आदिवासियों की कीमत पर न हो देश का विकास

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आदिवासी: सम्‍मेलन में आदिवासियों की समस्‍याओं पर विचार-विमर्श : आदिवासी समाज दशा और दिशा विषय पर दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आरंभ ठंडी हवा के थपेड़ों के बीच हाड़ौती के राजकीय महाविद्यालय बूंदी में झारखंड से सांसद डॉ. रामदयाल मुंडा के बांसुरी वादन की गूंज के साथ हुआ। झारखंड के आदिवासियों के बीच 'एक एक्टिविस्ट के नोट्स' के लेखक प्रोफेसर वीरभारत तलवार के अंतरंग अनुभूतियों, अनुभवों तथा 'युद्धरत आम आदमी' की संपादिका रमणिका गुप्ता के मुख्य आतिथेय में कई सवाल उठे और कई बार बहस व विमर्श हुआ।

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आरके दुबे व व्यवस्था में लगे मेजबानों की सभी बाहर से आने वाले प्रतिभागियों ने प्रशंसा की। देश के सुदूर प्रदेशों से आये प्रतिभागियों, शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों का जमावड़ा बुन्दा मीणा की धरती पर था, जिसमें आदिवासियों की अधिकांश बातों पर गहन विचार विमर्श हुआ, जिसमें कोई पांच दर्जन से अधिक पर्चे पढे़ गए।

कार्यक्रम का उद्घाटन झारखंड से आये सांसद डॉ रामदयाल मुंडा ने बिरसा मुंडा की तस्वीर पर माल्यार्पण करके किया। डॉ सीमा कश्‍यप ने अतिथियों का परिचय दिया। डॉ. चमन शर्मा रतलाम ने संचालन किया और प्राचार्य डॉ. आरके दुबे ने स्वागत भाषण और उपाचार्य डॉ. डीके जैन ने धन्यवाद दिया। संचालक ने आदिवासियों को कटी पतंग की तरह बताया, जबकि देश इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहा है। इसी दौरान डॉ. मुंडा ने अतिथियों के साथ डॉ. मणि भारतीय के द्वारा बनाए आदिवासी चित्र प्रदर्शनी व दिनेश कुमार वर्मा की उस पेटिंग, जो उन्होंने स्मारिका के मुखपृष्‍ठ के लिए बनाई है, का उद्घाटन भी किया।

डॉ. रामदयाल मुंडा ने बताया कि आज आदिवासी समाज अपने शोषण और गुलामी से मुक्त होने के लिए क्रांति की भाषा में बोलने पर उतारू है। साहित्य में हो रहा विमर्श एक रोशनी का काम करेगा। बड़ा समाज वह होता है जो अपने से छोटे को ऊपर उठता है। आदिवासी समाज हाशिए का समाज नहीं केंद्र का समाज है, ऐसा माने जाने पर योजना सफल होगी। बूंदी कान्फ्रेंस केवल इस शहर भर के लिए नहीं है, इसका महत्‍व शेष राष्‍ट्र के लिए भी है।

रमणिका गुप्ता ने बताया कि आज देश का विकास जिस दिशा में हो़ रहा है वह आदिवासियों के बिल्‍कुल अनुकूल नहीं है। जल, जंगल, जमीन आदिवासियों के लिए जीवन का पर्याय रहे हैं, लेकिन विकास की अंधी दौड़ ने आदिवासियों के जीवन आधारों को खत्म कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार नक्सलवाद को खत्म करने के लिए सलवा जुडूम खड़ा करती है। गरीबी, भूखमरी, सरकारी हिंसा और विस्थापन आदिवासियों की सबसे बड़ी त्रासदी है। मूल्यवान आदिवासी विरासत आज के तथाकथित आधुनिक समाज को दिशा दे सकती है। हमें उनके पास सीखने के लिए जाना चाहिए। जब तक आदिवासियों ने शांति से आंदोलन किया तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वे जागे, बंदूक उठायी तब समझ में आया। अंग्रेजों से न जाने कितनी बार आदिवासियों ने लड़ाई की, लेकिन इतिहास में उसका कोई जिक्र नहीं है। अब आदिवासी अपना इतिहास लिख रहे हैं। विशिष्‍ट अतिथि प्रो. वीरभारत तलवार ने बताया कि आदिवासी भारतीय समाज और राजनीति दोनों से उपेक्षित रहे हैं। यहां तक कि आदिवासी समाज की समस्याएं हिन्दुस्तान की किसी राजनीतिक पार्टी के एजेण्डे में नहीं है।

आदिवासी समाज सदियों मूक रहने से हाशिए पर रहता आया है। आयोजन सचिव रमेश चंद मीणा ने बताया कि अब इस आवाज को रोक पाना मुश्किल है। स्त्री और दलित विमर्श के बाद आने वाले नये विमर्श की आहट की एक कड़ी है यह संगोष्‍ठी। मानाकि आदिवासी पर आज कई तरह से सोचा-विचारा जा रहा है, लेकिन संविधान द्वारा प्रदत्‍त संरक्षण व कई योजनाओं के बावजूद इनकी स्थिति चिंतनीय कही जा सकती है। आजाद मुल्क में नागरिक आजादी तो तुरंत मिल गई पर सामाजिक व आर्थिक आजादी अभी मिलना बाकी है। बहुत-से समुदायों को देख कर कह सकते हैं कि आदिवासी के लिए आजादी जैसे शब्द का कोई अर्थ नहीं है। साहित्य में आदिवासी चरित्र यूं तो महाकाव्य काल से ही चित्रित होते रहे हैं, पर वहां उन्हें रीछ, बानर, भालू की श्रेणी में ही रख कर देखा-जाना गया है। आज स्थिति बदली है। पूर्वोत्‍तर से लेकर पश्चिम तक ऐसा साहित्य सामने आ रहा है,  जिससे लग सकता है कि आज नहीं तो कल आदिवासी साहित्य मुख्य विमर्श के रूप में हिंदी जगत में पूरे दमखम के साथ सामने आयेगा। युवा कवयित्री निर्मला पुतुल, वंदना टेटे, वाहरु सोनवणे और हरिराम मीणा की कविताएं घने अंधेरे कोहरे को चीरने में दीपक की किरण की तरह दिशा निर्देशित करती हैं। ‘अरावली उद्घोश’, ‘आदिवासी सत्‍ता’, ‘दलित आदिवासी विमर्श’ और ‘युद्धरत आम आदमी’ में लगातार प्रकाश में आ रही रचनाएं एक उभरती हुई प्रवृत्ति की तरफ इशारा करती हैं।

आदिवासी की आवाज मीडिया में न के बराबर ही उठ पा रही है। पत्रकारिता अपने मिशन से भटकी हुई है, उसका उद्देश्‍य व्यवसायोन्मुखी है, ऐसे में दैनिक ‘जनसत्‍ता’ में नक्सलवाद पर चली बहस इस बात का उदाहरण है कि इस घोर बाजारू दौर में सदियों से मूक रहे आदिवासी की आवाज बनने वाले पत्र मौजूद हैं। इनकी संख्या का कम होना भले ही चिंता का कारण अवश्‍य है। आज आदिवासी की आवाज का बाहर आना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्‍यक है। अगर किसी आवाज को लगातार दबाया जाता है तो निश्चित ही वह आवाज कुंद होकर अपना रूप बदलने के लिए विवश होती है। इस समय आदिवासी की बिगड़ी हुई आवाज के रूप में नक्सलवाद सभी के सामने हैं। लोकतंत्र सही मायने में तभी खरा उतर सकता है जब देश के सुदूर जंगलों में रहने वाला आदिवासी उस विकास की किरणों से प्रकाशित हो सके, न कि चौंधिया कर आंखे बंद कर ले। वैश्‍वीकरण ने आदिवासी के लिए चुनौतियों की लंबी दीवार खड़ी कर डाली है। आज हर तरफ विकास की बयार चल रही है। विकास की आंधी में कहीं कुछ पुराने पेड़ धराशायी न हो जाएं! विकास बेशक हो पर अंधानुकरण न हो। विकास की नई लकीर खींचने के लिए पुरानी लकीरों को न मिटाया जाए?

प्रोफेसर वीरभारत तलवार की अध्यक्षता में संपन्न हुए सत्र में केदार प्रसाद मीणा (संथाल ‘हूल’: एतिहासिक संदर्भ और मूल्यांकन) डॉ. विवेक कुमार मिश्रा (साहित्य की संस्कृति और आदिवासी समाज) डॉ. सीएल शर्मा (आदिवासी साहित्य : उभरती चेतना का कोलाज) डॉ. मनीषा शर्मा (इक्कीसवीं सदी के उपन्यासों में आदिवासी विमर्श) स्थानीय महाविद्यालय से डॉ. विजय लक्ष्मी सालोदिया, डॉ. अनीता यादव, लालचंद कहार और डॉ. सियाराम मीणा (गमना यथास्थितिवाद की जकड़न में) ने शोध-पत्रों का वाचन किया। इस सत्र में आदिवासियों के सामाजिक, राजनीति, सांस्कृतिक जीवन से जुड़े कई सवालों को सदन के सामने रखा। विषय प्रवर्तक प्रो. श्रवण कुमार मीणा ने बताया कि आदिवासी विमर्श अब साहित्य में अपनी जगह बना रहा है। उनकी आवाज अब कलमबद्ध हो रही है। उनके सदियों के दुख, दर्द, और शोशण की गाथा मुखर हो रही हैं। सत्र के मुख्य वक्ता गुलाब चंद पांचाल ने बताया कि आज आदिवासी शब्द की जगह राजनीतिक कुचक्र के साथ वनवासी शब्द का प्रयोग किया जा रहा है, जो ठीक नही है। आदिवासी शब्द को संवैधानिक मान्यता दिलाई जानी चाहिए।

प्रो. वीरभारत तलवार ने विविध आदिवासी भाषाओं में रचे जा रहे आदिवासी साहित्य पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डालते हुए कहा कि आदिवासी साहित्य उनकी संस्कृति अस्मिता का साहित्य है। प्रो. तलवार ने बताया कि गैर आदिवासी लेखक आदिवासी द्वंद्व को नहीं पकड़ पा रहे हैं, यहां तक कि प्रसिद्ध बांग्ला लेखिका महाश्‍वेता देवी की रचनाएं आदिवासी क्षेत्रों के ट्रिप लगाने के बाद लिखीं गई सतही रचनाएं है। उन्होंने मिजो आदिवासियों पर लिखे श्रीप्रकाश मिश्र के उपन्यास ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ को आदिवासी जीवन पर लिखा श्रेष्‍ठ उपन्यास बताया तो गोपीनाथ महांती के 'अमृत संतान' को आदिवासी कंध जीवन को नजदीक से देखने वाला बेजोड़ रचना बताया और निर्मला पुतुल और हरिराम मीणा को आदिवासी जीवन को गहराई से चित्रित करने वाला कहा।
आगरा से पधारे प्रसिद्ध साहित्यकार पुन्नी सिंह की अध्यक्षता में द्वितीय तकनीकी सत्र आरंभ हुआ विषय प्रवर्तक रहे उदयपुर से पधारे डीएस पालीवाल, मुख्य वक्ता राजाराम भादू संपादक ‘‘संस्कृति मीमांसा’’ जयपुर थे। इस सत्र में 19 पत्र-वाचकों द्वारा अपने शोध पत्रों का वाचन किया गया। दूसरे दिन का तृतीय तकनीकी सत्र 15 दिसंबर को युद्धरत आम आदमी की संपादिका रमणिका गुप्ता की अध्यक्षता में ‘आदिवासी महिला संवाद’ पर आरंभ हुआ। इस सत्र की मुख्य वक्ता डॉ. सुनीता गुप्ता, रांची रही इस सत्र का संचालन डॉ विवेक मिश्रा (झालावाड) ने किया। सत्र में आधा दर्जन पत्र पढ़े गए। विशेष वक्ता सुधीर संपादक 'दलित आदिवासी संवाद', दिल्ली रहे, आदिवासी महिलाओं की सामाजिक स्थिति डॉ. सीमा कश्‍यप (बून्दी), सहरिया आदिवासी महिलाओं की दशा-दिशा (डॉ. विवेक शंकर, बारां, राजस्‍थान), आदिवासी औरत अस्मिता का संकट और उसका प्रतिरोध (शोधार्थी मनोज मीणा, राजस्‍थान. महा बून्दी) रहे।

डॉ. सुनीता गुप्ता ने बताया कि आदिवासी समाज में वे बुराईयां नहीं हैं, जिनसे आज का आधुनिक कहा जाने वाला उच्च वर्गीय समाज त्रस्त है। आदिवासी समाज में दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध नहीं होते हैं। आज अपने को प्रगतीशील मानने वाला समाज, जो बुद्धिजीवी कहलाता है, बेटी के जन्म पर शोक मनाता है. जनजातीय समाज में पहली सन्तान के रूप में पुत्री की कामना की जाती है- कहावत भी है कि बेटी होने से गोहाल भर जाता है और बेटा होने से गोहाल खाली हो जाता है। दलित आदिवासी संवाद के संपादक सुधीर ने आदिवासी महिलाओं के पलायन पर चर्चा करते हुए बताया कि पलायन का दर्द आदिवासी महिलाओं को सबसे ज्यादा झेलना पड़ता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में रमणिका गुप्ता ने कहा कि आदिवासी समाज में स्त्री सूर्य व शक्ति का प्रतीक रही है। जबकि हमारे समाज में कमजोरी का। आदिवासी स्त्री की इज्जत करता है, श्रम का सम्मान अधिक करता है।

संगोष्‍ठी का ज्वलंत सत्र कवि व चिंतक हरिराम मीणा की अध्यक्षता में हिंसा और (नक्सलवाद) आदिवासी पर चौथा सत्र का विषय प्रवर्तन करते हुए लेखक सुरेश पंडित (अलवर) ने नक्सलवादियों को दलितों और आदिवासियों को संगठित करने वाला बताते हुए कहा कि नक्सलवादियों ने आदिवासी विरोधी विकास को चुनौती दी है, जो उनसे जल, जंगल और जमीन को छीनकर देशी पूँजीपतियों और बहुराष्‍ट्रीय निगमों को फायदा पहुंचाना चाहती हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों पर हमेशा से आदिवासियों का कब्जा रहा है। आज का विकास आदिवासियों की गर्दन को नापते हुए किया जा रहा है। आदिवासी को ही विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। एक घर बसाने के लिए दस घर उजाड़े जा रहे हैं।

अनिल चमड़िया (दिल्ली) ने भाषण के आरंभ में ही कहा कि मैं न नक्सलियों की हिंसा का पक्ष ले रहा हूं और न ही विरोध कर रहा हूं फिर भी उन्होंने जोर देकर कहा कि यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है जितनी बताई जा रही है। उन्होंने इस विषय के कंट्राडिक्‍शन पर बोलते हुए भगत सिंह को शहीद मानने के संदर्भ में आदिवासी की आवाज उठाने वालों को आतंकवादी कहने पर सवाल खड़ा किया है। हिंसा पर बात करने से पहले घर में लटकी बंदूकों पर बात होनी चाहिए कि वह वहां क्यों है? पत्रवाचक के रूप में संयोजक ने ‘नक्सली आदिवासी अंतरसंबंध : एक वैचारिक संकट’ विषय पर- निशिकांत की ‘समर्पण’ कहानी के माध्यम से नक्सलवादियों की हिंसा पर गांधी को याद करते हुए बताया कि गांधी के देश में हिंसा होना इस पीढ़ी के नीति नियंताओं के लिए चुनौती है। मीडिया और आदिवासी शोधार्थी पत्रकार अरुण उराँव ने आदिवासियों का विज्ञापन की तरह प्रयोग करने पर चिंता व्यक्त की कि आदिवासी को पास बिठाया अवश्‍य जाता है, पर उसके लिए जगह नहीं छोड़ी जा रही है। हरिराम मीणा ने अपने अध्यक्षीय भाषण  में आदिवासियों की प्रतिरोधी पंरपरा पर विस्तार से रोशनी डाली।

संगोष्‍ठी का पांचवा व समापन सत्र दलित आदिवासी अंतरसंबंध पर दलित चिंतक बजरंग बिहारी के पर्चे के पाठ से आरंभ हुआ। जिस पर जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय ये आये प्रोफेसर वीरभारत तलवार और डॉ. रामचंद्र ने विचार रखे। इस सत्र में आधा दर्जन पर्चे पढ़े गए जिसमें दलित सौंदर्य शास्त्र, कहानी और कविता पर बात की गई। डॉ. रामचंद्र ने बजरंग बिहरी तिवारी की बातों से सहमति जताते हुए मुख्यधारा की सोची समझी साजिश व दुश्‍मन को समझने पर गहराई से अपनी बात रखी.  जिस पर प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने पूर्वोत्‍तर भारत के आदिवासियों के खुलेपन और दक्षिण भारत के रूढि़वादी ब्राह्मणों के भेद को बताते हुए आदिवासी दलित अंतरसंबंध पर साझा मंच के विचार के बजाए आदिवासियों के आंदोलन की जरूरत पर जोर दिया। इस विषय पर रमणिका गुप्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदिवासी दलितों का साझा मंच तभी बन सकता है जब आदिवासी बराबरी पर आयें, नहीं तो मंच को हड़पने का डर बना रहेगा।

‘‘आदिवासी पहचान का संकट’’ के सन्दर्भ में ही श्री पांचाल ने अपना पत्र वाचन करते हुए कहा कि आदिवासी शब्द को संवैधानिक मान्यता नहीं है फिर भी अनुसूचित जनजाति के स्थान पर ‘आदिवासी’ विषय पर विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संगोष्‍ठी आयोजित करने की अनुमति दी गई है। जबकि संवैधानिक शब्द जनजाति है, लोकप्रचलन में केवल आदिवासी शब्द ही रहा है और व्यावहारिक रूप से शासन मे भी आदिवासी शब्द का उपयोग हो रहा हैं, इस बात का प्रमाण यह संगोष्‍ठी है। जनजाति का पर्याय आदिवासी को माने जाने पर इस मंच से इस विषय पर बहस करने की आवश्‍यकता है।

दो दिवसीय संगोष्‍ठी में काफी काफी विचार विमर्श व मंथन हुआ। प्रोफेसर वीर भारत तलवार की उपस्थिति ने बूंदी वासियों को ही नहीं देशभर से आये शोधार्थियों को आहलादित किया। कई बार बहस हुई तो कई बार चौंकाया। ‘आदिवासी शब्द विमर्श’ पर पढ़े गए गुलाब चन्द पांचाल के पत्र ने संगोष्‍ठी का माहौल ही बदल दिया और प्रथम दिन के अंतिम सत्र में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया गया कि न जनजाति न वनवासी न गिरिवासी, उन्हें न केवल कहा जाए अपितु संविधान में संशोधन कराकर केवल आदिवासी कहा बोला जाए।

बूंदी से डा. अनीता यादव और डा. सियाराम मीणा की रिपोर्ट.


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