हिंदुस्तान की जवां रूहानियत को सलाम

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गिरीशजी: कुदरत का तोहफा है 2011 : जी हां, 2011 कुदरत का एक तोहफा है! इस तोहफे के लिए सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई. यह उस नए युवा भारत के प्रतीक्षित ‘दशक’ का पहला साल है जब हिंदुस्तान सिर्फ आर्थिक विकास की दौड़ में ही अव्वल नहीं होगा, बल्कि हर मायने में दुनिया की सबसे बड़ी मान्य ताकत यानी ‘सिरमौर’ भी होगा. शताब्दियों तक ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में लुभाने के बाद पहली बार आधुनिक इतिहास में ऐसा भी हुआ जब बीते साल के छह महीनों में ही हर बड़ी वैश्विक ताकत ने हमारे दरवाजे पर आशा भरी दस्तक दी.

ये संकेत ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति और उस पर औपचारिक मुहर भी है, उस नए चुंबकत्व की, जो अब बराक ओबामा, सरकोजी, डेविड कैमरन, वेन जियाबाओ और मेदवेदेव को रिश्तों की नई इबारत लिखने को प्रेरित कर रहा है, तो दिल्ली की भरी संसद में मौजूदा सबसे बड़ी विश्व ताकत के मुखिया को यह कहने में रत्‍ती भर भी झिझक नहीं होती कि यदि महात्मा गांधी न होते तो न तो मैं अमेरिकी राष्ट्रपति होता और न ही यहां आपको संबोधित कर रहा होता. तो ऐसी महकी-सी बयार में हम अगले दशक के पहले साल 2011 में दाखिल हो रहे हैं. आखिर इसे हम कुदरती नेमत ही तो कह सकते हैं जब विकास के नए दशक में भारत की साठ फीसदी आबादी युवा होगी और औसत उम्र होगी महज 29 साल.

विश्व बैंक और दूसरी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की मानें तो लगभग 2020 तक भारत आर्थिक विकास की दौड़ में आज के शीर्षस्थ चीन को भी पछाड़ कर आगे निकल जाएगा. तब चीन की औसत उम्र होगी 37 साल, जो तब हमारे जैसा युवा नहीं होगा. यहां गौरतलब ये है कि तब युवाशक्ति ही हमारी ताकत नहीं होगी. हमारा लोकतंत्र, हमारा स्वतंत्र मीडिया और हमारा खुलापन भी हमारी शक्ति होगा, जो आज के भ्रष्टाचार और ढेरों कुव्यवस्थाओं के बावजूद नए समाज की संरचना का मूल कारक भी होगा, और ये होगा ‘प्रेशर कुकर के सेफ्टी वॉल्व जैसा’, जिसमें हर झंझावात को झेलने की संजीवनी शक्ति है. सच यही है कि यही खूबी हमें चीन और दूसरी अनेक प्रतिस्पर्धी व्यवस्थाओं से अलग करती है तो साथ ही दुनिया के साथ कदमताल करने के सामर्थ्य से भी नवाजती है.

वैसे भी हिंदुस्तान की जेहनी या रूहानी ताकत हमेशा से युवाओं की वजह से ही जानी जाती है. इतिहास गवाह है कि जब कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण ने पांचजन्य का उघोष किया था तो वे वृद्ध नहीं युवा थे और वे थे सारथी भारत के उत्कृष्ट तरुणाई के रथ के. जब राजकुमार सिद्धार्थ नवजात राहुल को प्रिया की गोद में सोया छोड़कर अद्वितीय सांस्कृतिक क्रांति की यात्रा पर निकल पड़े थे तो वे वृद्ध नहीं युवा थे और जब उन्होंने ‘बुद्धत्व’ हासिल किया तब भी वे युवा ही थे. जब वर्धमान समूची मानवता के मार्गदर्शन के लिए महावीर के रूप में ‘सम्यक मार्ग’ का रास्ता सुझा रहे थे तो वे वृद्ध नहीं युवा थे. जब आदि शंकराचार्य ने ज्ञान की अलख से हिंद को चारों ओर से एकता सूत्र में बांधना चाहा तो वे वृद्ध नहीं युवा थे. जब अकबर महान ने सभी धर्म-मजहब-संप्रदायों के बीच सुलह-ए-कुल की नायाब पहल की थी तो वे वृद्ध नहीं युवा थे. जब विवेकानंद ने शिकागो के मंच पर वेदांत का, सार्वभौम धर्म का अद्भुत संदेश दिया था तो वे वृद्ध नहीं युवा थे. जब गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दावानल में सत्याग्रह का आग्नेय प्रयोग किया था तो वे भी वृद्ध नहीं युवा ही थे.

और आज खुशी की बात ये है कि फिर से युवा भारत नई सोच, नई शक्ति, नई वैज्ञानिक आभा के साथ तैयार है विकास के नए प्रतिमान गढ़ने के लिए, भारत की आध्यात्मिक शक्ति यानी हमारी रूहानियत अपनी इसी पूंजी के सहारे आगे बढ़ने को तैयार है. आज जब राष्ट्रीयता की सीमा से परे मुद्दे वैश्विक हो रहे हैं और उनके वैश्विक समाधान की तलाश है, ऐसे में उन्हें व्यापक फलक पर नई परिभाषा देने का प्रयास करते चाहे विकिलीक्स के 39 वर्षीय जुलियन असांजे हों या फिर फेसबुक के 26 वर्षीय मार्क जुकरबर्ग - भारतीय युवा मानस हर चुनौती, हर परेशानी को अवसर में बदलने को बेताब है. इस मानस में विचार और कर्म का अद्भुत समन्वय भी दिखता है - कुछ-कुछ वैसा ही जैसा कि लगभग सवा दो हजार साल पहले महान विचारक चाणक्य की गुरुवाई में सम्राट चंद्रगुप्त की कर्मशीलता थी. लगभग उसी समय कुछ-कुछ वैसी ही जैसी कि दार्शनिक अरस्तू की गुरुवाई में सिकंदर महान के सपनों में पलती कर्मशीलता थी, जो उसे दुनिया जिताते-जिताते सिंधु के तट तक खींच लाई थी. संक्षेप में कहें तो वैसे ही सपनों को जीती युवा रूहानियत उसका समुच्चय जैसा ही है.

ऐसे माहौल में स्वागत है 2011 का. और स्वागत है विकास की नई कहानी गढ़ने को आतुर उस चिरयुवा भारतीय रूहानियत का, उस आध्यात्मिक शक्ति का - जिसे प्रतिद्वंद्वी चीन आज भी बुद्ध के ‘गुरुदेश भारत’ में सैकड़ों साल पहले के नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों में ‘ज्ञान की रौशनी’ में तलाशता है तो ओबामा, मार्टिन लूथर किंग और मंडेला महात्मा गांधी की मानवीयता और सत्याग्रह में.

और अंत में

‘‘गर देखना हो मेरे
पंखों की परवाज़ तो
आसमां से कह दो
थोड़ा और ऊंचा हो जाए.’’

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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