नौकरशाहों का काम ही है सूचना देने में हीलाहवाली करना

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काशीजब आरटीआई एक्ट बनाया जा रहा था तो इसमें किसी भी प्रकार का शुल्क न रखने का प्रावधान किया जा रहा था। मगर बाद में एक टोकन मनी के रूप में 10 रूपये का शुल्क सिर्फ इसलिए रखा गया ताकि उसकी रसीद से ये पता चल जाए कि आवेदनकर्ता ने कब आवेदन दाखिल किया है। आरटीआई का शुल्क बढ़ाने की वकालत वो लोग करते हैं जो इस कानून के दुश्मन है। या फिर वो नहीं चाहते कि आम आदमी के हाथों में इतना बड़ा हथियार हो।

ये बातें महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में चल रहे दो दिवसीय सूचना का अधिकार-2005 के सामाजिक प्रभाव विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ओम प्रकाश केजरीवाल ने बतौर मुख्य अतिथि कही। महामना मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान की ओर से आयोजित एवं यूजीसी द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी के समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए श्री केजरीवाल ने कहा कि लोग ये शिकायत करते हैं कि नौकरशाह सूचना नहीं देना चाहते। ऐसे लोगों को ये समझना चाहिए कि नौकरशाह का काम ही है सूचना देने में हीलाहवाली करना। लोग ये भी कहते हैं कि आरटीआई से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। ऐसे लोगों को एक्ट को ध्यान से पढ़ना चाहिए जिसमें साफ लिखा है कि इस कानून को बनाने का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का है। श्री केजरीवाला ने ये भी कहा कि लोग अब आरटीआई के दुरूपयोग की बात करते हैं। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि देश में ऐसा कौन सा कानून है जिसका दुरूपयोग नहीं हो रहा है। मगर सिर्फ यही एक कानून है जिसका सबसे ज्यादा सदुपयोग हो रहा है। लाखों लोग इस कानून के जरिये सशक्त हुए हैं।

उन्होंने ये भी कहा कि आरटीआई ऐसे लोगों के लिए ही बनी है जो आम जिंदगी में भ्रष्टाचार से रूबरू होते हैं। जैसे किसी का राशन कार्ड नहीं बन रहा, किसी का पासपोर्ट नहीं बन रहा है, किसी सड़क को बनाने में गुणवत्ता का ध्यान नहीं दिया गया। आरटीआई ऐसे भ्रष्टचार के मामलों में आम आदमी को लड़ने की शक्ति देता है। श्री केजरीवाल ने बताया कि इन दिनों ऐसे घटनाओं की काफी चर्चा है जिसमें सूचना मांगने वालों पर हमले हो रहे हैं। ऐसे ही लोगों को सहयोग, आत्मबल और सुरक्षा देने के लिए वाराणसी में काशी जन सूचना फाउण्डेशन की शुरुआत की है। इससे लोगों को जुड़ना चाहिए।

समारोह के विशिष्ट अतिथि नई दुनिया के यूपी हेड योगेश मिश्रा ने कहा कि आज सूचना अधिकार कानून के शुल्क में अनियमितता आ चुकी है। गृह मंत्रालय जहां 10 रूपये में सूचना दे रहा है, वहीं राज्य सभा की सूचनाओं के लिए 250 रूपये शुल्क मांगा जा रहा है। जबकि हाई कोर्ट की सूचना प्राप्ति के समय व्यक्ति को 2500 रूपये तक शुल्क देना पड़ रहा है। ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकारी मशीनरी नहीं चाहती कि लोगों के लिए सूचना आसान रहे। आज सूचना आयोग में ऐसे लोग बैठाये जा रहे हैं जो खुद दागदार हैं। इसपर हम सभी को बारीक निगाह रखनी होगी।

नई दुनिया के झारखण्ड हेड एवं आरटीआई एक्टिविस्ट विष्णु राजगढ़िया ने कहा कि अब तक नौकरशाह सिर्फ इसलिए हम पर हावी थी क्योंकि उनके पास कानूनी अधिकार के रूप में हथियार होते थे। मगर आरटीआई के रूप में अब आम आदमी को भी संविधान ने एक खतरनाक अधिकार दे दिया है तो नौकरशाह परेशान हैं। वो इस हथियार की धार को कुंद करना चाहते हैं। आम आदमी के साथ आरटीआई ने मीडिया को एक नया न्यूज सोर्स भी दिया है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता अशोक मेहता ने देश, समाज और मीडिया में भ्रष्टाचार के मामलों की विस्तार से चर्चा की। कहा, आरटीआई अभी एक ही पक्ष को कंट्रोल कर पा रहा है जबकि इसके दायरे में सब कुछ आना चाहिए।

बीएचयू पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एचए आजमी ने कहा कि यदि हमारे पास सही सूचनाएं हो तो हम ज्यादा अच्छा निर्णय ले सकते हैं। जो सूचनाओं से दूर होता है, उसका नुकसान होता है। इतिहास भी इसका गवाह है। उन्होंने कहा कि कहीं-कहीं मीडिया भी स्वत: सूचनाओं के रास्ते में रोड़ा बन रही है जो ठीक नहीं।

पीटीआई झारखण्ड के प्रमुख इंदु कांत दीक्षित ने नई दिल्ली की संस्था पीसीआरएफ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि सूचना आयोग में सूचना न देने के मामलों में से सिर्फ 3.17 प्रतिशत मामलों में ही दोषी अधिकारियों पर पेनाल्टी लगाई गयी। क्या इसी तरह सूचना अधिकार का भला हो रहा है।

अध्यक्षता करते हुए प्रेस काउंसिल के सदस्य एवं जनमोर्चा के सम्पादक शीतला सिंह ने कहा कि यदि समाज से भ्रष्टाचार को मिटाना है तो सबसे पहले हमें खुद को सुधारना होगा। ऐसा होता है तो शायद हमें किसी कानून की जरूरत न पड़े।

प्रारंभ में संस्थान के निदेशक एवं संगोष्ठी के चेयरमैन प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि दो दिन के इस सेमिनार में आठ राज्यों के 25 विश्वविद्यालयों के करीब 400 लोगों ने प्रतिभाग किया जिसमें 22 सोर्स परसन के रूप में आमंत्रित रहे। सेमिनार के लिए 130 शोध पत्र पहले ही प्राप्त हो चुके हैं जिनका प्रकाशन बाद में पत्रिका के रूप में किया जाएगा। समापन सत्र में प्रेस काउंसिल सदस्य सुमन गुप्ता भी मौजूद रहीं।

इससे पहले अंतिम दिन दो तकनीकी सत्रों का आयोजन भी हुआ। इसमें सूचना का अधिकार मीडिया एवं लोकतंत्र विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता महर्षि दयानंद वि.वि. के प्रो. हरीश कुमार ने की। मुख्य वक्ता भड़ास डाट काम के प्रधान सम्पादक यशवंत सिंह ने मीडिया के अमीरी और गरीबी के खाचे में बंटे होने की चर्चा की। सत्र के संयोजक डा. गोपाल सिंह तथा रिपोर्टिंग अवधेश यादव ने की। इस सत्र मे पूर्वांचल विश्वविद्यालय जनसंचार विभाग के डा. पुरूषोत्तम पाण्डेय, डा. प्रेरणा त्रिपाठी, मो. जावेद, चेतना, डा. धीरज कांत, अनुपम कुमार गुप्ता सहित डेढ़ दर्जन लोगों ने शोध पत्र पढ़े।

दूसरा सत्र सूचना का अधिकार उद्भव, विकास, मीडिया एवं एनजीओ विषय पर हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. वीरेन्द्र व्यास ने की। मुख्य वक्ता पद से डा. रमेश त्रिपाठी ने आरटीआई के पक्ष और विपक्ष दोनों बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए साबित किया कि इस कानून में सकारात्मक चीजें ज्यादा हैं और नकारात्मक चीजें तुलना में काफी कम हैं। सत्र संयोजक डा. रमेश यादव रहे और रिपोर्टिंग मो. फरियाद ने की। इस सत्र में डा. प्रमथेश पाण्डेय, स्वतंत्र प्रकाश, डा. विनोद सिंह, डा. संजीव गुप्ता, श्याम भद्र शरण आदि ने शोध पत्र पढ़े।  प्रेस विज्ञप्ति


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