मीडिया घरानों की चमक-दमक में खुद को ढाल नहीं पाया

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दीपक : पुराना साल - नया साल : दीपक आजाद की नजर में : बीता साल निजी और सामाजिक तौर पर अच्छा-बुरा दोनों किस्म का रहा। सुकून इस बात का कि बाबरी मस्जिद ढहाने के साथ शुरू हुई सांप्रदायिकता की आंधी को बीते साल हिन्दू-मुस्लिमों ने समझदारी से जोर का झटका दिया। यह भी कि अब बाहरी दुनिया के लिए पवित्र गाय-भैंस समझे जाने वाले मीडिया के खिलखिलाते चेहरों के पीछे की सड़ांध राडिया कांड के बहाने उडेलकर बीते साल ही सड़क पर पसर गई। निजी तौर पर  साल 2010 को देखता हूं तो कुछ भी सीधा-सपाट नजर नहीं आता। लगता है जब घर-परिवार और समाज, सभी घोर किस्म के व्यक्तिवादी सांचे में ढलते जा रहे हैं, तब खुदको समाज की चिंताओं से जोड़े रखना किसी चुनौती से कम नहीं लगता।

ऐसे वक्त में जब आप नैतिक-अनैतिकता के भंवर में उलझे बगैर खुदको बसाने में अव्वल दर्जे तक सफल हो पा रहे हैं या नहीं, तो बीते साल कुछ अच्छा नहीं रहा। कई बार ऐसा होता है कि जीवन में घट रहे उतार-चढ़ावों को किसी एक फ्रेम में बैठाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। फिर भी बीते साल, अपने दस साल के करियर के बाद भी मैं खुद को बड़े मीडिया घरानों की चमक-दमक में ढाल नहीं पाया। यह बीतते साल में शुरू से ही उलझन की वजह रहा। हां यही साल रहा जब दैनिक जागरण में काम करते हुए भी खुद के अंदर इतना दुस्साहस जुटा पाया कि लोकसभा चुनाव के बाद पेड न्यूज के पैसा को अखबारी मालिकों द्वारा लिफाफे में बांटने का विरोध कर पाया। यह समझते हुए कि यह रास्ता करियर के लिहाज से इसके बाद आगे और पथरीला होने जा रहा है। बावजूद एक अदना सा पत्रकार होने के चलते भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता और उसके कारकूनों के इस संडांधी कर्मकांड में हाथ मैले करने से खुदको बचाने की कोशिश कर पाया। आगे इससे बचा रहूंगा कहना मुश्किल है।

जब अयोध्या पर फैसला आया तो एक बार फिर जबर्दस्त मानसिक उलझन का सामना करना पड़ा। जागरण जैसे बहुतेरे छोटे-बड़े अखबार आज भी अपने सांप्रदायिक लेखन की आदत को नहीं छोड़ पाए हैं। इस दौरान जब देशभर में अघोषित कपर्यू जैसे हालात पैदा हुए तो लगा कि कहीं मारकाट व हिंसा होने लगे तो जीवन में अपराधबोध हमेशा पीछा करता रहेगा। इस आशंकाओं के घटित होने पर इससे बचने की हड़बड़ी में आखिर 30 सितम्बर को अयोध्या पर फैसले वाले दिन से ही जागरण की नौकरी न करने का कठोर फैसला किया। इससे मन में घर कर बैठे बोझ से कुछ हलका जरूर हुआ।

अयोध्या पर फैसला आने के बाद देश में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहा। इसने दिखाया कि भारतीय समाज अपने तमाम तरह के टकरावों और अन्तर्विरोधों के बावजूद मिल-जुलकर रहने में विश्वास करता है। और यह भी कि वह फिरकापरस्त या सांप्रदायिक कर्मकांडियों के हाथों में खेलने से बच रहा है। हां इस दौरान जागरण से हटते हुए अपने सहकर्मियों से सामान्य शिष्टाचार भेंट न कर पाने का मलाल जीवन में बना रहेगा। मीडिया संस्थानों से ताल्लुक घटनाओं और उसके गैर लोकतांत्रिक क्रियाकलापों पर भड़ास4 मीडिया के लिए खबरें लिखनी शुरू की तो यह एक बड़ी चुनौती को गले लगाना था। इससे मैंने समाचार मीडिया के स्थापित घरानों में एक हद तक खुद के लिए दरवाजे बंद कर दिए।

आशा और निराशा के इस कॉकटेल में तनाव अभी भी इस बात का निरंतर बना हुआ है कि मैं परिजनों की परिवार बसाने की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। नये साल में भी इसमें कोई तब्दीली आएगी, मुमकिन नहीं लगता। हालांकि दबाव अधिकतम है। उम्र के तीसवें साल में इसे कितने समय तक झेल व झेला पाउंगा, यह निहायत निजी किस्म की उलझन नये साल में भी बनी हुई है। जहां तक बात निजी या सार्वजनिक जीवन में कुछ करने की है, तो पहला यही इस कठोर समय में निजी होते हुए भी समाज के हित में न सही, कम से कम उसको दुष्प्रभावित करने से बचने की कोशिश प्राथमिकता में है। समाज और समय की विवेक सम्मत पड़ताल या उससे परिचित कराने वाली किताबों को ही अपने करीब पाता हूं।

रही बात नफरत की तो तब बहुत पीड़ा होती है जब चोर, लगातार चोरी करते हुए भी चोरी न करने, नेता हद दर्जे तक भ्रष्ट होते हुए भी ईमानदारी का पाठ पढ़ाने लगे। इससे समाज में सही और गलत की पहचान का ही संकट खड़ा हो रहा है। यही मेरी समाज से जुड़ी साझा चिंता है। हर उस इंसान की लड़ाकू प्रवृत्ति मुझे हौसला देती है, जो निजी तौर पर कुछ अच्छा-बुरा सोचे बिना असहज करने वाले सवालों पर सत्ता से टकराने की कोशिश करते हैं। जीवन का अकारथ बीतने का भाव कितना गहरा या हलका जैसा कुछ नहीं है। हां इतना अवश्य है कि हाशिए पर खड़े समाज की चिंताओं से खुद को जोड़े रख सकूं तो ऐसा किसी हलके-गहरे भाव से आगे भी मुक्त रह पाऊंगा। किसी अपरिचित कवि मित्र से उधार लिए शब्दों में इतना ही-

साथ है जीने का सबब
ओ मेरे साथियों!
उम्मीदें और मंसूबे
बांटा किए हम
बची रहीं फिर भी कुछ दूरियां।
राहों के नक्शों और सफर की स्कीमों में भी
काफी कुछ साझा रहा
तमाम नाइत्‍तफाकियों के बाद भी।
मगर हर सबकी हैं
अपनी अलग-अलग कुछ उदासियां और कुछ मासूमियां
और अपनी कुछ अलग-अलग तनहा उन्नींदी रातें
फिर भी इन्हें भी बांट लें क्या?
सच से सदमा न लगे
इसके लिए नाउम्मीद होना भी सीखना होता है।
और कभी-कभी अकेला हो जाना भी
जैसे भी हो
कुछ अपनी उदासियां और मायूसियों की हिफाजत का चाव करें।
इनको भी होना है साथ-साथ
जैसे कि हर चीज के साथ
उसका दूसरा पहलू
या जैसे काम पर जाते दिहाड़ी मजदूर की पोटली में
रोटी के साथ तीखी हरी मिर्च और प्याज के टुकड़े।
आखिर चंद दिनों की तो बात नहीं।
सफर है यह जो
पूरी जिन्दगी का यूं साथ चले।

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.


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