर नहीं।

अपने अध्यक्षीय भाषण में बैंक के सहायक महाप्रबंधक श्री निराकार प्रधान ने राजभाषा अनुभाग के निष्पादन पर संतोष व्यक्त किया। इस समारोह का शुभारंभ श्रीमती गीतांजली श्रीवास्तव एवं श्रीमती पूनम गुप्ता द्वारा प्रस्तुत वंदना गीत से हुआ। आंचलिक कार्यालय, लखनऊ के मुख्य प्रबंधक श्री विजय गुप्ता ने मुख्य अतिथि श्री दयानंद पांडेय, सहायक महाप्रबंधक श्री निराकार प्रधान तथा लखनऊ महानगर के विभिन्न शाखाओं एवं कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारीगण एवं उनके परिवार के सदस्यों का स्वागत किया। तत्पश्चात मुख्य अतिथि श्री दयानंद पांडेय, सहायक महाप्रबंधक एवं मुख्य प्रबंधक ने दीप प्रज्जवलित कर समारोह का औपचारिक उदघाटन किया। इसके बाद पुष्प गुच्छ एवं स्म्रृति चिन्ह देकर मुख्य अतिथि का सम्मान किया। मंच संचालन का कार्य श्रीमती चारू सिनहा एवं श्री दिनेश देवरानी ने किया। इस मौके पर कुल 8 प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। साथ ही एक क्विज़ का भी आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि श्री दयानंद पांडेय ने पुरस्कार वितरण किया। इस अवसर पर सांस्कृतिक एवं रंगारंग कार्यक्रम कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए गए। राष्ट्रगान एवं सामूहिक भोजन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ। प्रेस विज्ञप्ति


AddThis