बटुआ लौटाने की परंपरा और संस्कृति के झंडू बाम

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: अखिल भारतीय नाट्‌योत्सव 2011 :  जब सरकारें शासन का, भद्रजन अनुशासन का, कार्यपालिका प्रशासन का और मीडिया तटस्थता का 'नाटक' करने लगे तब नाटकों अथवा नाटककारों की क्या प्रासंगिकता रह जाती है?

आइये, आपको एक खबर सुनाते हैं जो आपको किसी भी अखबार में पढ़ने को नहीं मिलेगी और न किसी भी चैनल में देखने को। यहां समीप के एक आवासीय विद्यालय में एक निर्धन छात्र की रोग के कारण मृत्यु हो गयी। छात्र ने अपने कुछ सहपाठियों से दस-बीस रूपये उधार ले रखे थे और इसका विवरण उसकी अभ्यास पुस्तिका में दर्ज था। मरणोपरांत छात्र के पिता के हाथ में यह अभ्यास-पुस्तिका आयी। कोई एक साल बाद उस बच्चे के निर्धन पिता मीलों पैदल चलकर ये पैसे वापस करने आये, क्योंकि उधार चुकाना वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते थे। ये बात और है कि सदाशयता के साथ विद्यालय ने पैसे लेने से इनकार कर दिया।

अब एक पुरानी फिल्म का किस्सा सुनिये। गरीब नायक (तब फिल्मों में नायक गरीब भी होते थे!) को राह चलते एक बटुआ मिलता है। जिस शख्स के हाथ से बटुआ गिरता है, नायक उसे आवाज़ देता है पर वह अनसुनी कर जाता है। उसका पीछा करते-करते नायक एक बड़े रेस्तरां में पहुंच जाता है, जहां केवल धनी-मानी लोग जाते हैं। थोड़ी झिझक व संकोच के साथ नायक भी रेस्तरां में दाखिल होता है। बटुआ वापस करता है। बटुए का मालिक नायक को रेस्तरां में बैठने का प्रस्ताव देता है पर नायक की नजर चारों ओर जाती हैं, जहां केवल 'बड़े' लोग हैं। बटुए का मालिक नायक के इस संकोच को ताड़ लेता है ओर कहता है कि 'बैठ जाओ, ये भी तुम्हारी तरह के ही लोग हैं। इन्हें भी रास्ते में एक बटुआ मिला था। फर्क ये है कि इन्होंने वापस नहीं किया।''

ऊपर लिखा समाचार सच्चा है, किस्सा फिल्मी है। पर दोनों ही प्रसंग हाशिये पर फेंक दिये गये आम भारतीय की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

एक दूसरी तस्वीर यह है कि देश में अब करोड़-दो करोड के घोटालों को कोई पूछता नहीं है। खबरें तभी बनती हैं जब मामला एक या दो लाख करोड़ रूपयों का हो। अधिकारी पकड़े जाते हैं तो नोट गिनने की मशीन लानी पड़ती है। संपादक व पत्रकार दलाली करते हैं। बाबा रास रचाते हैं। मंत्री बनाने या हटाने का अधिकार कारपोरेट समूहों को मिल जाता है। खिलाड़ी खेलते कम हैं, विज्ञापन ज्यादा करते हैं और मवेशियों की तरह खरीदे-बेचे जाते हैं। करोड़पति मेहनत से नहीं, लॉटरी से बनते हैं। बुद्धिजीवी राज्यसभा में जाने के लिये जुगाड़ बिठाते हैं। सड़को में लोग चलते नहीं हैं, यहां सिर्फ हत्यायें होती हैं। चौराहे मार्ग बदलने के लिये नहीं, बल्कि बलात्कार के प्रयोजन से बनाये गये हैं। पिता की अस्थि कमरे के एक कोने में रखकर नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों को कथित रियलिटी शो का जज बनाया जाता है। वस्त्र पहनने तक की तमीज न रखने वाली कन्यायें इंसाफ करती हैं। बाबा मटुकनाथ प्रेम के आयातित त्योहारों में प्रेम-संदेश प्रसारित करते हैं। पावन उत्सवों में नशे में धुत्‌ युवक अश्लील नृत्य करतें हैं तथा शीला की आयु की एक खास अवस्था और मुन्नी की बदनामी के साथ झंडू बाम की नेकनामी का बखान किया जाता है। क्या सचमुच हम सब एक ऐसे ही समाज में रहते हैं या ऐसा ही समाज बनाना चाहते हैं?

कदापि नहीं! हम नाटक उनके लिये खेलते हैं जो बटुआ मिलने पर उसे वापस कर आते हैं। बटुआ वापस करने की परंपरा को पुरजोर समर्थन ही हमारा नाट्‌य आंदोलन है। हमारे नाटकों की प्रासंगिकता भी यही है।

तीन दिवसीय नाट्योत्‍वस 7 से

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्‍टा) डोगरगढ़ इकाई द्वारा 07 से 09 जनवरी 2011 को तीन दिवसीय अखिल भारतीय नाट्योत्‍सव का आयोजन किया गया है. कार्यक्रम बलमेश्‍वरी मंदिर प्रांगण में होगा. जिसमें तीन दिनों तक छह नाटकों का मंचन सायं सात बजे से होगा. कार्यक्रम का उद्घाटन तीसरा स्‍वाधीनता आंदोनल के राष्‍ट्रीय संगठक गोपाल राय के संक्षिप्‍त व्‍याख्‍यान से होगा.

07 जनवरी को चित्रोत्‍पला लोककला परिषद, रायपुर की तरफ से 'राजा फोकलवा' नाटक दिखाया जाएगा. जिसका निर्देशन राकेश तिवारी ने किया है. इसके बाद भारतीय जन नाट्य संघ, भिलाई की तरफ से 'कौवा चला हंस की चाल' का मंचन होगा. इसका निर्देशन मणिमय मुखर्जी ने किया है. 08 जनवरी को गुडी नाट्य संस्‍था, खैरागढ़ द्वारा योगेन्‍द्र चौबे के निर्देशन में 'बाबा पाखंडी' का मंचन किया जाएगा. इसके बाद 'किसी और का सपना' का मंचन रंगरूपिया रंग समूह, इंदौर द्वारा किया जाएगा. इस नाटक का निर्देशन चैतन्‍य ने किया है. 09 जनवरी को इप्‍टा, पटना द्वारा तनवीर अहमद के निर्देशन में गबड़घिचौरन के माई का मंचन होगा. सबसे आखिर में इप्‍टा, अशोकनगर, गुना द्वारा पोस्‍टर नाटक प्रस्‍तुत किया जाएगा. इस नाटक का निर्देशन पंकज दीक्षित ने किया है.

लेखक दिनेश चौधरी इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं.


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