क्या करें? किस-किससे लड़ें? पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट है

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भुवेंद्र त्यागी: पुराना साल -  नया साल : भुवेंद्र त्यागी की नजर में..... मेरा देहाती मन आज भी करियर को सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानता : आज मुझे नौचंदी मेले के वही जवान और किसान याद आ रहे हैं : व्यायाम छूट जाने का अफसोस है, नये साल में इसे फिर शुरू करने का संकल्प : मीडिया पर एक विराट उपन्यास लिख रहा हूं, यह हमारे दौर का दस्तावेज होगा और मेरे जीवन का सबसे बड़ा काम : आज के दिये कल की मशाल हैं : सबसे बड़ी उम्मीद उन मीडियाकारों से जो आज भी इस पेशे में मिशन की भावना से आते हैं और पूंजी के चक्रव्यूह और करियरवादी दंद-फंद में नहीं फंसते-उलझते :

बरसों पुरानी बात है। मेरे चाचा हमारे पूरे परिवार को ट्रैक्टर-ट्रॉली में बिठाकर मेरठ का नौचंदी मेला दिखाने ले गये। वहां एक जगह जवान और किसान की मूर्ति थी। उस पर 'जय जवान-जय किसान' लिखा था। मैं उसे छू-छू कर देखता रहा। चाचा ने मेरा कौतूहल देखकर बताया कि ये हमारे देश के जवान और किसान हैं। जवान सीमा पर देश की आन-बान-शान के लिए जान लड़ता है। किसान देश के खेतों में हल चलाकर हम सबके लिए अनाज उगाता है। आज मुझे नौचंदी मेले के वही जवान और किसान याद आ रहे हैं। बीत रहे साल और आते हुए साल की दहलीज पर सबसे ज्यादा गर्व इन्हीं पर है। ये हैं, तो हम हैं। तमाम भय, आशंका, निराशा, हताशा, अवसाद और नाउम्मीदी के माहौल में यही हैं, जो हमें इन सबसे पार पाने के लिए विश्वास, शक्ति और ऊर्जा देते हैं। जब भी किसी जवान को, किसान को या मेहनतकश को देखता हूं, तो लगता है कि जैसा भी जीवन हम जी रहे हैं इसमें सबसे बड़ा योगदान इन्हीं का है।

बीते साल में सबसे ज्यादा निराशा, बेचैनी, गुस्सा और आक्रोश सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार पर आया। खुशी इस बात की रही कि भ्रष्टïचार के खिलाफ लोग कुछ करना चाहते हैं। मगर बात यहीं खत्म हो जाती है। क्या करें? किस-किससे लड़ें? पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट है।

... और अब तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया पर भी आक्षेप हैं। यह मन में आत्मग्लानि लाता है। आज आम आदमी, गरीब और मजबूर आदमी अपना कोई दुख-दर्द लेकर किसके पास जाता है? उसे किस पर सबसे ज्यादा भरोसा है। मीडिया पर। उसे लगता हे कि अखबार में छाप जाये, टीवी पर आ जाये, तो पुलिस उसकी शिकायत दर्ज कर लेगी... म्युनिसिपल्टी का बाबू उसकी फाइल ढूंढ लेगा... कोई दबंग उसे सतायेगा नहीं... उसकी बहू-बेटियों की इज्जत सुरक्षित रहेगी। वह मीडिया को भगवान समझता है। और मीडिया के कुछ लोग शैतान निकले। निश्चित ही, इससे उस आदमी के दिल में हूक उठी होगी... उसे सदमा पहुंचा होगा... उसे लगा होगा कि अब वह किससे गुहार लगाये?

हर साल की तरह बीते साल भी, प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवन से सफलता पा लेने लोग भावुक करते रहे। वी.वी.एस. लक्ष्मण की हर मैच जिताऊ पारी, हरियाणा की महिला खिलाड़ियों का ग्वांगझू एशियाड में पदक जीतना, किसी गरीब बच्चे का आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल होना, भ्रष्टï सिस्टम में अब भी ज्यादातर लोगों का ईमानदार होना मन को छूता भी रहा और आशा का दीप भी जलाये रहा।

जीवन में जो लक्ष्य तय किये थे, उनमें से अभी तक तो ज्यादातर पूरे किये। मेरा देहाती मन आज भी करियर को सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानता। वह तो रोजी का, जिंदा रहने का एक साधन मात्र है। ऐसा नहीं होता, तो मैं इंजीनियर या लेक्चरर बन जाता। इंजीनियरिंग में दाखिला हो गया और नैट क्वालिफाई कर लिया था। पर मैं कुछ अलग करना चाहता था। इसलिए मीडिया में आया। वो सब पूरी तरह नहीं कर पाया... कोई गिला नहीं... मौका मिलेगा, तो जरूर करूंगा।

यूं तो मैं जीवन में काफी अनुशासित हूं, पर बरसों से व्यायाम छूट जाने का अफसोस है। मुम्बइया जिंदगी की भागदौड़ और व्यस्तता के बीच यह छूट गया। पर नये साल में इसे फिर शुरू करने का संकल्प जरूर है।

कुछ गरीब बच्चों को पढ़ाता हूं। इच्छा है कि इसके लिए वक्त मिलता रहे। युवाओं से ऊर्जा लेता हूं। युवा व भावी पत्रकारों का मार्गदर्शन करना दिली खुशी का अहसास दिलाता है। ये आज के दिये हैं, भविष्य में मशाल बनेंगे। नीरा राडिया के चक्कर में हर कोई तो नहीं आता... इसलिए इस नयी पौद से बेहद आशाएं हैं।

बीते साल मीडिया पर मेरी दो किताबें 'स्पेशल रिपोर्ट' और 'फिल्मी स्कूप' आयीं। चार की योजना थी। कोई बात नहीं ... दो इस साल सही।

बरसों से एक विराट उपन्यास पर काम कर रहा हूं। पिछले दो दशक में, यानी आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीडिया किस तरह और कितना कुछ बदला है, इसी पर। इसमें मीडिया के अंदर की सनसनीखेज और अविश्वसनीय कथाएं होंगी। इसका फलक मेरठ से शुरू होकर मुम्बई तक फैला है। कथावस्तु फिक्शन में होगी। पर किरदार और घटनाएं पकड़ में आ जायेंगे। 600 पेज का रफ ड्राफ्ट और नोट्स तैयार हैं। और भी जुड़ते जा रहे हैं। कह नहीं सकता, इसे अंतिम रूप देने में कितना वक्त लगेगा। पर यह हमारे दौर का दस्तावेज होगा और मेरे जीवन का सबसे बड़ा काम - पूरी तृप्ति और संतुष्टि देने वाला। शायद यह कई दोस्तों से दूरी भी पैदा कर दे ... क्योंकि इसमें सब कुछ सच होगा, सच के सिवा कुछ नहीं। ... और सच अक्सर कड़वा होता है।

सबसे बड़ी उम्मीद उन मीडियाकारों से है, जो आज भी इस पेशे में मिशन की भावना से आते हैं, पूंजी के चक्रव्यूह में नहीं फंसते और करियरवादी दंद-फंद में नहीं उलझते। ये वो लोग हैं, जिनके लिए जीवन एक संघर्ष है, पर ये संघर्ष से नहीं घबराते। इनके सीने में आग है, दिल में ईमानदारी है और लबों पर सच है।

नये साल में यही ख्वाहिश है कि इनका ये सब बचा रहे, बना रहे, परवान चढ़ता रहे!

आमीन!

अपने दिल की बात को बेबाकी से बयान करने वाले भुवेन्द्र त्यागी इन दिनों मुंबई में नवभारत टाइम्स में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए संपर्क कर सकते हैं.


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