लोकतंत्र का पूंजीवादियों के हाथ में जाना खतरनाक

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मधुगोवा मुक्ति आंदोलन के नायक महान समाजवादी नेता मधु लिमये ने पूरा जीवन आम आदमी के अधिकारों के लिए संघर्ष में लगा दिया। उनकी 16वीं पुण्यतिथि पर शनिवार को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में 'एक आखिरी आदमी की बात' विषय पर विचार गोष्टी आयोजित हुई। गोष्ठी में मधु लिमये की विचार धारा और उनके योगदान को मौजूदा लोकतिंत्रक व्यवस्था से जोड़कर वक्ताओं ने विचार रखे।

दिल्ली में स्वतंत्र लेखनकार अनिल चमडिया ने बताया कि मौजूदा समय में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती नए विचारों का सृजन न होना है। आदमी की आधुनिकता का पैमाना उसके पहनावे और डिग्रियों से मापी जाती है जबकि विचार बेहतर सोच से पनपने वाली एक धारा है, जिसकी जरूरत भौतिकतावाद में खत्म होती जा रही है। चमडिया ने बताया कि लोकतंत्र विचार है पक्रिया नहीं, नारों से परिवर्तन नहीं होता उसके लिए विचार जरूरी है। हम आज भी पुरानी परिभाषाओं को साथ लेकर चलते हैं जबकि मौजूदा स्थिति लोकतंत्र में रह रहे उस आखिरी आदमी को ध्यान में रख कर समाज को दिशा देनी होगी। समाज का अभिन्न अंग आम आदमी मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से गायब हो चुका है। उसके लिए पहल करने वालों को सरकार डॉ. बिनायक सेन की तरह जेल भेज देती है या फिर नंदनी सुंदरम की तरह छतीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में प्रवेश करने पर रोक लगा देती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी व्यवस्था न्यायपालिका पर सवाल उठाते हुए चमिड़या ने कटघरे में खड़ा किया। सुप्रीम कोर्ट के वकील के 9 जजों पर भ्रष्टाचार के लगाए आरोपों को उन्होंने समाज के लिए घातक बताया।

जेएनयू के प्राध्‍यापक भूपेन सिंह ने कहा कि लोकतंत्र सबको सामान अधिकार देने की परिभाषा तो है, लेकिन आखिरी आदमी कतार में सबसे पीछे पहुंच गया है और समाज का छोटा सा हिस्सा जिन्हें पूंजीवादी कहा जाता है, वह लोकतंत्र पर हावी है। मुनाफे पर टिकी योजनाएं लोकतंत्र नहीं हो सकती। बड़े पूंजीवादी देश को चला रहे हैं ऐसे में आम आदमी को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। मौजूदा समय में एक ही देश में दो राष्ट्र हैं एक पूंजीवादियों का और दूसरा उस आखिरी आदमी का गरीब राष्ट्र। गरीब के पास सबसे बड़ा हथियार लोकतंत्र में डाले जाना वाला वोट है और किसे वोट डालना है उसके लिए उसके विचार स्पष्ट होना जरूरी है।

जेएनयू के प्राध्यापक और लेखक दिलीप मंडल ने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया। उन्होंने आम जनता और सरकार के बीच मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मीडिया सही भूमिका निभा नहीं रहा। लोकसभा में 300 से अधिक सांसदों की संपित्त एक करोड़ से अधिक है। बड़े व्यापारिक घराने राज्य सभा में भेजे जा रहे हैं, जिससे राजनैतिक पार्टियों और पूंजीवाद के बीच गहरे होते रिश्ते साफ होते हैं।

कार्यकारी संपादक अमर उजाला अरविंद मोहन ने बताया कि लोकतांत्रिक प्रणाली सबसे सशक्त माध्यम है किसी भी अभिव्यिक्त के लिए, लेकिन उसे पूंजीवाद के हाथों बेचने से स्थिति गंभीर होती जा रही है। लिमये की विचारधारा धीऱे-धीरे लुप्त होती जा रही है जिससे आम आदमी भविष्य खतरे में हैं। देश में मौजूद गैर बराबरी यानी पूंजी का कुछ हाथों में होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिशाप बन गया है। पूंजीपतियों के राजनैतिक गलियारों में जोरदार दखल से लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं का इस्तेमाल समाज के एक ही वर्ग को मिल पा रहा है। मौजूदा परिस्थियों में विकल्प है तो गांधी के बताए विकेंद्रित विकास के सिद्धांत, जिनसे पूंजीवाद का प्रतिकार हो सकता है।

गोष्ठी की अध्यक्ष और चौधरी चरण सिंह विवि में पत्रकारिता विभागाध्य़क्ष जेके पुंडीर ने कहा कि समाजवाद का विकल्प आर्थिक समानता के उपर अधारित था, जिसे मौजूदा परिस्थियों में लोगों ने नकार दिया। गरीबी और अमीरी की बढ़ती खाई चरित्र को गिरा रही है। आम आदमी कौन है यह खुद में एक सवाल बन गया है। रसूखदार लोग ही आम आदमी के लिए चलने वाली सरकारी योजनाओं का हजम करने में लगे हैं।

गोष्ठी के आयोजक गोपाल अग्रवाल ने सभी वक्ताओं का स्वागत करते हुए कहा कि मधु लिमये का व्यक्तित्व समाजवाद की विचारधारा है, जनक है,  जिन्होंने सामज के आखिरी आदमी के बारे में पूरी उम्र संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में लोक कल्याण से आखिरी आदमी दरकिनार है। डॉ. बिनायक सेन ने आखिरी आदमी की बात उठाई तो सरकार उन्हें हटाने में लगी है। उन्होंने बताया कि मधु लिमये उस श्रृंखला के व्यक्ति हैं जो सत्ता के सुपात्र होने के बावजूद सत्ता को त्याग कर जनता की आवाज बने। मौजूदा राजनेता सत्ता को त्याग कर उसके सुख भोगने में लगें हैं। विचार गोष्ठी में स्नेहवीर पुंडीर, हाजी अनान, केके यादव, शाजिद सैफी, कुलदीप उज्ज्‍वल, प्रभात राय ने भी विचार रखे।


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