‘‘ना इज्जत की चिंता, ना फिकर ईमान की, जय बोलो बेईमान की’’

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अजय कृष्ण त्रिपाठी: नया साल - पुराना साल : अजय कृष्ण त्रिपाठी की नजर में.... : ‘ना इज्जत की चिंता, ना फिकर कोई ईमान की, जय बोलो बेईमान की जय बोलो....’! यह गीत फिल्मों में भारत कुमार के नाम से जाने-जाने वाले मनोज कुमार की फिल्म ‘दस नंबरी’ का है जिसे भारत कुमार ने फिल्मों में गाया था। यह फिल्मी गीत आज के दौर के भारत के परिदृश्य को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है। देश की मुख्य धारा में इस समय भ्रष्टाचार और घोटालों की यमुनोत्री बह रही है।

इसके श्याम गरल जल का प्रवाह अपने आगोश में एक से एक नामी-गिरामी हस्तियों, बड़े हाउसों को हिचकोले दे रहा है। कोई तर है तो कोई तार-तार हो चुका है। तो, फिर इस मुख्य धारा के प्रवाह से जुड़े बगैर वाराणसी के मीडिया हाउस भी कैसे बचे रह सकते हैं। यहां भी घोटालों-घपलों का प्रवाह गतिमान है। मीडिया हाउसों पर पीएफ के छापे, श्रम विभाग के छापे, कामगारों का स्थायीकरण जैसी प्रचंड प्रवाह वाली लहरों में मीडिया हाउस का प्रबंधन डूबता-उतराता रहा। इस बीच वर्ष 2010 अलविदा हो गया। नये वर्ष के पहले महीने का पहला शनिचरा दिन ‘एक-एक ग्यारह’ से शुरू हुआ। तो अब दूसरे महीने में निश्चित रूप से ‘नौ दो ग्यारह’ भी होगा। इसे कोई माई का लाल रोक नहीं सकता। खैर, हम आते हैं अपनी बातों पर। वही घपले-घोटालों की पुरानी बात। दरअसल यहां किस्सा है अखबार की फ्री कापी के घपले और स्कीम के तहत छपे कूपन के घोटालों की। जिसमें प्रबंधन से जुड़े लोगों ने लाखों का वारा-न्यारा करते हुए ‘एक-एक ग्यारह’ मनाया।

देखना है कि जश्न मनाने वालों में से अगले महीने किसको ‘नौ दो ग्यारह’ सूट करता है। चांदपुर लहरतारा से प्रकाशित होने वाले अखबार ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए बीस-बीस करके लगभग चालीस हजार कूपन छापे थे और अखबार को वर्ष 2009-2010 में बढ़ाने के लिए लगभग दो लाख का टार्गेट रखा था। वर्ष 2010 बीत गया अखबार की कुछ कापियां कूपन के सहारे जरूर बढ़ीं किंतु टार्गेट पूरा हुआ या नहीं इसकी जानकारी नहीं हो सकी किंतु इस प्रकरण में लगभग तीस लाख रूपये का घोटाला सामने आया जिसकी भीतरखाने जांच भी शुरू हो चुकी है। इसी प्रकरण के चलते प्रसार विभाग से जुड़े दो अधिकारियों में उठापटक और घूंसीघूंसा की नौबत आयी। कमाने वाले  कमाई कर चुके हैं उन्हें न इज्जत की चिंता है न ईमान की।

धंधा चोखा चल रहा है। इसी से मिलती जुलती कहानी तेलियाबाग स्थित कैलगढ़ हाउस से प्रकाशित होने वाले अखबार की है। जहां फ्री कापी का लंबा घोटाला किया गया। वितरकों को ‘एक पर एक फ्री’ कापी देने की स्कीम गत 13 दिसंबर 2010 से 31 दिसंबर 2010 तक चलाई गयी। कुछ दिन तो यह स्कीम चली किंतु अखबार न उठने के कारण इस स्कीम को रोका गया और मात्र दस हजार कापियां ही फ्री के नाम पर बांटी जाने की बात कही गयी। दरअसल यह सभी फ्री कापियां वितरकों को न देकर डंप की गयीं और इनसे रद्दी के गोदाम भरे गए। नये वर्ष में इसकी बिक्री का प्लान था खबर लिखे जाने तक यह प्लान कारगर हुआ कि नहीं इसकी जानकारी नहीं हो सकी। बहरहाल गोदाम में पड़ा फ्री अखबार प्रसार प्रबंधन के लिए बैंक बैलें स की तरह सुरक्षित पड़ा दूध पी रहा है।

इस समय चल रही राष्ट्र की मुख्य धारा का असर हमारे एक मित्र पर भी पड़ा। भ्रष्टाचार की यमुनोत्री के प्रबल प्रवाह की धारा में यह मित्र भी बह गए। अब अपने मूल मिशन को तिलांजलि देते हुए मिशन 2012 को कामयाब करने में लगे हैं। इस जश्न में लखनऊ से लेकर वाराणसी तक के नामी-गिरामी होटल में झूम बराबर झूम शराबी का दौर चला और मिशन 2012 की कामयाबी का संकल्प लिया गया तो इनके समर्थन में इनकी कामयाबी के लिए हमें भी गुनगुना पड़ रहा है-‘हम होंगे कामयाब एक दिन...’ और बाकी तो फिर वहीं तीस वर्षों पूर्व गाया भारत कुमार का गाना ही पूरी शिद्दत से याद आ रहा है-‘‘ना इज्जत की चिंता ना फिकर कोई ईमान की जय बोलो बेईमान की...।’’

अजय कृष्ण त्रिपाठी विगत तीन दशको से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इन तीन दशकों में लगभग डेढ़-दो दशक गाजीपुर में रहते हुए आज, अमर उजाला, हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ रहे। कुछ वर्षों तक दैनिक जागरण से भी जुड़े रहे। प्रिंट के साथ ही इलेक्ट्रानिक चैनलों के लिए भी प्रोग्राम बनाते रहे। संप्रति वाराणसी में रहते हुए स्वतंत्र लेखन के माध्यम से काव्य और साहित्य सेवा के साथ ही पूर्वांचल दीप साप्ताहिक समाचार पत्र और पूर्वांचल दीप डाट काम से सम्बद्ध हैं।


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