''यशवंतजी, आप भी दलाली में जुट जाते होंगे''

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अपने हिंदी पट्टी के साथियों में एक बड़ी परेशानी है. वह यह कि आई-क्यू लेवल ज्यादातर का कम है और तार्किक बात नहीं करते हैं बल्कि इमोशनिया जाते हैं. ये इमोशन हम हिंदी वालों की ताकत भी है और कमजोरी भी. ताकत इस लिहाज से हम दिलवाले होते हैं, हम बुद्धि पर कम, दिल के कहे पर ज्यादा भरोसा करते हैं, सो, ज्यादा इन्नोसेंट होते हैं हम लोग.

कमजोरी ये कि हम किसी चीज के बारे में लाजिकल नहीं हो पाते. अगर हमारी किसी व्यक्ति या संस्थान से निजी खुन्नस है तो हम चाहते हैं कि उस व्यक्ति या संस्था के खिलाफ हर कोई बिना किसी लाजिक के खड़ा हो जाए. और, अगर हमारी उस व्यक्ति या संस्था से सेटिंग हो जाती है तो चुपचाप बिना कोई पब्लिक वक्तव्य दिए, हम मुंह अंधेरे पतली गली से दाएं बाएं सरक लेते हैं. ऐसे ही एक अपने कम आई-क्यू लेवल वाले और बेहद इमोशनल पत्रकार की चिट्ठी को यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

इन सज्जन की आगरा से प्रकाशित कल्पतरु एक्सप्रेस से कोई खुन्नस होगी, सो वे चाहते हैं कि वे जो कुछ भी अनाप-शनाप लिख कर भेजा करें, वह भड़ास पर छपता रहे. पढ़िए, उनकी चिट्ठी जिसमें उन्होंने मुझे गरियाने के लिए अपना दिमाग कहां-कहां तक दौड़ाया है. साथ में, उन्हें भेजा गया मेरा जवाब भी. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


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date Fri, Jan 28, 2011 at 11:45 PM

subject bhadas

यशवंत जी,

भड़ास को मजबूत बनाने संबंधी एक विज्ञापन भड़ास में ही पढ़ा। बेशक ऐसे लोग हैं जो आपकी मदद के लिए आगे आएंगे। लेकिन उनका संबंध आपसे नहीं, आपकी उन बातों पर विश्वास से है और होगा, जो आप करते हैं। आपने अपनी तुलना विकीलीक्स जैसी साइट से करने की गुस्ताखी की है। इस बारे में किसी भी प्रकार की बात करना बेकार है लेकिन मैं अपना एक व्यक्तिगत अनुभव आपसे साझा करना चाहता हूं।

करीब दो माह पहले मैने आपसे फोन पर बात की थी और कल्पतरू एक्सप्रेस आगरा में व्याप्त जबर्दस्त विसंगतियों और पत्रकारों को प्रताडि़त किए जाने संबंधी जानकारी आपको दी थी। तब आपने कहा था कि मैं यह सब आपको लिखकर दूं, मैने विस्तार से लिखकर भी दिया, और जो कुछ लिखा वह एकदम सच था। मुझे जानकारी थी कि कल्पतरू के वरिष्ठ संपादक राजीव मित्तल से आपके बड़े घनिष्ठ संबंध हैं बावजूद इसके मैने आप पर, आपकी बातों पर विश्वास किया और यह सारी कोशिश की लेकिन आपने इस बारे में एक शब्द भी भड़ास पर प्रकाशित नहीं किया।

यह तो बड़ी छोटी सी बात थी जब इतनी सी बात पर आपका यह हाल है तो बड़ी बातों में तो आपकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती होगी या फिर आपभी दलाली में जुट जाते होगे, ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए पत्रकारों के सामने इतने मसीहाई तेवर के साथ पेश मत आइए कि आपकी बातें और आप खुद भी हास्यास्पद हो जाएं।

आपका

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yashwant singh to ramanand

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date    Sat, Jan 29, 2011 at 5:12 AM

subject    Re: bhadas

कथित रामानंद जी

(क्योंकि आपने अपना नाम व परिचय तो दिया नहीं है, आपकी जो मेल आईडी है, उसके अनुसार आपका नाम यही मान लेता हूं)

पहली बात, आपने एक चवन्नी तो दिया नहीं, और पेलने लगे कांय-कांय टाइप कुकुरहा उपदेश, सबेरे-सबेरे. भड़ास के गुल्लक में कुछ डालो फिर शोर-शराबा करो. अपन की अब मुफ्त में प्रवचन सुनने की इच्छा करीब-करीब समाप्त होती जा रही है.

दूसरे, अगर भड़ास पर किसी के खिलाफ कुछ छपवाना चाहते हो तो खुद में इतना दम तो रखो कि अपने नाम व पहचान से सामने आकर गलत बातों के बारे में सच-सच बोल सको. नहीं तो कोई आसपास बिल बना लो और उसी में दिन भर घुसे रहे.

आपका स्वागत है. आप आकर छपवाओ, कल्पतरु से लेकर उड़नखटोला तक के बारे में,  जो भी लिखना है, लिखकर भेजो, साथ में अपनी तस्वीर और परिचय व फोटो भी जरूर भेजा करो. देखो, तुरंत छपता है या नहीं.

तीसरे, मित्तल मेरा कतई घनिष्ट दोस्त नहीं है, उसी तरह का है जैसे तुम हो. फोन पर या मेल से बात कर लेने से कोई दोस्त नहीं हो जाता. और, ये भी जान लो कि दुनिया में मेरा कोई सगा नहीं, खुद मैं भी अपना सगा नहीं. वरना मैं अच्छी-भली नौकरियों से पगहा तुड़ाकर और बेचैन आत्मा बनकर भड़ास निकालने को न चला होता, मैं भी कहीं चुपचाप बैठकर सिस्टम की सिलाई-बुनाई-निराई-गुड़ाई करते हुए मेलजोल व भरपूर शांति के साथ माल-मलाई पीट रहा होता. अब ये अलग बात है कि भड़ास निकालते निकालते इससे भी कुछ मलाई-सी निकलते दिक्खे है, (जो मेरे लिए छाछ समान है और आप बाहर वालों के लिए भरपूर मलाई) जिसे देखकर आप जैसों के करेजा पर डाह रूपी सांप कूद-कूद कर अटखेलियां कर रहा है.

चौथा, कल्पतरु के बारे में समय-समय पर नकारात्मक खबरें छपती रहती हैं, आप क्या चाहते हैं कि आपके दिल की तसल्ली के लिए रोज मैं उन लोगों की मां-बहिन करूं?  नंबर पांच- आपका पिछला कौन सा भेजा मैटर नहीं छपा था, उसे दुबारा भेजिए ताकि उसे देखकर आपको बता सकूं कि उसके न छपने की वजह क्या है. छठां और अंतिम, कल्पतरु जैसे तमाम नए खुलने वाले अखबारों व चैनलों में जाने से पहले मुझसे पूछा तो न था भइये. अब अगर झेल रहो हो तो मुझ पर क्यों कांय-कांय कर रहे हो. अगर गूदा रखकर लंका में कूदा तो अब क्यों कहते हो कि यशवंत ने आंख मूंदा.  ऐसे में तो लंका जलाओ, या फिर खुद जलो-भुनो, और भुगतो, पर मेरी जान तो बख्श दे मेरी जान!

बिलकुल खुश मत रहना, बेचैन आत्मा की तरह कूदते-फांदते रहना, रास्ता जरूर निकलेगा मेरे छुपेरुस्तम साथी.

आभार
यशवंत


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