यह वैकल्पिक मीडिया नहीं है तो और क्या है?

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नाटक: नाट्‌योत्सव, एक छोटे-से कस्बे में : महज चालीस-पचास हजार की आबादी वाले एक छोटे-से कस्बे में होने वाले नाट्‌योत्सव की चर्चा राष्ट्रीय फलक पर किसलिये की जानी चाहिये? शायद इसलिए कि राष्‍ट्रीय स्तर का यह आयोजन बगैर किसी सरकारी सहायता के मेहनतकश जनता से एकत्र बहुत छोटी राशियों के बलबूते किया जाता है। या फिर इसलिए कि संभवतः यह हिंदी पट्‌टी का इकलौता कस्बा है, जहां नाटकों के दर्शकों का एक अपना वर्ग है और जहां बाद में आने वाले  दर्शकों को जगह नहीं मिलने के कारण मायूस होकर लौटना पड़ता है।

जो भी हो हर बार की तरह इस बार भी छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़  नगर में अखिल भारतीय नाट्‌योत्सव' 11 का आयोजन किया गया और यह सभी मायनों में पूरी तरह सफल रहा। भारतीय जन नाट्‌य संघ की डोंगरगढ़ इकाई छत्तीसगढ़ की उन दुर्लभ इकाइयों में से एक है, जो न सिर्फ रंगकर्म वरन्‌ इससे जुड़े सरोकारों व आंदोलन के लिये प्रतिबद्ध है और कमोवेश वर्ष के सभी दिनों में किसी न किसी बहाने सक्रिय रहती है। समूह द्वारा नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन विभिन्न स्थानों पर साल भर किया जाता है और यही वजह है कि संस्था ने नाटक के दर्शकों का एक विशाल वर्ग तैयार कर लिया है,  जो नाट्‌योत्सव होने पर टूट-सा पड़ता है। यह बड़े नगरों की उन संस्थाओं के लिये एक सबक जैसा है, जो नुक्कड़ नाटकों की चर्चा अब सिर्फ गोष्ठियों में करते हैं, सरकारी अनुदान या प्रायोजकों के भरोसे बड़े आयोजन करते हैं, भारी मात्रा में लकदक आमंत्रण कार्ड बांटते हैं और जिनके नाटकों का हश्र 'जंगल में मोर नाचा' से अधिक कुछ नहीं होता।

आयोजक इकाई ने इस बार थोड़ा साहस दिखाते हुए, पारंपरिक दो दिनों के आयोजन का विस्तार करते हुए इसे तीन दिनों का किया और देश प्रदेश से कुल छह टीमों को आमंत्रित किया। आयोजन का उद्‌घाटन दिनांक 9 जनवरी 11 को तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक श्री गोपाल राय द्वारा किया जाना था, लेकिन कुहासे के कारण गाड़ी रद्‌द होने के कारण वे दिल्ली नाटकसे नहीं आ सके। इसी तरह आयोजन के दूसरे दिन इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी का आना तय हुआ था, पर इन्हीं कारणों से उन्हें भी अपनी यात्रा रद्‌द करनी पड़ी। बहरहाल, उद्‌घाटन की औपचारिकता राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय से संबद्ध रहे योगेंन्द्र चौबे ने निभाई, जो वर्तमान में इंदिरा कला व संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ के नाट्‌य विभाग में अध्यापन में लगे हैं।

पहला नाटक 'राजा फोकलवा' चित्रोत्पला लोककला परिषद, रायपुर द्वारा खेला गया, जिसका निर्देशन राकेश तिवारी ने किया है। छत्तीसगढ़ी गम्मत शैली में रचे गये इस नाटक की संरचना के लिये राकेश तिवारी ने काफी मेहनत की है और नाटक देखने के बाद कुछ  दर्शकों की टिप्पणी थी कि उन्हें हबीब तनवीर के 'चरणदास चोर' की याद आ गयी। नाटक में नाचा, भरथरी, पंडवानी, चंदैनी, पंथी, कर्मा, ददरिया, बांस, बिहाव जैसे लोकरूपों व लोकतत्वों के साथ ही बस्तर व सरगुजा की लोकधुनों का इस्तेमाल भी किया है। फोकलवा एक बहुश्रुत किन्तु लगभग विस्मृत लोककथा है। निर्देशक ने इस कथा को परिमार्जित कर समकालीन रूप प्रदान किया गया हैं। नाटक की पुनर्रचना तथा निर्देशन के दौरान लोक -कथात्मकता तथा लोक-रूपों के संयोजन एवं सामंजस्य का विशेष ध्यान रखते हुए वर्तमान सामाजिकः राजनैतिक पृष्ठ-भूमि को रेखांकित करने का प्रयास निर्देशक ने किया है और वे अपने इस प्रयास में खासे सफल भी नजर आये। फोकलवा की केंद्रीय भूमिका में हेमंत वैष्णव दर्शकों के बीच सचमुच के नायक बनकर उभरे।

पहले दिन की दूसरी प्रस्तुति थी ''कौआ चला हंस की चाल'', जिसे मणिमय मुखर्जी के निर्देशन में भिलाई, इप्टा ने मंचित किया। नाटक पूरी तरह से कुमार साहब (राजेश श्रीवास्तव) के इर्द-गिर्द ही घूमता है, जो नवधनाढ्‌य है और अब अपनी संपत्ति के बूते कथित 'हाई सोसायटी' में अपनी पहचान बनाना चाहता है। एक-दो प्रसंगो को छोड़ कर यह नाटक दर्शकों को उस तरह से प्रभावित नहीं कर पाया, जिसके लिये भिलाई इप्टा की ख्‍याति रही है। राजेश श्रीवास्तव ने हालांकि काफी मेहनत की है।

नाट्‌योत्सव के दूसरे दिन मध्यप्रदेश नाट्‌य विद्यालय के प्रथम निदेशक संजय उपाध्याय बतौर मुख्य-अतिथि उपस्थित हुए। उन्होंने आश्‍चर्य मिश्रित प्रसन्नता जाहिर की कि एक छोटे से कस्बे में नाटकों को लेकर इस तरह से काम किया जा रहा है। वे खासतौर से आयोजक इकाई की संगीत मण्डली से बेहद प्रभावित थे और उन्होंने यहां पर रंग-संगीत पर एक शिविर आयोजित करने की नाटकइच्छा व्यक्त की। इसके पश्‍चात योगेन्द्र चौबे के निर्देशन में 'गुड़ी' नाट्‌य संस्था रायगढ ने नाटक 'बाबा पाखंडी' का मंचन किया। संयोग से 'बाबा पाखंडी' व 'राजा फोकलवा' एक ही 'मूड' के नाटक हैं। दोनों ही छत्तीसगढ़ी गम्मत शैली के नाटक हैं, लोक संगीत में गुंथे हुए हैं, हास्य प्रधान हैं और कमोबेश एक-सा संदेश भी देते हैं। लेकिन 'राजा फोकलवा' में जहां राकेश तिवारी छत्तीसगढ़ी नाचा शैली के पारंपरिक विन्यास व अनुशासन का पालन करते नजर आते हैं, वहीं बाबा पाखंडी में योगेन्द्र चौबे ने बहुत सारे प्रयोग भी कर डाले, जो कि उनके नाट्‌य विद्यालय की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए असंगत भी नहीं लगते। बहरहाल नाटकों की भाषा, शिल्प व व्याकरण को यदि एक तरफ कर दें और केवल दर्शकों के लिहाज से विचार करें तो ये दोनों ही नाटक उनकी पसंदगी की सूची में शीर्ष स्थानों पर रहे।

इंदौर की नाट्‌य संस्था रंगरूपिया द्वारा प्रस्तुत नाटक 'किसी और का सपना' एक बिल्कुल अलग मूड का नाटक था और शायद उनके लिये था जो नाटक खेलते हैं। नाटक का केंद्रीय चरित्र मूलतः 'आदर्शवादी' है जिसे आज के जमाने के यथार्थवादी 'आउटडेटेड' करार देते हैं। नाटक का यह मुख्य पात्र अपने स्वाभाविक चरित्र के कारण बार-बार नाटक के मूल आलेख से ही विद्रोह कर जाता है और बाज मौकों पर लेखक- निर्देशक की बात कहने के बदले अपनी बात कह जाता है। वह निर्देशक से पूछता है कि जिस मौके पर उसे शोषक की गर्दन पकड़ लेनी चाहिये, तब उसे पैर पकड़ने की सलाह कमबखत लेखक उसे क्यों दे रहा है? वह अभिनय करना नहीं चाहता, अभिनय को जीना चाहता है और इसी फेर में नाटकों के पूर्वाभ्यास का सत्यानाश करता जाता है। एक बिल्कुल ही अलग रंग का नाटक। बेहद कसा हुआ। चुस्त गति और परिपक्व अभिनय। संवादों की अदायगी में भी कहीं कोई झोल नहीं। नाटक के निर्देशक चैतन्य ने उम्मीद की एक लौ जगायी है और आने वाले दिनों में रंगकर्म के क्षेत्र में उनसे बड़ी उम्मीदें की जा सकती हैं।

नाट्‌योत्सव के अंतिम दिन प्रचारित कार्यक्रम में थोड़ा-सा फेरबदल करते हुए पंकज दीक्षित के निर्देशन में अशोकनगर, म.प्र. की इप्टा इकाई द्वारा नाटक 'पोस्टर' का मंचन किया। शंकर शेष का यह नाटक बेहद पुराना है और शायद किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लेकिन विडबंना देखिये कि एक दिन पहले ही नाट्‌योत्सव के मुख्‍य अतिथि, नाट्‌य विद्यालय के निदेशक श्री संजय नाटक्उपाध्याय अनौपचारिक वार्ता में कह रहे थे कि जमीदार-सामंत-किसान-मजदूर वगैरह के कान्सेप्ट अब पुराने हो चुके हैं और नाट्‌यकर्मियों को इनसे बाहर निकलना चाहिये, वहीं यह 'पोस्टर' नाटक ही था, जो दर्शकों की सबसे ज्यादा तालियां बटोर रहा था। नाटकों का सर्वश्रेष्ट मूल्यांकन नाटककार नहीं, दर्शक ही कर सकते हैं और अगर दर्शकों ने ही 'पोस्टर' को सबसे ज्यादा अंक दिये तो सामंती व्यवस्था के चित्रण को भला क्यों अप्रासंगिक मान लिया जाये? शुरुआत में नाटक की गति कुछ धीमी थी, कलाकार थोड़े से सहमे से थे- शायद दर्शकों की परिपक्वता पर कुछ संदेह रहा हो-पर एक बार जब नाटक ने गति पकड़ी तो सब कुछ जैसे ठहर-सा गया। पात्र व दर्शक एकाकार हो गये और कलाकारों के 'फ्रीज' हो जाने पर ही चैसे उनकी चेतना लौटी। दर्शकों के लिये यह एक नया अनुभव था। पंकज दीक्षित, सीमा-हरिओम राजोरिया व 'कक्काजी' के अभिनय की खूब सराहना हुई।

नाट्‌योत्सव की अंतिम प्रस्तुति थी 'गबड़ घिचोरन के माई, जिसे तनवीर अखतर के निर्देशन में इप्टा, पटना ने प्रस्तुत किया। यह भिखारी ठाकुर के दो नाटकों 'गबड घिचोर' व 'विदेशिया' का कोलाज था, जो भाषा संबधी बाधा के कारण दर्शकों को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया, हालांकि अभिनय व संगीत दोनों ही बेहद कसे हुए थे।

नाट्‌योत्सव के दौरान पंकज दीक्षित के कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी लगायी गयी, स्थानीय इकाई द्वारा क्रांतिकारी जनगीतों का गायन प्रस्तुत किया गया, ब्रोशर व पोस्टरों में अपने सरोकार की बाते कही गयीं, गाड़ी रद्‌द होने के कारण श्री गोपाल राय का व्याखयान नहीं हो पाया, हजारों लोगों ने तीन दिनों तक स्तरीय नाटकों को देखा व इस पर अपनी राय दी। प्रायोजकों व अनुदान के भरोसे अनुष्ठान करने वाले बड़े शहरों के बुद्विजीवी-रंगकर्मी विचार करें कि यह वैकल्पिक मीडिया नहीं है तो और क्या है?

दिनेश चौधरी

द्वारा-इप्टा,

भगतसिंह चौक

डोंगरगढ़, जिला-राजनांदगांव,

छत्‍तीसगढ़

पिन-491445


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