इन मालिकों की देशभक्ति और शर्म दोनों मर चुकी है

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तन्‍वी : के. विक्रम राव दहाड़े : पेड न्यूज पर सेमिनार : अरविंद मोहन, पंकज सिंह, राजीव रंजन,  राममोहन पाठक, यशवंत ने रखी बात : प्रशिक्षु पत्रकार ने सुनाई पीड़ा :

आमतौर पर किसी सभा-सेमिनार-विमर्श में ख्याति प्राप्त लोगों को ही बोलने का मौका मिलता है, सबसे वरिष्ठ-गरिष्ठ शख्सियत द्वारा कही गई बातों को ही सबसे प्रमुख बात मानकर प्रकाशित-प्रचारित किया जाता है. पर परसों नोएडा में पेड न्यूज पर आयोजित एक सेमिनार में पत्रकारिता की एक छात्रा ने सेमिनार से ठीक पहले मंच से जो कुछ कहा, वह आज की वह सच्चाई है जिसे हर नया पुराना जर्नलिस्ट जानता, भोगता और महसूस करता है लेकिन बहुत कम लोग इसे मंचों से बोल पाते हैं.

तन्‍वीसेमिनार प्रारम्‍भ होने से पहले युवा पत्रकार तन्‍वी पाठक ने पत्रकारिता की वर्तमान सच्‍चाई को बेबाकी से सबके सामने रखा. तन्‍वी ने कहा कि पत्रकारिता में आने से पहले मैंने काफी सपने देखे थे. पर जब इसकी सच्‍चाई से पाला पड़ा तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी. पत्रकारिता में तो सिर्फ पैसे की बातें होती हैं. लाभ लेने की बातें होती हैं. तन्‍वी ने कहा कि जब हम अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकते तो हम दूसरों की लड़ाई कैसे लड़ेंगे. हर जगह बस पत्रकारों का शोषण है. कोई काम दिलाने के नाम पर शोषण करता है तो कोई किसी नाम पर शोषण करता है. तन्‍वी ने कहा कि बाहर से चकाचौंध भरी यह दुनिया अंदर से बहुत ज्यादा खोखली है.

नोएडा में राष्‍ट्रीय पत्रकार कल्‍याण ट्रस्‍ट द्वारा आयोजित वार्षिक सम्‍मेलन एवं 'पेड न्‍यूज और भारतीय परिप्रेक्ष्‍य' विषयक गोष्‍ठी में इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव ने कहा कि पत्रकारिता में पेड न्‍यूज बहुत बड़ी समस्‍या बन गई है. इससे चौथा खंभा हिलने लगा है. पैसा लेकर खबरों को छापना ही पेड न्‍यूज नहीं है बल्कि इसके कई अवतार हैं. विज्ञापनदाताओं के दबाव में खबर रोकना भी पेड न्यूज है. उनके दबाव में खबरों को तोड़मोड़ कर प्रस्‍तुत करना भी पेड न्‍यूज है. किसी के दबाव में दूसरे की छवि खराब करना भी पेड न्‍यूज है. पेड न्‍यूज नई समस्‍या नहीं है बल्कि यह कई दशक पुरानी है.

श्री राव ने कहा कि आज पत्रकारिता का चेहरा बिगड़ता जा रहा है. अब पत्रकारिता एम्‍बेस्‍टेड यानी हमबिस्‍तर हो गई है. हमबिस्‍तर पत्रकारिता का सीधा उदाहरण इराक है. इराक के खिलाफ अमेरिका ने जो अभियान चलाया, उसका आंख मूंद कर भारतीय मीडिया ने सपोर्ट किया. बिना सत्‍यता को जांचे और परखे. एजेंसियों के समाचार ज्‍यों के त्‍यों छापे गए, अमेरिकी मानसिकता की तरह. एक भी भारतीय अखबार अपने समर्थक देश इराक के पक्ष में सही खबरें नहीं छापा. जबकि इराक पहला मुस्लिम देश था, जिसने कश्‍मीर को भारत का हिस्‍सा बताया था. जिसने कई मुद्दों पर भारत का खुलकर साथ दिया. परन्‍तु भारतीय अखबार अपने समर्थक देश के पक्ष में लिखने के बजाय अमेरिका के साथ हमबिस्‍तर पत्रकारिता करते रहे. यह भी अंतर्राट्रीय स्तर पर पेड न्यूज का ही एक उदाहरण है. उन्होंने कहा कि अगर पेड न्यूज पर जल्द ही अंकुश नहीं लगा तो आने वाले समय में देश का प्रधनमंत्री या शासनाध्यक्ष कौन बनेगा, यह देश के वोटर नहीं बल्कि कुछ बड़े घराने और मीडिया हाउसों का मैनेजमेंट तय करेगा।

श्री राव ने कहा कि टीवी पत्रकारिता बुरी स्थिति से गुजर रहा है. जनसरोकार की बजाय उटपटांग खबरें प्रसारित की जा रही हैं. पेड न्‍यूज को रोकने के लिए जितना पन्‍ना उतना दाम निर्धारित करना होगा. आज स्थिति यह है कि एक अखबार तीन रुपये में पचास पन्‍ना दे रहा है तो दूसरा उतनी ही कीमत में बारह-चौदह पन्‍ना दे रहा है. इस प्रवृत्ति पर रोक लगना बेहद जरूरी है. प्राइज मॉडल्‍यूशन लागू किया जाना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि हम मांग करते हैं कि मीडिया के नियंत्रण के लिए भी आचार संहिता बनना चाहिए. पर बड़ा सवाल यह है कि कौन बनायेगा आचार संहिता? पैसा लेकर सवाल पूछने वाले सांसद, भ्रष्‍ट लाल फीताशाही नौकरशाह, भ्रष्‍ट नेता या दलाली करने वाले संपादक या पत्रकारिता को बेचने वाले मालिक! मीडिया के लिए आचार संहिता बनाने का काम पाठक, श्रोता और दर्शकों को सौंपा जाना चाहिए, तभी एक सम्‍पूर्ण आचार संहिता बन पायेगी.

श्री राव ने कहा कि आज स्थिति ये है कि जिन संपादकों को कुछ नहीं आता, भाषा का सही ज्ञान नहीं है, वे पीएम के साथ उनके विदेश दौरों पर जाता है. हवाई जहाज से घूमता है और खबरें पीटीआई और यूएनआई की छापता है. यह स्थिति खतरनाक है. जो मीडिया घरानों के मालिक विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश यानी एफडीआई का विरोध करते थे, देशभक्ति के नाम पर नाटक करते थे, आज वे ही घराने और मालिक विदेशी निवेश अपने मीडिया हाउसों में करा रहे हैं. उनकी देशभक्ति और शर्म दोनों मर चुकी है.

अमर उजाला के कार्यकारी संपादक अरविंद मोहन ने कहा कि नई पीढ़ी को इस सामाजिक बुराई के खिलाफ अभियान छेड़ना पड़ेगा. आज चीजें बहुत तेजी से बदली हैं. इसे हल्‍के में लेना गलत होगा. उन्‍होंने कहा कि पेड न्‍यूज का दौर समाप्‍त हो जायेगा, यह बस मान लेने भर से समस्‍या हल नहीं होगी. इसे जितना आसान समझा रहा है, वह उतनी आसान नहीं है. इस समस्‍या को एक दौर मानना मामले को हल्‍का करना है. उन्‍होंने कहा कि यह मानना गलत है कि पेड न्यूज का असर नहीं होता और यह खतरा कुछ सालों में टल जायेगा. पेड खबरों का असर जनता पर बिल्‍कुल होता है. मानसिक रूप से उन पर प्रभाव पड़ता है. वे प्रभावित होते हैं. उन्होंने कहा कि आज जो नेता जनता के दरबार में जीत पाने की स्थिति में नहीं है, उसके हाथों में सरकार की बागडोर होती है. जो अपने जीवन में जनता के बीच कभी नहीं गए वे आम जनता के लिए योजनाएं बनाते हैं. यह सब ऐसी ही परिस्थितियों के चलते संभव हुआ है. ऐसे लोग हमारे देश के वित्‍त मंत्री बनते हैं, जिन्‍हें आम लोगों की समस्‍याओं का पता नहीं होता. आम जरूरतों का भान नहीं होता. पेड न्‍यूज एक बहुत ही गंभीर समस्‍या है. अखबार का मालिक अब पर्ची कटवाता है. स्थिति यह हो गई है कि कुछ लोग चुनावों के दौरान अखबारों के पेज तक खरीद लेते हैं, खबरें उनके घर से बनकर आती हैं. जो मन करता है पेज खरीदने वाला लिखता है. स्थिति काफी गंभीर हो चुकी है और इसे हल्‍के में लेना इसकी गंभीरता को कम करने जैसा है.

अध्‍यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार पंकज सिंह ने कहा कि अब वह वक्त आ गया है कि जब हम पेड न्‍यूज को रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं. हल्की-फुल्की कार्रवाई से काम नहीं चलने वाला. यह दौर आदर्शों एवं मूल्‍यों के पतन का है. मूल्‍यहीनता की आंधी चल रही है. मीडिया की जनसरोकार की व्‍यवस्‍था बाजार में तब्‍दील हो चुकी है. छिछोरेपन करते हुए तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. बड़े मीडिया हाउस छोटे पूंजी से चलते वाले अखबारों को निगल जाना चाहते हैं. भूमंडलीकरण के बाद पहली-दूसरी दुनिया के लोग तीसरी दुनिया के लोगों को अपने शोषण का शिकार बना रहे हैं और इसमें मीडिया उनका खुलकर साथ दे रहा है. जो खलनायह है आज वहीं नायक बनकर विभिन्‍न मंचों पर उपस्थित है. स्थितियां काफी नाजुक हैं. पेड न्‍यूज के मामले में सिर्फ रफू करने से समस्‍या हल नहीं होगी. यह सिर्फ चुनाव या नेताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई रूप हो चुके हैं. जनसरोकार के लिए पेड न्‍यूज पर रोक लगाना ही होगा. उन्होंने कहा कि पत्रकार व्यवसायिकता को अपने विवेक पर किसी भी हाल में हावी न होने दें. उन्होंने पत्रकारों से आहवान किया कि अगर वह किसी दबाव में आकर सच नहीं लिख पा रहे हैं तो कम से कम झूठ न लिखने का प्रण लें.

हिन्‍दी दैनिक देशबंधु के संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने व्यवसायिक मानसिकता और पत्रकारिता की समीक्षा करते हुए कहा कि पेड न्यूज यानी  प्रायोजित समाचार आने वाले समय में एक गंभीर समस्या बनकर उभरने वाली है. उन्होंने कहा कि पत्रकार कुछ पेड़ों के समूह को जंगल मान लेने की गलती न करें. पूंजी पर मीडिया की निर्भरता धन की राक्षसी पकड़ का कारण है. पेड न्‍यूज की अवधारणा केवल चुनाव और नेता तक ही सीमित नहीं है, इसके कई रूप हैं. समाचार चैनलों ने इस समस्‍या को और अधिक बढ़ाया है. पैसे लेकर खबरें प्रायोजित करना इसी का हिस्‍सा है. उन्‍होंने  कहा कि स्टिंग ऑपरेशन ने गंभीर पत्रकारिता को बहुत नुकसान पहुंचाया है. अखबार भी छदम विज्ञापन उत्‍पाद के रूप में बदल गए हैं. यह लोकतांत्रिक राजव्‍यवस्‍था के खिलाफ पूंजीवाद को बढ़ावा देने की साजिश है. श्री श्रीवास्‍तव ने कहा कि इंडियन एक्‍सप्रेस समूह द्वारा दिए जाने वाला पुरस्‍कार जेपी ग्रुप ने प्रायोजित किया. इस पुरस्‍कार के लिए पत्रकारों का चयन करने वाली कमेटी में केशव महिन्‍द्रा भी शामिल थे, जो भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्‍मेदार में लोगों में से एक हैं. ऐसे लोग अब पत्रकारों का चयन कर रहे हैं. उन्‍होंने कहा कि देश में चुनावी प्रक्रिया लंबी होने से भी पेड न्‍यूज को बढ़ावा मिलता है. किसी अन्‍य देश में चुनावी प्रक्रिया इतनी लंबी नहीं होती है. चुनाव आयोग को इस दिशा में भी सोचना चाहिए.

महात्‍मा गांधी काशी विद्यापीठ के डीन प्रोफेसर राममोहन पाठक ने कहा कि आज पेड न्यूज ने सबसे ज्यादा नुकसान वास्तविक समाचारों का ही किया है. पत्रकारिता अब अपना चोला और चेहरा बदल चुकी है. फिर भी पत्रकारिता का जज्‍बा अभी जिन्‍दा है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि ज्‍यादातर लोग पत्रकारिता में इसलिए आते हैं, जिन्‍हें दूसरे जगह स्‍थान नहीं मिलता वे पत्रकार बन जाते हैं. पैसे के लिए कुछ पत्रकार प्रायोजित खबरें यानी पेड खबरें भी लिख देते हैं. कभी-कभी ऐसी खबरें गलत भी होती हैं, जिससे उस व्‍यक्ति की मानहानि होती है. ऐसे में पत्रकारों को सोचना चाहिये कि किसी की इज्‍जत को दांव पर न लगाएं. उन्‍होंने कहा कि लोग कह रहे हैं कि पत्रकारिता का चरित्र बदल गया है, तो मैं कहना चाहूंगा इस पेशे में वही लोग आए जिन्‍हें अपना रास्‍ता खुद तय करना आता हो.

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने अपने जोशीले भाषण में कई मीडिया संस्थानों और उनकी पत्रकारिता की धज्जियां उड़ायीं. श्री सिंह ने कहा कि आज जनसरोकार की खबरें अखबारों की प्राथमिकता सूची में नहीं है बल्कि खबर का नाम अब दो विज्ञापनों के बीच की खाली जगह को मान लिया गया है. मीडिया आज मुखौटा बन गया है. इसकी आड़ में अपने हित साधे जा रहे हैं. धनार्जन किया जा रहा है. उन्‍होंने कहा कि जब एक गांव का व्‍यक्ति,‍ जिसे ईमानदारी, सच्‍चाई और आदर्शों की घुट्टी घोलकर पिलाई गई रहती है, जब वह शहर में आता है यहां चीजें बिल्‍कुल उल्‍टी दिखती हैं. ऐसे में वह कनफ्यूज हो जाता है कि सच क्या है, जो पढ़ा है वह, या जो देख रहा है वह. इस उलटबांसी के चलते दोहरा जीवन जीना पड़ता है. ऐसी ही स्थिति पत्रकारिता में हो गई है. उन्‍होंने कहा कि पत्रकारिता मीडिया घरानों की पहली पीढ़ी के लिए मिशन हुआ करती थी. विदेशों से पढ़कर आने वाली मीडिया घरानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी के लिए यह शुद्ध रूप से व्‍यवसाय है, मुनाफा है, जिसका टर्नओवर हर साल बढाते रहना है, भले ही उसके लिए खबरें बेचने तक का धंधा क्यों न करना पड़े. उन्‍हें सिर्फ लाभ का गणित आता है. इसके लिए संपादकीय विभाग को बेचना पड़े, जमीर को बेचना पड़े, उनके लिए कोई फर्क नहीं पड़ता. भ्रष्ट मीडिया का भ्रष्ट नेताओं से गठजोड़ हो गया है और यह बहुत ही विषम परिस्थिति है. उन्‍होंने कहा कि अब अखबारों में भ्रष्‍टाचार के खुलासे नहीं होते क्‍योंकि लुटेरों के गैंग में अखबार वाले भी शामिल हो गए हैं. जब घोटाले खोलने वाले ही घोटालेबाजों के दोस्त हो गए हैं तो घोटाले कैसे खुलेंगे. जो घोटाले कभी-कभार खुलते दिखते हैं वे राजनीति व सत्ता के इनटरनल कंट्राडिक्‍शन के चलते खुल जाते हैं. मीडिया के बड़े-बड़े चेहरे आजकल कारपोरेट जगत के दिग्‍गजों के लिए लाबिंग करते दिखते हैं. राडिया प्रकरण ने मीडिया से आस्था को हिलाकर रख दिया है. ऐसे पत्रकारों, हाउसों, संपादकों से किसी क्रांति की अपेक्षा नहीं कर सकते. यशवंत ने कहा कि अब उम्मीद न्यू मीडिया (वेब-ब्लाग-मोबाइल) से है, जो कम पूंजी में वैश्विक पहुंच रखने में सक्षम है. परंपरागत मीडिया ने इतने समझौते कर लिए हैं कि उसके पास छापने के लिए सिर्फ गा गी गे वाली खबरें या फिर रुटीन की कुछ खबरें ही बची हैं.

राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण ट्रस्ट के अध्यक्ष धीरज भारद्वाज ने कहा कि जब तक जमीन से जुड़े पत्रकारों की स्थिति नहीं सुधरेगी तब तक पत्रकारिता को सही अर्थों में मिशन नहीं बनाया जा सकता है. पत्रकारिता के बदलते दौर में रुट लेबल के पत्रकारों के बेहतरी के बारे में भी सोचना होगा. उन्होंने कहा किसी भी समस्‍या का समाधान उसे जड़ से उखाड़कर ही किया जा सकता है, शाखा काटने से समस्‍याएं हल नहीं होंगी. इसलिए पत्रकारिता को उसके मुश्किल दौर से निकालने के लिए मुश्किल हालात से जूझ रहे पत्रकारों के बारे में भी सोचना होगा. उन्‍होंने कहा कि पेड न्यूज को मुंहतोड़ जवाब देना है तो पत्रकारों की स्थिति बेहतर बनाने पर ध्यान देना होगा. उन्‍होंने बताया कि उनकी संस्‍था राष्‍ट्रीय पत्रकार कल्‍याण ट्रस्‍ट इसी दिशा में संघर्षशील और प्रयासरत है. उन्‍होंने बताया कि उनकी संस्‍था अपने सामर्थ्‍य के अनुसार कई गरीब पत्रकारों को आर्थिक सहयोग प्रदान कर चुकी है.

ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी नरेंद्र भाटी ने कहा कि उनकी संस्था देश भर के पत्रकारों को सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में काम कर रही है. श्री भाटी ने कहा कि यद्यपि इस बड़े काम के लिए भारी धन की आवश्यकता है लेकिन उनकी संस्था इसके लिए पत्राकारिता के आदर्शों से समझौता नहीं करेगी. उन्‍होंने बताया कि संस्‍था कई पत्रकारों का बीमा करा चुकी है. कई गरीब पत्रकारों के बहन-बेटियों की शादी में यथासंभव सहयोग कर चुकी है. उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि यह अभियान निरंतर जारी रहेगा.

राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण ट्रस्ट के वार्षिक अधिवेशन में देश भर से आये सैकड़ों वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों तथा प्रशिक्षु पत्रकारों ने हिस्सा लिया. इस मौके पर ट्रस्ट ने समाज के कई प्रतिभाशाली लोगों को सम्मानित किया. मास्को मीडिया इंस्टीट्यूट, प्राण इंस्टीट्यूट, मारवाह इंस्टीट्यूट, आईएमएस व साधना इंस्टीटयूट के पत्रकारिता विभाग में अध्यनरत प्रतिभावान छात्रा-छात्राओं को मेडल और प्रमाण-पत्र देकर सम्‍मानित किया गया. कारगिल युद्व में शहीद ओमप्रकाश की पत्नी श्रीमती राजकुमारी, बाल आईटी गुरू मुदित ग्रोवर, बिहार क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष अमिकर दयाल को भी सम्मानित किया गया. सेमिनार का शुभारंभ सेमीनार के संयोजक डाक्टर नरेंद्र दीक्षित ने वेद मंत्रों के बीच अतिथियों से दीप प्रज्जवलित कराकर किया. सभा को उत्‍तर प्रदेश जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष रामेश्‍वर दयाल गुप्‍ता, लखनऊ प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष रवीन्‍द्र सिंह, श्रमजीवी पत्रकार के प्रदेश अध्‍यक्ष हसीब सिद्दीकी सहित कई लोगों ने संबोधित किया. कार्यक्रम का संचालन अशोक श्रीवास्‍तव ने किया. सेमिनार में संतोष गुप्ता, सैयद जावेद, डाक्टर सुधरानी सिंह, हाकिम सिंह, ताहिर सैफी, हिमांशू, सुरेश सिंह चौहान, रोहताश सिंह चौहान, अमित चौहान, नीरज राणा, अनिल एडवोकेट, मनीष सिंह, अजय सिंह, कुबेरनाथ सिंह, नवीन सिंह, मिथिलेश चौबे, हेमेन्‍द्र सिंह राजपूत सहित काफी संख्‍या में पत्रकार उपस्थित रहे.


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