पचास साल का दूरदर्शन लोगों के सबसे निकट

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दूरदर्शन भारत में दूरदर्शन के पचास वर्ष पूरे के उपलक्ष्य में देशभर में मनाए जा रहे स्वर्ण जयंती समारोह के संदर्भ में चंडीगढ़ में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। पंजाब विश्वविद्यालय के सभागार में हुए राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार में वक्ताओं ने दूरदर्शन के पचास वर्ष के लेखे-जोखे को विस्तार से बताया वहीं आज चैनलों की गलाकाट स्‍पर्धा में भारतीय संस्कृति को बचाए रखने में दूरदर्शन की महिमा बताई गई।

सेमिनार में हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाडिय़ा, भाषा अकादमी के चेयरमैन और प्रख्यात हिंदी लेखक और आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह, पंजाब विवि के कुलपति आरसी सोबती और चंडीगढ़ दूरदर्शन के निदेशक डा. कृष्णकुमार रत्तू ने अपने-अपने ढंग से -भारत और दूरदर्शन विषय पर बताया।

राज्यपाल जगन्नाथ पहाडिय़ा ने कहा कि भारत में दूरदर्शन आज भी सबसे विश्वसनीय सूचना और मनोरंजन का केंद्र है। आज सैकड़ों चैनलों की बाढ़ के बावजूद दूरदर्शन ने अपनी पहचान बनाए रखी है। जिस उद्देश्य को लेकर इसे शुरू किया गया था वह इसमें पूरी तरह से सफल रहा है और उम्मीद है कि इस परंपरा को बनाए रखेगा। उन्होंने कहा कि भारत की अलग सभ्यता और संस्कृति है, कुछ सामाजिक मूल्य भी हैं, इन्हें बनाए रखना बेहद जरूरी है क्योंकि इससे देश की पहचान है। सामाजिक मूल्यों को कायम रखने और संस्कृति को बचाए रखने में अगर किसी का सबसे बड़ा योगदान है तो वह दूरदर्शन ही है।

भाषा अकादमी के चेयरमैन और हिंदी के प्रख्यात आलोचन प्रो. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि दूरदर्शन के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि समय के हिसाब से इसने भी अपने को बदला है, लेकिन उतना नहीं जिससे अपसंस्कृति हो। कार्यक्रमों में सौम्यता होने की वजह से आज भी परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर इसके कार्यक्रम देख सकते हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में जितने ज्यादा चैनल उतनी ज्यादा जानकारी और भरपूर मनोरंजन की बात ठीक है पर वे दिखा क्या रहे हैं और हम देख क्या रहे हैं।

उन्होंने कहा कि दूरदर्शन को समाज के उस वर्ग की आवाज बनना होगा जो उपेक्षित है, बेशक ऐसा हो भी रहा है लेकिन इसे और विस्तार देने की जरूरत है। भारत में दूरदर्शन ने पचास साल पूरे कर लिए हैं। इस आधी सदी में उसने मनोरंजक कार्यक्रम, ज्ञानवर्द्धक जानकारी या फिर देश-विदेश के समाचार आदि से अपनी अलग पहचान बनाई है और यह सिलसिला इसी तरह चलता रहेगा। उन्होंने कहा कि समाज का एक वड़ा वर्ग अब भी मीडिया से दूर है जबकि उसे अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने में कोई सहायक चाहिए। कहा कि अगर दूरदर्शन इस वर्ग की आवाज बने तो निसंदेह यह अपने में बड़ा काम होगा।

दूरदर्शन

पंजाब विवि के कुलपति आरसी सोबती ने दूरदर्शन के सफलता से पचास वर्ष पूरे होने को एक उपलब्धि बताते हुए कहा कि आज चैनलों की भीड़ में यह प्रमुख नहीं है, लेकिन बावजूद इसके वह आम भारतीय के दिल में बसता है और उसके भरोसे पर खरा है। उन्होंने कहा कि हाल ही में पंजाब विवि को देश के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में ऊपर रखा गया है, उसी तरह से चैनलों की रेलमपेल में दूरदर्शन भी अव्वल है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम कराए जाते रहने चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वर्ण जयंती का यह समारोह पंजाब विवि में हो रहा है यह इसके लिए सम्मान की बात है।

चंडीगढ़ दूरदर्शन के निदेशक डा. कृष्ण कुमार रत्तू ने कहा कि स्वर्ण जयंती समारोह पूरे देश में धूमधाम से मनाए जा रहे हैं। उन्हें इस बात की खुशी है कि आज भी दूरदर्शन लोगों के भरोसे का सबसे बड़ा केंद्र और माध्यम है। पचास साल पहले भी यही बात है और आज भी यही है। उन्होंने कहा कि सामाजिक सरोकारों को सहेजने और भारतीय संस्कृति को बनाए रखने और इसे प्रदूषित होने से बचाए रखने में दूरदर्शन की बड़ी महिमा है। उनके मुताबिक आज भी देश के 94 प्रतिशत लोग दूरदर्शन देखना पसंद करते हैं, इसकी कई वजहें हो सकती हैं, जिसमें इसकी विश्वसनीयता और इसकी साख है।

उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ दूरदर्शन केंद्र जल्द ही अप्रवासी भारतीयों और युद्ध विधवाओं पर आधारित कार्यक्रम -बात वतन की- शुरू करेगा। इसमें विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को आने वाली समस्याओं और हो रही दुश्वारियों को बताया जाएगा। उन्हें उम्मीद है कि यह कार्यक्रम बेहद सफल रहेगा। उन्होंने कहा कि समाज के हर वर्ग की आवाज बनने के लिए दूरदर्शन ने हमेशा प्रयास किया है और उसे काफी हद तक इसमें सफलता भी मिली है।

उनके अनुसार दूरदर्शन चैनलों की अंधी दौड़ में शरीक नहीं है, उसकी अलग पहचान थी और आज भी है कल भी रहेगी। आम आदमी के अधिकारों की बात हो या फिर भारतीय संस्कृति को बचाए रखने और सामाजिक सरोकारों को कायम रखना सभी में दूरदर्शन केंद्र सफल रहा है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि दूरदर्शन भारत की पहचान को बनाए रखने में इसी तरह से योगदान देता रहेगा।

चंडीगढ़ से महेन्‍द्र सिंह राठौड़ की रिपोर्ट.


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