''खोजी पत्रकारिता के अभाव से घटी मीडिया की विश्‍वसनीयता''

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: गैर व्‍यवसायी पत्रकार पैदा कर रहे समस्‍याएं : चुनौतियां केवल मीडिया के समक्ष ही नहीं बल्कि समाज के सभी अंगों के समक्ष हैं। चुनौतियों के समाधान के लिये मूल्य आधारित समाज का निर्माण करना होगा। ‘मीडिया के समक्ष चुनौतियां’ विषय पर प्रेस क्लब, चण्डीगढ़ में आयोजित एक विचार गोष्‍ठी में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्रसिंह हुड्डा ने यह बात कही। विचार गोष्ठी में जाने माने पत्रकार विनोद मेहता, गोबिंद ठुकराल, बीके चम और बलवंत तक्षक भी मौजूद थे।

हुड्डा के मुताबिक प्रजातन्त्र के चार स्तंभ- विधानपालिका, कार्यकारिणी, न्यायपालिका और प्रेस हैं। प्रजातन्त्र के इन सभी अंगों के समक्ष अपने प्रकार की चुनौतियां हैं। राजनीति में भी अपने प्रकार की चुनौतियां हैं। संसद या विधानसभा नहीं चलने देना, यह भी चुनौती है। मीडिया में आज एक्टिविज्‍म बहुत ज्यादा है, यही कारण है कि मीडिया की विश्वसनीयता में कमी आई है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता में व्यापारीकरण आ गया है और सनसनीखेज खबरें छापने की होड़ लगी हुई है। खोजी पत्रकारिता का अब जमाना लद गया है क्योंकि लगभग सभी समाचार पत्रों ने जिलों के नाम से पेज छापने शुरू कर दिये हैं और पत्रकार को अपने जिले का पेज हर हालत में भरना होता है। उसके पास सच और झूठ जानने का समय ही नहीं है। जब तक खोजी पत्रकारिता नहीं होगी तब तक पत्रकारिता में मूल्य नहीं आ सकते क्योंकि खबर की तह तक पहुंचने के लिये समय चाहिये और पत्रकारों के पास आज समय ही नहीं है।

उन्होंने कहा कि जब तक विश्वसनीयता और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक पत्रकारों के समक्ष चुनौतियां तो रहेगी ही। आज मीडिया में सबसे आगे, सबसे पहले और सबसे तेज की रेस लगी हुई है। ऐसे में पत्रकारों के पास खबर का लॉजिक अथवा उसके तथ्यों की जांच करने का समय ही नहीं है, जिस कारण से अखबारों की विश्वसनीयता का ह्लास हो रहा है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को खबरें प्रकाशित करने से पहले पत्रकारिता के छह मूल प्रश्नों - क्या, क्यों, कब, कहां, कैसे और कौन का जवाब अवश्य जान लेना चाहिये, तभी तथ्यों की तह तक पहुंचा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि वे एक राजनीतिक परिवार से संबन्ध रखते हैं और वे देख रहे हैं कि राजनीति में भी बदलाव आ रहा है। आज राजनेताओं की वह विश्वसनीयता नहीं रही जो आजादी के समय थी, क्योंकि आज राजनीति में एक्टिविज्‍म आ गया है, जिस कारण से इसकी विश्वसनीयता का ह्लास हुआ है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज मीडिया चालित समाज बन गया है और कभी-कभी राजनीतिज्ञों को भी खबर देखकर फैसला करना पड़ता है जो अच्छी बात नहीं है। इसके विपरीत समाजचालित मीडिया होना चाहिये। मीडिया को जन सामान्य की समस्याओं को प्रमुखता के साथ उजागर करना चाहिये।

पैसे देकर खबरनुमा विज्ञापन छापने की बढ़ती प्रवृत्ति के संबध में टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिये और इस प्रकार की खबरों के विरूद्घ आवाज उठाने वाले वे पहले व्यक्ति हैं। प्रेस क्लब को दी गई आर्थिक सहायता और पत्रकारों को दिये गये पुरस्कारों के संबध में उन्होंने कहा कि वे प्रेस क्लब के सदस्य हैं और पत्रकार भी समाज के अंग हैं। उन्होंने पुरस्कारों के संबध में पूरी पारदर्शिता बरती है। कोई भी बात छिपाई नहीं है। उन्होंने किसी भी पत्रकार को आज तक कोई भी खबर छापने के लिये नहीं कहा है। मुख्यमंत्री ने सम्मेलनों और विचार गोष्ठियों के आयोजन के लिये प्रेस क्लब को पांच लाख रुपये की राशि देने की घोषणा भी की।

पॉयनीयर अखबार के मुख्य संपादक विनोद मेहता ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि आज अखबारों के समक्ष मुख्य चुनौती विश्वसनीयता की है। यदि अखबार की विश्वसनीयता नहीं रह जाती है तो समझो वह समाप्त हो गया है। पत्रकार जो कुछ लिखते हैं, लोगों का उसमें विश्वास होना चाहिये। पत्रकारों को हर कीमत पर अपनी विश्वसनीयता बनाई रखनी चाहिये। उन्होंने कहा कि पत्रकार के राजनीतिज्ञों के साथ दोस्ताना संबन्ध हो सकते हैं। इसके बावजूद भी पत्रकार को समाज के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी निभानी होती है और उसे यह जिम्‍मेदारी पूरी ईमानदारी के साथ निभानी चाहिये। उन्होंने कहा कि पत्रकार को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि वह राजनीतिज्ञों का एहसान न लें। यदि पत्रकार एहसान लेना शुरू कर देता है तो समझो वह समझौते के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। राजनीतिज्ञों का एहसान न लेना, विश्वसनीयता बनाये रखने के लिये अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विचारगोष्ठी का विषय बहुत ही प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान मीडिया में काफी बदलाव आया है। इलेक्ट्रानिक और इंटरनेट मीडिया के आ जाने से आज कल प्रिंट मीडिया के समक्ष कड़ी चुनौती है। इन सब के बावजूद भारत एक ऐसा देश है जहां प्रिंट मीडिया में निरन्तर बढ़ोतरी हो रही है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों को व्यवसायी होना चाहिये। उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि 60 प्रतिशत लोग व्यवसायी कारणों से मीडिया से नहीं जुड़े हुए हैं। ऐसे लोग मीडिया के समक्ष समस्यायें पैदा कर रहे हैं। आज मीडिया मात्र ‘समाज सेवा’ नहीं रह गया है। प्रकाशन के लिये मीडिया को धन की आवश्यकता है और मीडिया विज्ञापनों के माध्यम से धन अर्जित कर रहा है। ऐसी स्थिति में  अखबार की विश्वसनीयता बनाये रखना एक चुनौती-भरा कार्य है।

वरिष्ठ पत्रकार बी के चम ने कहा कि भारतीय मीडिया विभिन्न दौर से गुजरा है। हमें समाचार पत्र को चलाने के लिये धन की आवश्यकता होती है, लेकिन फिर भी हमें हर कीमत पर विश्वसनीयता बनाये रखनी होगी और विश्वसनीयता तभी रह सकती है जब तक कि आप बिके नहीं। राजनीतिज्ञ पत्रकारों को हर प्रकार का प्रलोभन देकर परखते हैं। पैसे देकर खबर छपवाने की प्रवृत्ति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अब इस पर कुछ हद तक अंकुश लगा है, परन्तु अब पैसे देकर फोटो छपवाने का रूझान शुरू हो गया है, इसे भी हर कीमत पर रोका जाना चाहिये।

संवाद सोसायटी के कंसलटिंग एडीटर गोबिन्द ठुकराल ने विचारगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि मीडिया ने गत 25 वर्षों के दौरान विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना किया है। हमें उन पत्रकारों को सलाम करना चाहिये जिन्होंने साहस के साथ निष्पक्ष पत्रकारिता की है और आतंकवादियों के समक्ष भी घुटने नहीं टेके। समाचार पत्रों की विश्वसनीयता के संबन्ध में बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज कल समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का व्यापारीकरण हो रहा है। बड़े-बड़े समाचार पत्रों के मालिक राजनेताओं और मुख्यमंत्रियों के पैर छूते हैं। ऐसे में समाचार पत्र की विश्वसनीयता नहीं रह सकती। वरिष्ठ पत्रकार एनएस परवाना ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे पैसे देकर खबर छपवाने की प्रवृत्ति पर कानूनी तौर पर प्रतिबंध लगवायें क्योंकि इससे अखबारों की विश्वसनीयता समाप्त हो रही है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता एक मिशन था जो अब एक ट्रेड बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने यह भी कहा कि पत्रकारों के लिये भी आचार संहिता बननी चाहिये। बलवन्त तक्षक, बलजीत बल्ली, बलबीर जण्डु, राजीव सन्याल और बलविन्द्र जम्मू ने भी विचार गोष्ठी में अपने विचार रखे।

चंडीगढ़ से महेन्‍द्र सिंह राठौड़ की रिपोर्ट.


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