पुरुष के बदले बिना समाज नहीं बदलेगा

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महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्‍त्री अध्‍ययन संघ के संयुक्‍त तत्‍वावधान में आयोजित स्‍त्री अध्‍ययन के 13 वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के तीसरे दिन रविवार को मध्‍य भारत की नारीवादी आंदोलन से जुड़ी कार्याकर्ताओं ने 'तुम बोलोगी, मुंह खोलोगी, तभी तो जमाना बदलेगा'  से स्‍त्री विमर्श को नया आयाम दिया।

'मध्‍य भारत की महिलाओं के समक्ष चुनौतियां' विषय पर आयोजित प्‍लेनरी सेशन की अध्‍यक्षता मीरा वेलायुदन ने की। इस दौरान महिला लेखिका व संस्‍कृत की प्राध्‍यापिका सुमनताई बंग ने स्‍त्री विमर्श पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिना पुरूषों के किसी समाज की कल्‍पना नहीं की जा सकती है, हमें सोचना पड़ेगा कि अ‍ाखिर स्‍त्री विमर्श पुरूषों को साथ क्‍यों नहीं ले रहा है। पुरूष के बदले बिना समाज कैसे बदलेगा। माताओं को चेतनशील समाज के निर्माण के लिए सोचने की जरूरत है, जब तक स्त्रियां मानसिक रूप से मुक्‍त नहीं होगी तब तक स्‍त्री मुक्ति का कोई मतलब नहीं होगा।

इस अवसर पर लीलाताई चितले ने कहा कि आजाद देश में आजाद महिला के साथ जो हो रहा है, इसपर हम सोचने पर विवश होते हैं, आज स्त्रियों को अपना स्‍वतंत्र मत रखने की जरूरत है। महिला संगठन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता सरोजताई काशीकर ने 1980 में काश्‍तकारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान में समानता का हक मिला हुआ है, पर क्‍या हम आर्थिक क्षेत्र में अपना निर्णय ले पाते हैं।

इस दौरान विदर्भ में मजदूर आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए नागपुर की उषा मिश्रा ने कहा कि विदर्भ में पत्‍थर तोड़नेवाली हाशिए की महिलाएं प्रतिरोध कर रही हैं, उनका कहना है कि आप जिस आलीशान इमारतों में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं, उस भवन निर्मिति में प्रयुक्‍त होने वाले गिट्टी के लिए हमनें पत्‍थर को भी हथौड़े से तोड़ डालते हैं। उन्‍होंने कहा कि स्‍त्री अपने आप में श्रमिक क्रांतिकारी होती है- गर्भ से ही शक्ति का निर्माण होता है, सब परिस्थितियों से टकराने की शक्ति हममें हैं। उन्‍होंने विदर्भ को आंदोलन की भूमि बताते हुए कहा कि यहां एक सशक्‍त वैचारिक पद्धति रही है। उन्‍होंने कहा कि यहां पर संगठित मजदूर आंदोलन, असंगठित मजदूर आंदोलन व आर्थिक प्रश्‍नों से जूझते आंदोलन की भूमि रही है। विदर्भ में बुनकर आंदोलन, सूत मिल आंदोलन, सफाई कामगार आंदोलन आजादी आंदोलन से ही शुरू हो गया था। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस, इंटक इ‍ंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कौंसिल, हिंद मजदूर संघ का निर्माण यहां के आंदोलनों की उपज है।

आदिवासी बहुल गढ़चिरौली क्षेत्र में कार्य करनेवाली श्रीमती बंग ने कहा कि आदिवासी जल, जंगल, जमीन से जुडे़ हुए हैं। जंगल से ज्‍यादातर महिलाओं का वास्‍ता रहता है, विकास नीति हमें जंगलों से बेदखल करना चाहती है। उन्‍होंने कहा कि बीड़ी उद्योग में आदिवासी महिलाओं का खूब शोषण होता है। उन्‍होंने महिलाओं पर शोषण का जिक्र करते हुए का कहा कि आदिवासियों को जंगल में चार पैरों के जानवरों से डर नही अपितु दो पैरों का डर है।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में स्‍थानीय संयोजक व स्‍त्री अध्‍ययन की विभागाध्‍यक्ष प्रो. इलीना सेन ने मध्‍य भारत को प्रचलित विकास मॉडल के बीच में एक ऐसी संभावना का क्षेत्र बताया जहां कि वैकल्पिक विकास मॉडल के कुछ अभ्‍यास निकलकर आ सकते थे चूंकि यही वह क्षेत्र है जहां साझा संपत्ति संसाधन, जीवंतता, नागरिक अधिकार, मानवअधिकार को मुख्‍य चिंतन का आधार बनाया जा सकता है, दूसरी तरफ ग्रीनहंट, नक्‍सल के खिलाफ आंदोलन, सलवा जुडूम, आदिवासियों के खिलाफ संगठन और सौ से अधिक कंपनियों की उपस्थिति आम जनों के बीच स्‍पष्‍ट है।

इस अवसर पर आजादी आंदोलन के दौरान अपनी अमूल्‍य योगदानों से समाज सुधार लाने वाली महिलाओं को सम्‍मानित किया गया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए महिला कार्यकर्ता, सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी महिलाओं के संघर्ष का इतिहास व भारतीय स्‍त्री अध्‍ययन संघ के इतिहास को जोड़ने के लिए मराठी लेखिका पुष्‍पा भावे ने स्‍वतंत्रता सेनानी मालतीताई रूईकर, लीलाताई चितले, नलिनीताई लढके, सीमाताई साखरे, सुमनताई बंग, विश्‍वविद्यालय की स्‍त्री अध्‍ययन विभागाध्‍यक्ष प्रो. इलीना सेन को शॉल, स्‍मृति चिन्‍ह प्रदान कर सम्‍मानित किया। कार्यक्रम में  देश-विदेश से आए स्‍त्री अध्‍ययन अध्‍येता, लेखिका, गैर सरकारी संगठनों के तकरीबन 650 प्रतिभागी व विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापक, कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा वर्धा के गणमान्‍य नागरिक उपस्थित थे।


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