संसद घेरना, अदालत में गुहार जरूरी : नैयर

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नई दिल्‍ली. राष्‍ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारिता बचाओ के तहत हुए आयोजन में ज्‍यादातर की राय थी कि देश में बहुसंख्‍यक लोगों को आज भी भरोसा प्रिंट मीडिया पर ही है इसलिए इसे बचाए रखने के लिए सभी मीडियाकर्मियों को एकजुटत होना होगा. पूर्व सांसद और वरिष्‍ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने कहा कि वे जब पत्रकारिता में थे तब आज की अपेक्षा बेहतर माहौल था. आज वे ठेके पर पत्रकारों की नियुक्ति और विविध स्‍तरों पर पेड न्‍यूज का बोलबाला देख रहे हैं, उस पर उन्‍हें आश्‍चर्य है.

ऐसे में जरूरी है कि देश में मजबूत लोकतंत्र की खातिर प्रिंट, विजुअल और वेब से जुड़े तमाम मीडियाकर्मी न केवल प्रेस की निष्‍पक्षता बल्कि अपने पेशे में भी अच्‍छा कर पाने के लिए हावी दिखें. उन्‍होंने कहा कि इसके लिए बहुआयामी संघर्ष को छेड़ना होगा. जिसमें संसद को घेरना और अदालतों में न्‍याय की गुहार लगानी पड़ सकती है. उनकी बात का समर्थन दिल्‍ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स (डीयूजे) के महासचिव एसके पांडे और अध्‍यक्ष सुजाता मधोक ने किया.

नैयर केरल भवन में डीयूजे व डीएमसीटी की ओर से प्रकाशित 'प्रेस फॉर सेल : वाच डाग अनमास्‍कड' (बिकाऊ है प्रेस : पहरेदार का हुआ पर्दाफाश) पुस्तिका का लोकार्पण कर रहे थे. उन्‍होंने कहा कि प्रेस को हर हाल में व्‍यवस्‍था विरोधी होना चाहिए. प्रेस आज आजाद कतई नहीं है, यह निष्‍पक्ष हो सकता है लेकिन आजाद नहीं है. ऐसे में हमें यह सोचना होगा कि ऐसे इसे लोकतंत्र की रक्षा की खातिर बचाया जाय. उन्‍होंने कहा, यह जरूरी है कि भारत सरकार मीडिया पर एक व्‍यापक आयोग नियुक्‍त करे. मैं मानता हूं‍ कि प्रेस को निडर, मजबूत और प्रमाणिक बनाने के लिए न केवल सत्‍ता बल्कि विपक्ष के जनप्रतिनिधि भी इस आंदोलन में पत्रकारों के साथ होंगे. उन्‍होंने कहा कि आपातकाल के बाद प्रेस को वाकई आजादी मिली थी. लेकिन समय के साथ अखबार मालिकों के नजरिए में आए बदलाव के चलते लोकतंत्र का यह चौथा खंभा अब खासा दरक गया है. इसे बचाने की जिम्‍मेदारी अब पत्रकारों पर है. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कहा करते थे कि लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए विपक्ष नहीं बल्कि एक मजबूत मीडिया जरूरी है.

पेड न्‍यूज मामले की छानबीन के लिए प्रेस कौंसिल आफ इंडिया की ओर से बनी दो सदस्‍यीय कमेटी के एक सदस्‍य प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने कहा हमने इस संबंध में पूरे देश का दौरा किया. कई सौ लोगों से बातचीत की. राजनीतिक लोगों ने बताया कि किस तरह चुनावों में प्रचार के लिए उनसे पैसों की फरमाइश की गई. कुछ ने फरमाइश पूरी की. उन्‍होंने सबूत भी दिए. लेकिन हमारी पैंतीस हजार शब्‍दों की रपट समांतर प्रेस परिषद ने दबावों के तहत पैंतीस सौ शब्‍दों में एक दूसरी रपट तैयार की और जारी कर दी.

उन्‍होंने इस बात पर अफसोस जताया कि ज्‍यादातर जिलों में उन्‍होंने ऐसे संवाददाता पाए जिन्‍हें पारिश्रमिक बतौर या तो कुछ भी नहीं था या फिर महज पांच सौ रुपये मासिक तौर पर मिलते हैं और उसके अलावा उन पर विज्ञापन लाने का दबाव होता है. ऐसे में वे पेड न्‍यूज के सहायक हो जाते हैं.

डीयूजे के महासचिव एसके पांडे ने कहा कि रविवार को इसी विषय पर हिंदी में जारी हुई राम बहादुर राय की संपादित पुस्‍तक 'काली खबरों की कहानी' खासी महत्‍वपूर्ण है. उन्‍होंने कहा कि पत्रकारिता से जुड़े तमाम मीडियाकर्मियों से मिलकर एक संयुक्‍त मोर्चा बनाना चाहिए जिससे देश में लोकतंत्र के चौथे के तौर पर प्रेस का महत्‍व बना रह सके और उसे खरीद सकने का दंभ तोड़ा जा सके.

वक्‍ताओं से श्रोताओं की बातचीत में भी कई महत्‍वपूर्ण बातें उभरीं. मसलन पेड न्‍यूज अब राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों में बारहमासा परिदृश्‍य है, जिसमें खासी विविधता और विभिन्‍न स्‍तर हैं. अब यह व्‍यवस्‍था का अहम हिस्‍सा बन गया है. इस पर नैयर ने कहा- हमें अपनी पिछले संघर्षों को याद रखना चाहिए. चाहे वह आपातकाल हो या फिर बिहार प्रेस बिल. अदालतों ने भी मीडिया का पक्ष ही लिया है. लेकिन प्रयास हमें ही करना पड़ेगा. वह भी एकजुटता के साथ. श्रोताओं में अंजलि देशपांडे, मृणाल वल्‍लरी, मोहन कुमार आदि ने अपनी जिज्ञासाएं रखीं.  साभार : जनसत्‍ता


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