भाषा का क्रियोलीकरण साजिश है या इस मुद्दे को उछालना!!

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: अख़बारों की भूमिका पर जम कर हुई बहस : कोलकाताः 'भाषा का क्रियोलीकरण और अखबारों की भूमिका' विषय पर 'अपनी भाषा' संस्था ने अपने दसवें स्थापना दिवस पर संगोष्ठी 4 दिसम्बर 2010 को आयोजित की। यह भारतीय भाषा परिषद के सभागार में अपराह्न 3.30 बजे शुरू हुई जिसकी अध्यक्षता ललित निबंधकार एवं पत्रकारिता पर ग्रंथ लिखने वाले डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र ने की।

विषय प्रवर्तन संस्था के महासचिव डॉ. ऋषिकेश राय ने किया और क्रियोल तथा क्रियोलीकरण के अर्थ से लोगों को परिचित कराया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विवेक कुमार सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन किया डॉ. वसुमति डागा ने। वक्ता थे ताजा टीवी के संचालक व छपते छपते दैनिक के प्रधान सम्पादक विश्वंभर नेवर, जनसंसार साप्ताहिक के सम्पादक गीतेश शर्मा, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के रीडर डॉ. आलोक पाण्डेय तथा सन्मार्ग के वरिष्ठ उप-सम्पादक डॉ. अभिज्ञात। डॉ. अभिज्ञात ने कहा कि भारत में नगालैंड की 18 बोलियों को मिला कर जो सम्पर्क भाषा बनायी गयी है उसे नगमीज कहते हैं। वह अपने देश की हाल ही में बनी क्रियोल भाषा है, जिसकी लिपि रोमन है। कोंकणी को भी रोमन लिपि में लिखे जाने का निर्णय लिया गया है। वहां पुर्जगीज और कोंकणी भाषा का क्रियोल है। गुयाना में 43 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं वहां देवनागरी की जगह रोमन लिपि को चलाया गया है। इन सबकी अपनी-अपनी वजहें हैं।

भारत जैसे देश में क्रियोलीकरण का हव्वा खड़ा किया जा रहा है और वस्तुस्थिति को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है। हिन्दी अख़बारों में लाइफ स्टाइल या यूथ प्लस के नाम पर फ़ीचर सप्लीमेंट दिये जा रहे हैं उनमें हिंगलिश अर्थात हिन्दी अंग्रेजी की खिचड़ी भाषा दी जा रही है तो इसका मतलब इस बात नहीं निकाला जाना चाहिए कि अख़बार अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का बढ़ावा देने के किसी षड़यंत्र में शामिल हैं। यह उस युवा पीढ़ी को हिन्दी अख़बार से जोड़ने का उपक्रम है जो हिन्दी भाषी परिवारों में अंग्रेजी मीडियम में अध्ययन कर रहे हैं। हिन्दी अख़बार दरअसल किसी घर में व्यक्ति विशेष के लिए नहीं आते। दैनिक हिन्दी अखबार पूरे परिवार द्वारा पढ़े जातें हैं जिसमें हर आयु व रुचि के लोग होते हैं। यदि उसमें गंभीर समाचार व विश्लेषणपरक लेख होते हैं तो सप्लीमेंट में लतीफे और कविताएं भी होती हैं और कहानिया तथा सुडोकू भी।

पकवान की विधि भी होती है और राशिफल भी। शेयर के रेट भी होते हैं, बच्चों के लिए रंग भरने के लिए चित्र भी होते हैं। अब यदि युवा पीढ़ी के लिए अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी का सप्लीमेंट युवाओं के टेस्ट को ध्यान में रखकर निकलने लगा तो हाय तौबा मच गयी। और कहा जा रहा है कि साहब यह तो हिन्दी का क्रियोलीकरण किया जा रहा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि एक मिथ्या 'यूथ-कल्चर' बनाया जा रहा है जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ा जाये जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वह अंग्रेजी के नये उपनिवेश के शिकंजे में आ जाये। वह परम्परच्युत हो जाये और अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझने लगे। इससे पूरी की पूरी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन ली जायेगी। हिन्दी का हिंग्लिश बनाना उसका वैसा ही क्रियोलीकरण है, जैसा पहले फ्रांस या इंगलैंड का उपनिवेश रह चुके कैरेबियाई देशों की भाषाएं हैं। यहां यह गौरतलब है कि जिन देशों में जिन स्थितियों में भाषाओं का क्रियोलीकरण संभव है वैसे हालत फिलवक्त भारत के नहीं हैं।

यह भी सही है बाजार के कारण दो भाषाओं के बीच के आदान-प्रदान से भाषा का जो क्रियोलीकरण होता है उसकी जड़ें गहरी नहीं होतीं उस भाषा में साहित्य संस्कृति जैसे मुद्दों पर विचार संभव नहीं। किन्तु यह नहीं भूलना होगा कि भारत में ऊर्दू भाषा फारसी खड़ी बोली के क्रियोल का ही उदाहरण है। और किन्हीं अर्थों में अपनी यह हिन्दी भी खड़ी बोली, भोजपुरी, ब्रजभाषा अवधी जैसी बोलियां का क्रियोल हैं। भारत में विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग रहते हैं उनके बीच के सांस्कृतिक आदान-प्रदान में दरअसल क्रियोल ही है। हमारा देश क्रियोलीकरण की शक्ति का परिचायक है। हमारे बीच क्रियोलीकरण के मुद्दे विद्वेषपूर्ण ढंग से प्रचारित करने की साजिश क्यों और किससे इशारे पर की जा रही है इस पर भी गौर करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार के उदाहरण देकर क्रियोलीकरण की प्रक्रिया को समझाया जा रहा उससे यह प्रवृत्ति जोर पकड़ेगी की हमें अपनी भाषा और संस्कृति में दूसरी भाषा व संस्कृति के दरवाज़े बंद कर लेने हैं या उन्हें खोज-खोज कर बाहर का रास्ता दिखाकर शुद्धिकरण करना है तो पूरा देश सांस्कृतिक वैमनस्य में जलने लगेगा। इस आग लगाने की साजिश से भी सावधान रहने की ज़रूरत है।

यह गौरतलब है कि क्रियोलीकरण से सजग करने वाले हमारे हितैषियों का मुख्य लक्ष्य भारतीय भाषाओं का अंग्रेजी के साथ क्रियोलीकरण के खिलाफ है। जब क्रियोलीकरण खतरनाक है तो चाहे जिसके किसी के बीच हो वह समान रूप से खतरनाक होगा ऐसा क्यों नहीं कहा जा रहा है। उसका कारण साजिशकर्ता शक्तियों के अपने हित हैं। ये साजिशकर्ता हमें यह याद दिलाना नहीं भूलते कि हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत ही अंग्रेजी को भारत से खदेड़ने की प्रतिबद्धता से हुई थी। वे यह भूल जाते हैं कि उसे समय हमारा देश अंग्रेजी शासन का गुलाम था और अंग्रेजी हम पर हुकूमत करने वालों की भाषा थी इसलिए हुक्मरानों की भाषा का तिरस्कार भी हुक्मरान का तिरस्कार था। वरना अंग्रेजी भाषा से किसी का क्या विरोध होता और क्यों होता। किन्तु आज स्वतंत्र भारत में हम पर हुकूमत करने वालों की भाषा नहीं है बल्कि वह मित्र राष्ट्र की भाषा है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल ही भारत दौरा किया है और हमारे मैत्रिपूर्ण सम्बंध और गहराये हैं जो परमाणु समझौते से शुरू हुए थे। भारत और अमरीकी की बढ़ती करीबी एक ऐसे देश को खल रही है जो भारत के समान ही विश्व की उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा रहा है।

भारत और चीन दोनों के पास बाजार की विपुल संभावनाएं हैं और विश्व के सर्वशक्तिमान देश स्वयं अमरीका ने स्वीकार किया है कि आने वाले दिनों में चीन और भारत की ऐसे देश हैं जिनसे उसे कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में अमरीका की भारत के साथ करीबी चीन की अपनी कूटनीति के विरोध में जाती है और जवाब में वह हमारे पड़ोसी शत्रुराष्ट्र पाकिस्तान के साथ अपनी करीबी बढ़ाता रहता है। यह स्वाभाविक है कि वह ऐसी चालें चले जिससे भारत के लोग अमरीका से भड़कें।

हाल की ओमाबा की यात्रा के बाद आर्थिक लेन देन और व्यापार की बढ़ती सम्भावनाएं दोनों देशों को सांस्कृतिक स्तर पर भी करीब लायेंगी। ऐसे में अंग्रेजी और रोमन लिपि के प्रति भारतीय लोगों के मन में आशंका के बीज रोपने की साजिश चीन करें तो इसमे कोई हैरत नहीं। इससे एक पंथ-दो काज संभव है एक रोमन लिपि के प्रति विद्वेष की भावना पैदा कर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक करीबी की संभावनाओं को क्षीण करना दूसरे आवश्यकनासुर भारत को भाषाई और सांस्कृतिक वैमनस्य की आग में झोंककर उसकी आंतरिक शक्ति को विखंडित करना। भारत चूंकि साझी संस्कृति का देश है इसलिए सांस्कृतिक अलगाव और संकीर्णता उसके विकास को आसानी से अवरुद्ध कर सकता है। अभी तो भाषा के क्रियोलीणकर का खतरा दिखाया जा रहा है बाद में सांस्कृतिक क्रियोलीकरण तक बात पहुंचेगी और साजिश के तहत इस बात की गणना करायी जाने लगेगी कि भारत की किस भाषा में भारत की ही किस भाषा के कितने शब्द हैं और इससे कैसे एक भारतीय मूल भाषा भाषा ने दूसरी भाऱतीय मूल भाषा को विकृत किया है। हमारी शक्तियों को हमारी विकृति की संज्ञा दी जाने लगेगी और हमारे अवचेतन में उसे बैठा दिया जायेगा।

इसलिए दोस्तो यह समझने की जरूरत है कि कहीं चोर दरवाज़े से हमें तोड़ने की साजिश तो नहीं रची जा रही है। पहला हमला लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर किया गया हैं, जो देश को तोड़ने वाली ताकतों की शिनाख्त करता है। मीडिया पर पहला अपना निशाना इसलिए साधा गया है ताकि वह बचाव मुद्रा में रहे और उसे भाषा व संस्कृति की चिन्ता करने वाले प्रबुद्ध वर्ग का भी समर्थन प्राप्त हो सके। प्रबुद्ध वर्ग को यह समझाना बहुत आसान है कि अखबार भाषाई विकृति फैला रहे हैं लेकिन आरोप लगाने वालों के इरादे कितने संगीन हैं इस पर भी बौद्धिक लोगों को गौर करना पड़ेगा वरना वह दिन दूर नहीं जब क्रियोलीकरण का खतरा दिखाकर देश को परस्पर वैमनस्य की आग में झोंक दिया जायेगा। इस प्रकार क्रियोल भाषा का संकट वहां का संकट है जहां प्रवासी लोग रहते हैं। वह भी वे प्रवासी जो अपनी जड़ों से किसी हद तक कट चुके हों। और दो या विभिन्न भाषा से जुड़े लोगों का लगातार सम्पर्क बनता है।

इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को हम मुगलकालीन परिस्थियों में देखते हैं तो पाते हैं कि फारसी और खड़ी बोली हिन्दी के क्रियोल से हमारे यहां दो नयी भाषाओं ने जन्म लिया। फारसी व्याकरण व शब्दों व खड़ी बोली से उर्दू बनी और खड़ी बोली और संस्कृत व्याकरण से हिन्दी। कहना न होगा कि आज की जो हिन्दी है वह किसी हद तक क्रियोल ही है। जिसमें भोजपुरी, मगही, ब्रज भाषा, राजस्थानी, हरियाणवी आदि के शब्द मिले हुए हैं और मराठी, गुजराती, पंजाबी आदि के भी कई शब्द हैं। यहां देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने वाले हिन्दी भाषी लोग वहां की भाषा के शब्दों को भी हिन्दी में समाहित कर लेते हैं। और हिन्दी के शब्द वहां की भाषा को दे देते हैं। यहां कई बंगला के शब्दों को हम धड़ल्ले से हिन्दी में भी प्रयोग कर लेते हैं। साहित्य की दुनिया में भले ऐसे प्रयोग कम हों लेकिन बोलचाल वाले इससे कतई परहेज नहीं करते। बंगला वाले भी हमारी भोजपुरी के शब्दों के अपनाते हैं। हमारा देश मिली जुली संस्कृतियों और कई भाषाओं का देश है। और यहां की भाषा पर दूसरी भाषाएं भी स्वाभाविक तौर पर प्रभाव डाल सकती हैं तो इसे हम अपनी खूबी मानते हैं। ध्यान रहे कि क्रियोल के बहाने भाषा के नाम पर फसाद की तैयारी चल रही है।

क्या हम भाषा के नाम पर सिरे से फसाद को तैयार हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज हम यह कहकर विरोध शुरू करें कि अंग्रेजी के शब्द हिन्दी को भ्रष्ट कर रहे हैं और कल कहें कि हमारी हिन्दी को बंगला भ्रष्ट कर रही है और बंगला कहे कि हमारे शब्दों को हिन्दी डस रही है। यदि हम अंग्रेजी के प्रयोग को उसका साम्राज्यवादी ढर्रा कहेंगे तो कल को हिन्दी पर भी हमारे देश की दूसरी भाषाएं ऐसा आरोप लगा सकती हैं। भाषाओं पर बांध बनाकर ऊर्जा पैदा नहीं की जा सकती। भाषा प्रवाह का नाम है। प्रयोग ही भाषा को जीवंतता प्रदान करता है। भाषा अपने पाठक खोकर अपना शुद्ध रूप भले बचा ले लेकिन जो भाषा को अपनी अस्मिता का प्रश्न नहीं मानते बल्कि स्वयं की अभिव्यक्ति का साधन मानते हैं वे आवश्यकता के अनुसार भाषा को बदलेंगे तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता। क्या हम चाहकर भी आज पत्र लेखन को बचा पाये। नहीं। टेलीफोन के प्रचार प्रसार ने उसे खतरे में डाल दिया है। ईमेल और एसएमएस ने इसमें योगदान किया। हम खतों को बचाने के लिए लोगों के हाथ से टेलिफोन, ईमेल, एसएमएस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। जो इनसे बचेंगे वे स्वयं दरकिनार कर दिये जायेंगे।

पाण्डुलिपियां खतरे में हैं। आज लेखक सीधे कम्प्यूटर पर लिख रहे हैं। वह सुविधाजनक हो गया है। अब हाथ से लिखने में दिक्कत हो रही है। हस्ताक्षर के अलावा लिखित प्रयोग कम ही बचे हैं। हस्तलिपियां खतरे में हैं। शिलालेखों और ताम्रपत्रों पर लेखन जैसे खत्म हो गया संभव हैं आज लिखने का ढर्रा भी लुप्त हो जाये। अभिव्यक्ति के तरीके बदलेंगे। भाषा बदलेगी। अंदाज बदलेगा। तालमेल बिठाना होगा। क्रियोल की समस्या प्रवासी समुदायों की समस्या है। हमारे देश में यदि विभिन्न भाषाओं के लोग आयेंगे हमारा सम्पर्क होता तो भाषा का क्रियोलीकरण संभव है। हम दूसरे देश में जायेंगे तो यही होगा। यह मुल्क प्रवासी नहीं होने जा रहा। हमारी जड़ें गहरी हैं। दूसरे देश की समस्या को अपने यहां लागू करने का कोई अर्थ नहीं है। मिश्रित भाषा में कुछ सफे अखबार दे रहे हैं कुछ पत्रिकाएं भी संभव है आयें। लेकिन वे गहरे सरोकारों वाली पत्रिकाएं नहीं हैं। वे लाइफ स्टाइल से जुड़ी होती हैं या उन बच्चों युवाओं को सम्बोधित होती हैं तो अंग्रेजी पढ़े लिखे हैं। कोई अखबार हर तरह के पाठक को बांधे रखना चाहता है या जुड़ना चाहता है तो इसके लिए इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं। यह प्रयोग बहुत सफल नहीं होंगे क्योंकि क्रियोल भाषा के लिए दोनों भाषाओं की जानकारी आवश्यक है। लेकिन प्रयोग का होना गलत नहीं है। कोई अखबार लतीफे भी छापता है तो वह पूरा अखबार लतीफा नहीं बनाना चाहता। विविधता अखबार में होती है होनी भी चाहिए।

विश्वम्भर नेवर ने कहा कि भाषा के क्रियोलीकरण को विकराल समस्या के रूप में न लें। अंग्रेजी अखबारों में भी यह प्रचलन बढ़ा है और हिन्दी के शब्द हेडिंग तक में कई बार प्रयुक्त होते देखे गये हैं। धक धक गर्ल जैसे मुहावरों को इस्तेमाल हो रहा है। इसे दो भाषाओं के करीब आने के रूप में आने के सहज रिश्ते के रूप में देखा जाना चाहिए। विज्ञापनों के बढ़ते प्रभाव व दबाव के कारण भी हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बढ़ा है दूसरे अंग्रेजी पढेलिखे लोग भी हिन्दी पत्रकारिता खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया में आ रहे हैं और वे बातचीत में सहज रूप से अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल भी करते हैं। डॉ. आलोक पाण्डेय ने कहा कि ग्रेट अमेरिकन ड्रीम अब ग्रेट अमेरिकन नाइटमेयर में बदल चुका है। अमेरिका भोगवादी संस्कृति को बढ़ावा देता रहा है। और वह नवधनाढ्यों और मध्य वर्ग को विलासितापूर्ण जीवनशैली को बढ़ावा देकर भारत में अपना बाज़ार तैयार करने में जुटा है। भाषा का क्रियोलीकरण उसी का एक हिस्सा है। भागवादी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ही उसने आईएमएफ और डब्ल्यूटीओ की नीतियों को अनुकूलति किया है। वह अपने ग्राहकों का भी मानसिक अनुकूलन करना चाहता है।

गीतेश शर्मा ने कहा कि अंग्रेजी हिन्दी को क्या विकृत करेगी। स्वयं अंग्रेजी के दो रूप हैं एक यूरोप की दूसरी अमरीकी। अमरीकी अंग्रेजी ने स्वयं अंग्रेजी को विकृत किया है। अंग्रेजी स्वयं शुद्ध भाषा नहीं है उसमें लगभग सत्तर प्रतिशत शब्द दूसरी भाषाओं के हैं। अंग्रेजी के शब्दकोष उदारता पूर्वक दूसरी भाषा के शब्द लेते हैं उसकी बाकायदा घोषणा तक करते हैं। हिन्दी के कई शब्द अंग्रेजी ने लिये हैं। अंग्रेजी की तुलना में फ्रेंच भाषा में शुद्धता पर अधिक जोर दिया जाता है। हिन्दी को लादने का प्रयास नहीं होना चाहिए। कई शब्द ऐसे प्रयोग में आ रहे हैं जिनका अर्थ समझ में नहीं आता। हिन्दी ऐसी होनी चाहिए कि वह समझ में आये। कोई भाषा जब तक जीविका से नहीं जुड़ती उसे सरकारी संरक्षण अधिक दिन तक नहीं बचा सकता। डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने कहा कि यह साधारण मसला नहीं है। यह संस्कृति से गहराई तक जुड़ा है। जागरुकता के अभाव में यह संकट पैदा कर सकता है। हिन्दी की मूल प्रवृत्ति को यह विकृत करने का प्रयास है। अखबार के पत्रकार और सम्पादक अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकते। हिन्दी का विपुल पाठक वर्ग है इसलिए हिन्दी पत्रकार की ज़िम्मेदारी भी बड़ी है। पत्रकार लोकनायक होता है। उसे सही दिशा दिखानी होगी। निश्चित रूप से भाषा का क्रियोलीकरण चिन्ता का विषय है।

कोलकाता से डा. अभिज्ञात की रिपोर्ट


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