मुझे कृत्रिमता से नफरत है, सादगी से प्रेम

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विष्णु नागर: पुराना साल - नया साल : विष्णु नागर की नजर में : मुझे लगता है कि जीवन में खुशियों और दुख की दो सीधी- सरल रेखाएं ही नहीं होतीं, कई धुंधली और उलझी रेखाएं भी होती हैं। जीवन में कुछ दुविधाएं, कुछ अनिश्चितताएं भी होती हैं। कुछ खुशियों के साथ कई बार कुछ दुख और कुछ परेशानियां भी जुड़ी होती हैं और कुछ दुखों के साथ कुछ खुशियां भी। इनमें क्या वजनी है और क्या हलका, कहना मुश्किल है। 2010 में मेरे लिए सबसे नया यह था कि 1974 से नौकरी करने का जो सिलसिला अब तक लगातार चला आ रहा था, वह टूटा। 60 की उम्र के बाद ये सब स्वाभाविक है।

नौकरी करने की मजबूरियां सामने नहीं थीं तो यह फैसला लेने में दिक्कत नहीं आई बल्कि फैसला तो पहले ही मैं ले चुका था, उसे घोषित भी करता रहता था, अपने मित्रों के बीच। उसे लागू करने का मौका जब आया तो मैंने बिना किसी दुविधा के उसे लपक लिया। कुछ रुक जाने के आर्थिक लाभ थे लेकिन मैं उस लालच में नहीं पड़ा। जब आपके पास कसम खाने को भी किसी प्रकार की सत्ता न हो तो उसका अपना आनंद होता है कि लोग व्यर्थ आपकी झूठी प्रशंसा नहीं करते, आपसे ज्यादा वास्ता नहीं रखते, आपको अपनी तरह जीने देते हैं। हालांकि मेरे पास जीवन में कभी कोई बड़ी सत्ता नहीं रही और सच कहूं, उसकी कभी चाह भी नहीं रही, क्योंकि जीवन के आरंभ में ऐसे दोस्त मिंल गये थे, जिन्होंने इसकी व्यर्थता समझा दी थी। लेकिन जितनी भी ताकत मेरे पास कभी रही, उसका यथासंभव न्यायपूर्ण ढंग से उपयोग करने की भरपूर कोशिश करता रहा, इसलिए सत्ता मिलने पर लोग मुझसे नाराज ज्यादा हुए, खुश कम हुए।

अब कोई सत्ता नहीं है तो सबके सामने बस मैं हूं और जैसा भी है, मेरा लेखन है। इसकी खुशी है मुझे। ऐसे भी कुछ मित्रों-सुह्रदों की इस दौरान पहचान हुई, जिनका मेरे प्रति प्रेम इस बीच घटा नहीं, उन्होंने मुझे वही महत्व दिया, जो वे पहले देते थे बल्कि कुछ ने तो ज्यादा भी दिया। उनके नाम लेना फिलहाल उचित नहीं लगता। तो इस साल ये खुशी है, हालांकि बात पूरी ईमानदारी से कहलवाना आप चाहते हैं तो घर में बैठने का एक खालीपन भी बीच-बीच में महसूस होता रहता है, हालांकि यह भी सच है कि घर में रहकर भी मेरे सामने करने के लिए बहुत कुछ सामने रहता है और समय की कमी तो अब भी महसूस होती है।

वैसे तीन महीने से अधिक समय तक इस बीच मेरे पोते ने मुझे इतना व्यस्त रखा और इतनी ज्यादा खुशी दी कि नौकरी करता, तो इस अदभुत आनंद से काफी हद तक वंचित रह जाता। हां, इस साल मेरी कुल तीन किताबें भी आईं, एक कविता संग्रह और दो व्यंग्य संग्रह। इस साल मेरे 60 साल पूरे होने पर मुझ पर एक साहित्यिक पत्रिका ने पता नहीं क्या सोचकर एक अंक निकाला, जिसकी तरफ संयोग से लोगों का ध्यान भी गया। एक साहित्यिक पत्रिका में मेरे एक लंबे साक्षात्कार का एक अंश छापा तो भड़ास ने पत्रकारिता और मेरे जीवन पर मेरा इतना लंबा साक्षात्कार छापा, जिस पर कि आज भी मुझे सकारात्मक प्रतिकियाएं मिलती हैं। तो यह वर्ष कुल मिलाकर व्यक्तिगत रूप से संतोषजनक से कुछ अधिक ही रहा, काफी सकारात्मक रहा। अगला भी कुछ अच्छा ही रहना चाहिए।

मैं इन दिनों नौकरी से अवकाश लेकर घर जरूर बैठा हूं मगर चैन से, बिना कुछ किए बैठना मेरी कभी आदत नहीं रही, तो आने वाले साल में सबकुछ ठीक रहा तो कुछ न कुछ करते रहने का सिलसिला भी जारी रहेगा। कुछ किताबें तो निश्चित रूप से आएंगीं और देखिये, कुछ और भी हो, शायद जिसका मुझे अभी ठीक-ठीक पता नहीं क्योंकि योजना बनाकर कुछ करना मेरे बस में कभी रहा नहीं और जो योजनाएं हैं मेरी, वे अभी तक फलीभूत नहीं हुईं हैं तो उन्हें 2011 में पूरा करूंगा ही, यह कहना भी नहीं चाहता।

नाउम्मीदी व्यक्तिगत स्तर पर ऐसी खास नहीं रही क्योंकि मैं व्यक्तिगत जीवन में जहां तक हो सके इसे महत्व नहीं देता, क्योंकि स्वस्थ रहने पर बहुत कुछ करने की इच्छा रहती है और उतना कुछ न कर पाने का दर्द ज्यादा रहता है, निराशा कम। हालांकि मैं भी आखिर हूं तो मनुष्य ही और निराशाएं मुझे भी कभी घेरती और कभी छूती चली जाती हैं। आपने पूछा है कि आपको इन दिनों किस चीज से मोहब्बत है और किस चीज से नफरत। मुझे कृत्रिमता से नफरत है और सादगी से प्रेम। पहले भी था, अब भी है। आपने यह भी पूछा है तो हां, जीवन के अकारथ बीतने का भाव भी कई बार मन में जरूर आता है और लगता है तुमने कुल क्या किया? और किया भी तो क्या अपने ही लिए ज्यादा, नहीं किया, समाज के लिए आखिर तुमने क्या किया? कई बार गहराई से महसूस होता है कि एक लेखक के रूप में भी जितना मुझे करना चाहिए था, नहीं किया लेकिन फिर भी निराश नहीं हूँ क्योंकि मेरे मन में कभी यह नहीं आया कि बस जो करना था, कर चुके।

कुछ नया और बेहतर करने की, अपनी सीमाएं लांघने की इच्छा है, कोशिश करने की जरूरत है। कुछ सामाजिक-सार्वजनिक मामलों में मैं एक सीमा के बाद पड़ऩा नहीं चाहता लेकिन इच्छा जरूर होती रहती है कि मौका मिले तो पड़ूं। सबसे ज्यादा जीवन को और गहराई और विस्तार से जानने -समझने की इच्छा रहती है और डर लगा रहता है कि इसमें कभी कोई ठहराव न आ जाए। जीवन को समझने की कोशिश करने की इच्छा पूरी होगी नहीं क्योंकि कौन इसे अच्छी तरह समझने का दावा कर सकता है? कभी लगता है कि लेखन से क्या होगा, लेकिन कई बार लगता है कि इससे कुछ होता तो है ही, जब अपने या किसी और के लिखे पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिंलती है। यह अहसास भी है कि लिखने के असर की एक सीमा है, एक सुदीर्घ प्रक्रिया है, प्रभाव का अपना एक दायरा है, उससे संतुष्ट होना आना चाहिए।

हां, निराशा आज की स्थिति को देखकर जरूर होती है। बात को अपने ही परिवार तक सीमित रखूं तो कई बार सोचता ही हूं कि क्या मैं अपने पोते के लिए आशाजनक भविष्य छोड़ जा रहा हूं, क्या ऐसा भविष्य जिसमें वह और सारे बच्चे स्वस्थ ढंग से अपना विकास कर सकें, अपनी रचनात्मकता को पा सकें, महज करियर बनाने के पुतले नहीं बन जायें? क्या इस हिंसक जगत में ही वह और सभी बच्चे बड़े होंगे या एक बेहतर दुनिया उन्हें मिलेगी? आज राजनीतिक-आर्थिक स्तर पर भयंकर निराश का दौर है। एक नेता ऐसा नहीं दिखता आज राजनीति में, जिसमें साहस, कल्पनाशीलता और मानवीयता हो, अधिकांश लोगों के जीवन को बदलने की कोई सच्ची इच्छा-आकांक्षा हो, जो बनावटी-सजावटी न हो। चोरों और डाकुओं ने अपने लंबे पंजे हर तरफ गाड़ रखे हैं और मुश्किल यह है कि उन्हें चोर-डाकू कहना भी मुश्किल है क्योंकि वे इतने सुसभ्य, अंग्रेजीदां और प्रभावशाली लगते हैं कि ऐसा शब्द इस्तेमाल करते हुए अन्याय कर रहे हैं, ऐसा लगने लगता है।

विष्णु नागर से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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