संवेदनशील मुद्दों को बेहद सोचने-समझने के बाद ही प्रसारित करें : तीस्ता

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न्यूज एक्सप्रेस के मंथन कार्यक्रम में इस बार की गेस्ट रहीं प्रसिद्ध समाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़। तीस्ता ने न्यूज चैनल के पत्रकारों को कौमवाद और फिरकापरस्ती से बचने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि समाज को जोड़ने के लिए मीडिया ने अपनी भूमिका को अब तक नहीं समझा है। नतीजनत समाज में तरह तरह की भ्रांतियां फैलती हैं और इससे समाज बिखरता है।

राजनेता कौम के नाम पर अपनी रोटियां सेंकते हैं और मीडिया इसका मोहरा बनता है। आखिर समाज में धर्म और जाति का जहर फैलता है। मीडिया ऐसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर बेहद सोच-समझकर पेश आए तो ठीक होगा। एक पत्रकार होने के नाते उन्होंने कहा कि रिपोर्टरों को हर चीज जांच परखकर, घटनास्थल का मुआयना कर के, तमाम सच्चाइयों को जान-समझकर ही खबर देनी चाहिए। धर्म या जाति की राजनीति और इसे बढ़ावा देने को उन्होंने देश की अस्मिता और अखंडता के लिए खतरा बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे तमाम मामलों को सांप्रदायिकता से जोड़ना समाज को तोड़ना है। चैनल के पत्रकारों से चर्चा में तीस्ता ने न्याय प्रणाली में सुधार की जोरदार वकालत की। गुजरात के दंगा पीड़ितों की लड़ने वाली इस सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि ऐसे मामलों के लिए जजों की नियुक्ति का भी तरीका बदला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोई इंसान किसी फैसले के खिलाफ बोलता है तो उसे कोर्ट की अवमानना करार दिया जाता है। ऐसा क्यों?  क्या ऐसे मामलों में पारदर्शिता की कोई जगह नहीं होनी चाहिए?

ओहदे से न्याय प्रणाली को प्रभावित करने वाले सफेदपोशों और उनका साथ दे रहे चुनिंदा मीडियाकर्मियों को उन्होंने जमकर कोसा। उन्होंने दोहराया कि देश के हर नागरिक को हक होना चाहिए कि उसे जो गलत लगता है वो उसके लिए आवाज उठाए। आज अपनी गंदी राजनीति के लिए राजनेता देश को संप्रदाय के नाम पर बांट रहे हैं, धर्म के नाम पर सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति हो रही है। देश का मीडिया भी ऐसे नेताओं के हाथों की कठपुतली बन रहा है। बाजारवाद के इस दौर में राजनेता अपनी नेतागीरी चमकाने के लिए मीडिया घरानों को दौलत के दम पर खरीदते जा रहे हैं। प्रेस रिलीज


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