हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कई चुनौतियां

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विमोचननिज़ामाबाद. "इंदूर हिंदी समिति, निज़ामाबाद" एवं समाचार पोर्टल "आपकी न्यूज-आपकी खबर" के सयुंक्त तत्वावधान में राजस्थान भवन में "हिंदी पत्रकारिता एवं उसकी चुनौतियां" विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. गोष्‍ठी में वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष मौजूद चुनौतियों और पत्रकारिता के बदलते प्रतिमानों पर चर्चा की गई.

संगोष्‍ठी में स्थानीय हिंदी दैनिक "स्वतंत्र वार्ता" के सथानीय संपादक प्रदीप श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के सामने कई मुश्किलों का पुलिंदा आज भी है. सही मायने में देखा जाए तो इसके लिये भी हम ही जिम्मेदार हैं. अगर दस-पंद्रह साल पीछे चलें तो देखेंगे कि साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, दिनमान, रविवार जैसी हिंदी की लोकप्रिय पत्रिकाएं बाज़ार में थीं, लेकिन लोकप्रियता व प्रसार होने के बावजूद वे बंद हो गईं, क्यों? अब खबर है कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह का अख़बार दैनिक हिंदुस्तान अपना चंडीगढ़ संस्करण बंद करने कि योजना बना रहा है. आज भी बहुत सी पत्र-पत्रिकाएं हिंदी की निकल रहीं हैं, लेकिन उनका भविष्य क्या है?

उन्‍होंने कहा कि दक्षिण भारत की ही बात करें तो आप देखेंगे कि दक्षिण से हिंदी के दो-चार अखबार ही निकलते हैं. जिनकी स्थिति ठीक नहीं है. यह बात नहीं है कि हिंदी के पाठक नहीं हैं, या विज्ञापन नहीं मिलता. सब कुछ होने के बावजूद हिंदी के अखबारों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. अगर चुनौती की बात करें तो हिंदी अखबारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अनुवाद की, वाक्य संरचना की, भावार्थ की.श्री श्रीवास्‍तव ने कहा कि अगर अनुवाद की बात करें तो मैं यही कहूंगा कि बहुत बुरा हाल है. आप कहना कुछ चाहते हैं और उसका अनुवाद कुछ हो जाता है. अगर शुद्ध हिंदी का प्रयोग करते हैं तो पाठक कहता है कि क्लिष्‍ट हिंदी न पढ़ायें. फिर दक्षिण में उर्दू व मारवाड़ी मिश्रित हिंदी होती है. उन्होंने आगे कहा कि आज तकनीक में काफी बदलाव आया है, जिसके चलते लोगों को देश दुनिया कि खबरें पल भर में घर बैठे मिल जाती हैं. इसके बावजूद कई चुनौतियां हिंदी पत्रकारिता के सामने अभी भी मौजूद हैं.

उस्मानिया विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. किशोरी लाल व्यास ने आंध्र प्रदेश सरकार से मांग की कि उर्दू पत्रकार शोएबुल्लाह खान के नाम पर एक पुरस्‍कार की घोषणा की जाय. उन्‍होंने कहा कि बीस अप्रैल 1948 को हैदराबाद के युवा पत्रकार, जो इमरोज नामक अखबार के संपादक भी थे, को किस तरह निजामों के रजाकारों ने सरे शाम उस समय मौत के घाट उतर दिया था, जब वह अपना प्रेस बंद कर घर लौट रहे थे. उनकी गलती शायद यह थी कि वे निजाम कासिम रिज़वी व उनके रजाकारों के खिलाफ निर्भीक हो कर अपने अखबार "इमरोज" में लिखा करते थे तथा गांधी भक्त थे. उन्होंने इस बात को भी स्वीकारा कि हिंदी पत्रकारिता के सामने कई चुनौतियां अभी भी हैं.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भविष्य निधि कार्यालय के आयुक्त मोहमद एच. वारसी ने कहा कि हिंदी व हिंदी पत्रकारिता के सन्दर्भ में मुझे दक्षिण में लोग अधिक दिखाई दे रहे हैं. यह हिंदी भाषा व हिंदी भाषियों के लिये गर्व की बात है. इस मौके पर राजीव दुआ, राज कुमार सूबेदार, घनश्याम पाण्डे, पावन पाण्डे, बाबुराव, महावीर जैन, गन्नू कृष्णा मूर्ति, श्रीमती ज्योत्सना शर्मा, संजीता मुंदरा आदि ने अपने विचार रखे.

इस अवसर पर डॉ.किशोरी लाल व्यास, डॉ ओ.एम शेख, संतोष कुमार एवं श्रीमती संतोष कौर को वर्ष 2010 के लिय इंदूर हिंदी सम्मान से सम्मानित भी किया गया. इन्‍हें शाल, श्रीफल स्मृति चिन्ह एवं सम्मान-पत्र प्रदान किया गया. उल्लेखनीय है कि यह सम्मान हर वर्ष पांच हिंदी सेवियों को हिंदी में किये गए उल्लेखनीय कार्य के लिये प्रदान किया जायेगा. इस मौके पर इंदूर हिंदी समिति द्वारा पर्यावरण पर लिखी डॉ.किशोरी लाल व्यास कि पुस्तक "जंगलों को गाने दो" का विमोचन प्रदीप श्रीवास्तव ने किया.

निजामाबाद से कुसुम श्रीवास्तव की रिपोर्ट.


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