अयोग्य गदहों को अनाप शनाप तरीके से दौलत कमाते और उसकी बदौलत सम्मान पाते देखकर इस समाज-सिस्टम से घृणा होती है

E-mail Print PDF

मदन कुमार तिवारी: नया साल - पुराना साल : मदन कुमार तिवारी की नजर में.... : दुख होता है महंगाई की मार कुत्तों को झेलते देखकर :  बेटे का क्लास 12 में फेल हो जाने की घटना से भी बहुत तकलीफ़ हुई : एक और इच्छा है, मेरी तथा मेरी पत्नी की मौत एक साथ हो : एक ही तमन्ना है, जातीय आरक्षण की जगह आर्थिक आरक्षण के लिये आंदोलन करने की : गांव के अनपढ–अशिक्षित लोगों की आत्मीयता का कायल हूं : बिहार में बेटियों के स्कूल से साइकिल जाने की परिघटना को उनकी आजादी-मुक्ति के रूप में देखता हूं :

बीता साल कुछ मिला जुला रहा. निजी तौर पर और सामाजिक तौर पर भी. अंत पूरी तरह निराशा से भरा, अंधेरी सुरंग की तरह था. कारण वही सबकुछ, घोटाला, आर्थिक विषमता, अमानवीयता. सबसे ज्यादा दुख दिया डाक्टर सेन को दी गई सजा ने. बेटे का क्लास 12 में फेल हो जाने की घटना से भी बहुत तकलीफ़ हुई. बेटा समझदार है और तेज भी. नाम भी ओशो है. अपनी हैसियत से बढकर उसकी पढाई में पैसे लगाये. रांची के डीपीएस में पढाया. सारी जमा-पूंजी लगा दी. कारण यह सोच थी कि कम्पटीशन निकाल लेगा और अच्छे कोर्स में दाखिला हो जायेगा. डोनेशन देने की औकात भी नही है और डोनेशन से हुये दाखिले को गलत भी मानता हूं. खैर, अच्छा करेगा, आशा है.

आनेवाली पीढियों के अंदर जिम्मेवारी का एक भाव दिखा, यह सुखद रहा. नई पीढी जाति, धर्म से उपर सोचना शुरू कर चुकी है. निर्भीकता भी है, प्रयोगधर्मी भी.  कमी है तो धैर्य की. लड़कियों का, खासकर बिहार में,  साइकिल से स्कूल जाना पुरुष प्रधान समाज को आने वाले कल में चुनौती देने वाले प्रयास के रूप में देखा. साइकिल चलाकर स्कूल जानेवाली लड़कियां जब आर्थिक रूप से स्वतंत्र होंगी तो सबसे पहले स्कूटी खरीदेंगी और फ़िर शुरू होगी उनकी उड़ान.

न सिर्फ़ बीते साल में बल्कि बहुत वर्षों से सबसे ज्यादा अवसाद या कष्ट देनेवाली चीज है, आवारा कुत्तों को कूड़ों के ढेर में खाना तलाशते देखना. मुहल्ले के कुत्तों को तो कभी-कभी कुछ रोटियां या 1-2 किलो साधारण, सस्ता चावल का भात बनवाकर खिला देता हूं. लेकिन रोज तो नहीं खिला सकता न. महंगाई की मार कुत्ते भी झेल रहे हैं. जब अपना ही खाना इतना महंगा हो चुका है कि बासी रोटी भी नहीं बचती तो कुत्तों को कौन खिलायेगा. एक और इच्छा है. मेरी तथा मेरी पत्नी की मौत एक साथ हो. मेरे बाद एक सीधी औरत कैसे रहेगी, यह सोचकर परेशानी होती है. कभी-कभी अकेले में रुलाई भी आती है. मेरे मरने के पहले उसकी मौत को झेलने की हिम्मत नहीं है. टूट कर बिखर जाउंगा.

कहीं कुछ बहुत गलत हो रहा हो तो सहन नहीं कर सकता, शायद व्यवहारिक रूप से असफ़ल होने का यह भी एक कारण रहा. अयोग्य गदहों को अनाप शनाप तरीके से दौलत कमाते और उसकी बदौलत समाज में सम्मान पाते देखकर इस समाज और उसके पाखंडी सदस्यों से घृणा होती है. गांव के अनपढ–अशिक्षित लोगों की आत्मीयता का कायल हूं. कल 31 दिसम्बर की घटना है. पटना से लौट रहा था. साथ में एक मित्र विमलेंदु का परिवार भी था.

beyond expectation : प्रभावित करती है सीधे-सादे-सच्चे मनुष्यों की आत्मीयता

रास्ते में मोटरसाइकिल से विमलेंदु की कार के पिछले बंपर में धक्का लगा और एक तरफ़ का बंपर टूट कर सड़क से जा सटा. दो अंजान आदमी मदद के लिये लग गये, बिना किसी स्वार्थ के, बंपर को ठीक किया. हालांकि यह बहुत बड़ी घटना नहीं थी लेकिन इस साल की सबसे ज्यादा प्रभावित करनेवाली घटना थी, मेरे लिये.

यह भाव कभी आया हीं नहीं की जीवन अकारथ बीता. हमेशा अपने दिल की सुनी और वही किया जो सही लगा. अगर जीवन की सार्थकता का मतलब नाम से है तो उसकी परवाह कभी नहीं रही. एक ही तमन्ना दिल में है, वह है जातीय आरक्षण की जगह आर्थिक आरक्षण के लिये आंदोलन करने की, पर परिवार का खर्च चलाने की मजबूरी ने बांध रखा है.

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. भड़ास4मीडिया के कट्टर पाठक और समर्थक हैं. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.


AddThis