'मृत भाषाओं की कब्रगाह होते हैं शास्त्र'

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कोलकाता में संगोष्ठीकोलकाता में भारतीय भाषा परिषद सभागार में 'हिन्दी के प्रचार-प्रसार में मीडिया की भूमिका' विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन दि न्यू इंडिया एश्योरंस कंपनी लिमिटेड ने किया। समारोह को संबोधित करते हुए सुपरिचित कथाकार व सन्मार्ग के वरिष्ठ उप-सम्पादक अभिज्ञात ने कहा कि विश्वविद्यालयों में मृत भाषाएं पढ़ी-पढ़ाई जाती हैं, क्योंकि उनकी भाषा शास्त्रीय होती है। शास्त्र मृत भाषाओं की कब्रगाह होते हैं, उसके विपरीत मीडिया की भाषा सबसे टटकी, सबसे ताज़ा होती है। धड़कती हुई।

साहित्य भी मृत भाषाओं को उठाता है किन्तु वह उन्हें पुनर्जीवन देता है, उनमें नयी प्राण प्रतिष्ठा करता है, नये अर्थ देता है, नया यौवन। सरकारी प्रयास व राजभाषा समितियां जिस भाषा को गढ़ती हैं, वे न तो कभी जीवित होती हैं और न उनमें कभी जान आ सकती है। वे भाषाओं के बिजूका गढ़ते हैं।

अभिज्ञात ने आज के समय में भाषा के प्रचार-प्रसार के मामले में मीडिया को पहला दावेदार बताया। उन्होंने कहा कि पत्रकार कई बार जान हथेली पर लेकर घटनास्थल से सीधे रिपोर्टिंग करते हैं जहां उनके सामने एकदम नये हालात होते हैं। जिस पर वह तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। उस समय उसके पास कोई शास्त्र नहीं होता। शब्दों पर पुनर्विचार का समय नहीं होता। वह जिस भाषा का जिस स्थिति में प्रयोग करता है उस पर कई बार एयरकंडीशन कमरों में बैठकर आराम से काफी पीते हुए टीवी देखते हुए विद्वतजन भाषा की जुगाली करते हुए कहते हैं पत्रकार का लिंग सही नहीं है। वह अंग्रेजी शब्दों का अधिक इस्तेमाल कर रहा है। वाक्य विन्यास सही नहीं है। शब्दों का उच्चारण भी दोषपूर्ण है। कई बार वही स्थितियां प्रिंट मीडिया के लोगों के समक्ष उस समय होती हैं जब डेटलाइन की सीमा पार होती रहती है, प्लेट छूट रही होती है और कोई विस्फोट की खबर फ्लैश होती है। आनन फानन में भाषा का जो रूप जनता के सामने आता है उसके आधार पर मीडिया की भाषा का मूल्यांकन व्याकरण के नियमों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। भाषा का सम्बंध स्थितियों से होता है और उसी में उसका सौन्दर्य भी होता है और भाषाकी अर्थवत्ता भी।

सहारा न्यूज के कोलकाता ब्यूरो प्रभारी दीपक सान्याल ने कहा कि साहित्य की लच्छेदार भाषा और राजभाषा की जटिल भाषा के बरअक्स मीडिया जिस भाषा का इस्तेमाल करता है वह जनता की अपनी भाषा का ही स्वरूप होता है। मीडिया में सीधी बात का ज्यादा महत्त्व है और उसी में उसकी सार्थकता भी है। उन्होंने कहा कि मीडिया से बच्चे सीधे प्रभावित होते हैं इसलिए मीडिया को यह ध्यान देना चाहिए कि वह जो प्रसारित कर रहा है उसका बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रीय अस्मिता के साथ जोड़ा।

कोलकाता में संगोष्ठीभारतीय भाषा परिषद के निदेशक व प्रख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि भाषा को ड्राइंगरूम में सजाने वालों ने उसके साथ बदसलूकी की है शब्दों ने अर्थ खो दिये हैं। रिसेप्शन पर बैठी हुई लड़की जो भाषा बोलती है वह केवल दिखावा होता है जबकि कम बोले जाने वाले शब्द भी बहुत बातें कह देते हैं। उन्होंने कहा कि क्लिष्ट शब्दों के इस्तेमाल से बचने की बात कही जाती हैं किन्तु क्लिष्ट शब्द नहीं होते बल्कि यह अपरिचय की देन है। परिचित होने पर शब्द कठिन नहीं रह जाते। अपरिचय ही शब्दों को अग्राह्य बना देता है।

भाषा के प्रति विद्वानों के व्यवहार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अमीर खुसरो व गालिब फ़ारसी और तुलसीदास संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे लेकिन खुसरो और गालिब ने खड़ी बोली और उर्दू में रचनाएं की और तुलसी ने अवधी में। यह लेखक जानते थे किस भाषा में भविष्य छिपा है और कौन सी भाषा जनता के करीब है। हिन्दी वस्तुतः तद्भवों की ही भाषा है। अभिज्ञात की भाषा की मीडिया पर दावेदारी पर उन्होंने कहा कि मीडिया ही क्यों भाषा हर कोई गढ़ता है। हलवाहा भी बैल से संवाद करने के लिए एक नयी भाषा का आविष्कार करता है। कार्यक्रम का उद्धाटन कंपनी के क्षेत्रीय प्रबंधक डॉ.सीआर मंडल ने किया। सेल के महाप्रबंधक (कार्मिक एवं प्रशासनिक) तथा नराकास (उपक्रम) के सचिव रवीन्द्र सिंह ने हिन्दी की प्रगति में कोलकाता के योगदान की सराहना करते हुए प्रथम हिन्दी समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड तथा फोर्ट विलियम कालेज का स्मरण कराया। समारोह को सेल के वरिष्ठ प्रबंधक (राजभाषा) कैलाश नाथ यादव ने भी सम्बोधित किया। संचालन किया न्यू इंडिया एश्योरंस के सहायक प्रबंधक देवेन्द्र कुमार मिश्र ने तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रबंधक अपूर्ब शील ने किया।


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